फूफाओं ने सवाल उठाया है कि भारत कुल मिला कर चौथी बार और नरेंद्र भाई के रायसीना पहाड़ी पर पहुंचने के बाद तीसरी बार ब्रिक्स-सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है, मगर कोई यह तो बताए कि पिछले दो-तीन ब्रिक्स-आयोजनों के बाद से हमारे पल्ले पड़ा क्या है? नरेंद्र भाई के कार्यकाल का पहला ब्रिक्स-सम्मेलन 2016 में हुआ था और तब से अब तक के दस साल में भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद तो महज़ तीन सौ डॉलर सालाना ही बढ़ा है। चीन का इस बीच साढ़े छह हज़ार डॉलर बढ़ा है। रूस का तक़रीबन दस हज़ार डॉलर बढ़ा है।
शुभ अवसर पर अगर कड़वी लगने वाली बातें न हों तो फिर फूफागिरी कैसी? फूफाओं का काम ही नाराज़ बने रहना है। इसलिए अगर वे भारत की राजधानी में हो रहे 18वें ब्रिक्स-सम्मेलन के मौक़े पर भी मुंह फुलाए हुए हैं तो उन की कर्तव्यपरायणता का, आप करें-न-करें, मैं तो अभिनंदन करता हूं। ज़रा सोचिए तो सही कि अगर फूफा-समुदाय न होता तो इन बारह बरसों में हमारे देश की बेहाली का हाल और कितना ख़राब होता! ये तो ग़नीमत है कि जिस दौर में मुल्क़ की हर शाख़ पर शाखा वाले पसरे हुए हैं, कई डालियों पर फूफा भी पालथी मार कर पूरी मज़बूती से जमे हुए हैं।
फूफा-मुक्त भारत की हसरत पाले बैठे लोगों से सावधान रहिए। मैं उन्हें देश का दुश्मन तो नहीं कहूंगा, मगर वे देश के हितैषी भी नहीं हैं। इसलिए कि अगर वे देशप्रेमी होते तो असहमतियों का मख़ौल उड़ाने के बजाय उन की वज़ह जानने की कोशिश करते, उन का समाधान खोजते और फूफाओं को आंगन-कुटी छवाय कर अपने आसपास रखते। आज के हमारे हुक़्मरानों की मुसीबत ही यह है कि उन्होंने अपने दरबारों को ख़ाया-बरदारों से भर लिया है और हर तंज़ीम में सच्चाई का आईना ले कर घूमने वाले फूफाओं को भीतर न घुसने देने के लिए दरवाज़ों पर दुर्बुद्धि द्वारपाल तैनात कर दिए हैं।
सो, मेरा मन तो तब बाग़-बाग़ हो गया, जब मैं ने ब्रिक्स सम्मेलन के आयोजन पर उठने वाले सवाल सुने। हालांकि मेरा मन इस पर इतराने को हो रहा था कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के साथ साबरमती नदी के किनारे झूला झूलने वाले शी जिनपिंग बीजिंग से चल कर सात साल बाद फिर दिल्ली आ रहे हैं। मेरा मन इस का उत्सव मनाने के लिए भी ‘पधारो म्हारे देस’ गाने को कर रहा था कि व्लादिमीर पुतिन नरेंद्र भाई के गद्दीनशीन होने के बाद छठी बार भारत आ रहे हैं। मगर ब्रिक्स-सम्मेलन में शिरक़त करने वाले दिग्गजों की सूची पर मैं रीझता, उस के पहले ही ब्रिक्स के विचलन-भटकन पर उठे प्रश्नों से मेरा सारा उत्साह काफ़ूर हो गया।
फूफाओं ने सवाल उठाया है कि भारत कुल मिला कर चौथी बार और नरेंद्र भाई के रायसीना पहाड़ी पर पहुंचने के बाद तीसरी बार ब्रिक्स-सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है, मगर कोई यह तो बताए कि पिछले दो-तीन ब्रिक्स-आयोजनों के बाद से हमारे पल्ले पड़ा क्या है? नरेंद्र भाई के कार्यकाल का पहला ब्रिक्स-सम्मेलन 2016 में हुआ था और तब से अब तक के दस साल में भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद तो महज़ तीन सौ डॉलर सालाना ही बढ़ा है। चीन का इस बीच साढ़े छह हज़ार डॉलर बढ़ा है। रूस का तक़रीबन दस हज़ार डॉलर बढ़ा है। ब्राज़ील का साढ़े तीन हज़ार डॉलर बढ़ा है। दक्षिण अफ़्रीका तक का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद क़रीब दो हज़ार डॉलर सालाना बढ़ा है। तो कहां तीन सौ डॉलर और कहां दस हज़ार डॉलर?
ब्रिक्स के पांच मूल सदस्य देशों की प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति के आंकड़े भी इन दस वर्षों में भारत के लिए सब से गए-बीते हैं। चीन में इस एक दशक में हर व्यक्ति की क्रय शक्ति क़रीब अठारह हज़ार डॉलर सालाना बढ़ गई है। रूस में यह दस हज़ार डॉलर बढ़ी है। ब्राज़ील में सात हज़ार डॉलर बढ़ी है। दक्षिण अफ़्रीका ज़रूर भारत से पीछे है और वहां दस साल में सिर्फ़ तीन हज़ार डॉलर का इज़ाफ़ा हुआ है। लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति भी महज़ साढ़े पांच हज़ार डॉलर ही बढ़ी है। चीन इस मामले में हम से तीन गुना आगे है। इसलिए फूफाओं का यह सवाल मुझे तो जायज़ लगता है कि ब्रिक्स-मंच का असली इस्तेमाल तो चीन अपना भू-राजनीतिक वर्चस्व बढ़ाने और अपनी वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली का प्रचार-प्रसार करने के लिए कर रहा है। भारत तो अपने पैरों में फोकट ही घुंघरू बांध कर नाच रहा है।
फूफा-मंडली यह सवाल भी पूछ रही है कि भारत को आख़िर एक-दूसरे से मूलतः बेगाने वैश्विक मंचों के समूह नृत्य में अपनी कमर इतने ज़ोरशोर से मटकाने की ज़रूरत क्या है? वह इन चौपालों पर ज़्यादा स्वायत्त, अर्थपूर्ण और मुफ़ीद भूमिका का निर्वाह भी तो कर सकता है! 2026 में ब्रिक्स की अनुवर्ती अध्यक्षता के लिए भारत की बारी थी, सो, हम अध्यक्ष हैं। इतने भर से इठलाने से क्या हो जाएगा? चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा तो दस लाख करोड़ रुपए सालाना का है। रूस से व्यापार घाटा छह लाख करोड़ रुपए का है। दक्षिण अफ़्रीका से पांच लाख करोड़ रुपए का व्यापार घाटा है। सिर्फ़ ब्राज़ील ऐसा है, जिस के साथ तराजू का पलड़ा भारत के पक्ष में पौने दो लाख करोड़ रुपए सालाना के वज़न से झुका हुआ है। अगर ब्रिक्स अपने मूल सदस्य देशों के लिए ही इस तरह का असंतुलित दस्तरख़्वान बिछाए हुए है तो भारत को अपना हिस्सा हासिल करने के बजाय सिर झुका कर उस पर बैठे रहने की ज़रूरत क्यों है?
विश्व राजनय के चलते ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, जी-20, क्वाड, वग़ैरह के चबूतरों पर भारत की मौजूदगी की अनिवार्यता समझी जा सकती है। लेकिन उस का तब तक क्या फ़ायदा, जब तक एक-दूसरे के लिए बाध्यकारी व्यापार समझौतों, पूंजी निवेश के प्रवाह और सुरक्षा संबंधी रणनीतियों का ठीक-ठाक लाभ हमें भी न मिले? लेकिन हमारी सरकार इन सवालों का जवाब देने के बजाय विपक्ष के प्रति अवमाननाकारक ज़ुमलेबाज़ी का सहारा लेना बेहतर समझती है। आखि़रकार भारत की विदेशनीति-संरचना पर कोई स्वस्थ बहस होनी चाहिए या नहीं? इस प्रश्न का जवाब मिलना चाहिए या नहीं कि एक-दूसरे को घूर कर देखने वाले क्वाड और एससीओ-ब्रिक्स की साथ-साथ सवारी करने को भले ही कोई रणनीतिक विकल्पों की दक्षता समझे, मगर इस के अपने अंतर्निहित और दूरगामी खतरे हैं या नहीं?
घरेलू राजनीति में अपने लिए बनावटी उत्साह पैदा करने के मक़सद से वैश्विक आयोजनों का तमाशा खड़ा करना अपनी जगह है, मगर इन के मरुस्थल से पानी मिलने की उम्मीद मदंबुद्धि के लोग ही कर सकते हैं। ब्रिक्स में मिसª, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया और दर्जनों दूसरे भागीदार मुल्क़ों को शामिल किए जाने के बाद से उस की अर्थशास्त्रीय नाभि वैसे ही पहले से बहुत कमज़ोर हो गई है। आप अगर बहुत ही मासूम हैं तो मानते रहिए कि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात मिल कर दुनिया में एक नई वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण में अपना योगदान देंगे और इसी तरह मिसª और इथियोपिया आर्थिक मंचों पर गलबहियां कर के संसार को एक ऐसे गगन के तले ले जाने में अपनी भूमिका निभाएंगे, जहां ग़म भी न हो, आंसू भी न हों, बस फूल-ही-फूल खिलें।
देश की जनता को अपनी सियासी पैंतरेबाज़ी से समय-समय पर चौंकाने के लिए किए जाने वाले करतबों का ही यह नतीजा है कि बारह बरस से विश्व राजनय के बरामदे में भारत गोल-गोल घूम रहा है। नौ दिन चलने के बाद अगर नरेंद्र भाई अढ़ाई कोस भी पहुंच जाते तो मैं सरोपा बांध कर उन का ख़ैरमक़दम करता। मगर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मामले में उन्होंने मुझे तो घनघोर निराशा ही प्रदान की है। सो, मैं फूफाओं के साथ हूं, क्योंकि भारत जितना भी बचा हुआ है, उन्हीं की वज़ह से बचा हुआ है।
