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लूट सके सो लूट, हाँक सके सो हाँक

देश भर में हर शिक्षा संस्थान में प्रवेश,‌ और वहाँ की परीक्षा, हर प्रश्न-पत्र, हर मूल्यांकन, आदि एक ही आफिस से करने का निर्णय लिया गया होगा। ऐसी मतिहीनता सामान्य बुद्धि से भी अटपटी लग सकती है। कि कहीं एक भी गड़बड़ी, एक भी भूल, एक की पतिताई, आदि कुछ भी देश भर के लाखों व्यक्तियों, संस्थाओं को कष्ट देगी। बार-बार परेशान करेगी।…. कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईटन, हैरो, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, आदि सभी विख्यात शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए एक सरकारी कार्यालय टेस्ट लेगा! ऐसा करना हर तरह से मूढ़ता पूर्ण है। पर यहाँ किया जा रहा है।

सार्वजनिक शिक्षा: गरीब की लुगाई -2

वरना, सोच कर बताएं — यह किस ने, और किस उद्देश्य से तय किया कि प्रवेश परीक्षा में शून्य अंक पाने वाला भी एक बड़े विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए प्रवेश पा सकता है? इस के उत्तर में बचाव में जितनी बातें होंगी, सब राजनीतिक और स्वार्थ, ईर्ष्या-द्वेष, लफ्फाजी का बवंडर होगा। उस में शिक्षा या ज्ञान के प्रति कोई चिंता या समझ भी लक्षित नहीं होगी। यही है: शिक्षा का गरीब की जोरू होना! इस पर हर कोई कुछ भी बोलने, करने, थोपने, फतवे देने का अधिकारी है। मानो, यही एक क्षेत्र है जिस के लिए किसी पात्रता की जरूरत नहीं! पार्टी कार्यकर्ता से लेकर ठेकेदार तक उस में अपनी चला सकते हैं।‌ चलाते हैं।
इसी दृष्टिकोण से देश भर में हर शिक्षा संस्थान में प्रवेश,‌ और वहाँ की परीक्षा, हर प्रश्न-पत्र, हर मूल्यांकन, आदि एक ही आफिस से करने का निर्णय लिया गया होगा। ऐसी मतिहीनता सामान्य बुद्धि से भी अटपटी लग सकती है। कि कहीं एक भी गड़बड़ी, एक भी भूल, एक की पतिताई, आदि कुछ भी देश भर के लाखों व्यक्तियों, संस्थाओं को कष्ट देगी। बार-बार परेशान करेगी। जबकि स्थानीय, संस्थागत, राज्यवार, आदि क्षेत्राधिकार में स्वयं संपूर्ण रहने पर हर संस्था, हर परीक्षा, हर मूल्यांकन की गुणवत्ता अधिक सुरक्षित, स्पष्ट, सीमित, जिम्मेदार, और इसलिए उत्कृष्टता की संभावना भी बनी रहती है। यही पहले था भी।
यूरोप और अमेरिका के शैक्षिक संस्थानों में अभी भी वही है। उधर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईटन, हैरो, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, आदि सभी विख्यात शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए एक सरकारी कार्यालय टेस्ट लेगा! ऐसा करना हर तरह से मूढ़ता पूर्ण है। पर यहाँ किया जा रहा है। जो शिक्षा की गुणवत्ता और उत्कृष्टता को पेंदे में पहुँचा देने का अचूक उपाय है। मानो भारतीय विश्वविद्यालय रूपी फैक्ट्री से औसत कुली-कर्मचारी बनने लायक औसत माल तैयार करना हो। बस। इस से अधिक की कल्पना नहीं, चिन्ता नहीं।
वैसे भी, हर चीज का ‘केंद्रीकरण’ एक कम्युनिस्ट-लोकतंत्री मानसिकता है। यह अंध-मानसिकता कि सब कुछ ‘जनता’, यानी उस के नाम पर पार्टी करेगी। फिर पार्टी के नाम पर भी एक पार्टी-कमिटी, बल्कि उस का प्रमुख, यानी अंततः एक नेता। क्या यह — एक देश एक परीक्षा — भी, ‘एक देश एक चुनाव’, ‘एक देश एक पार्टी’, और ‘एक देश एक नेता’ की तरह की बे-सिर-पैर की कल्पना ही है? यह रूसी कम्युनिस्ट मानसिकता का ही भारतीय हिन्दू रूप जैसा है।
परन्तु, इस तरह सब कुछ एक हाथ में केंद्रित कर देना बुद्धि, विवेक, जिम्मेदारी, और गुणवत्ता का सत्यानाश करने का ही प्रबंध करना है। पूरे सोवियत कम्युनिज्म के इतिहास का सबक और क्या है? पूरे सत्तर बरस, पूरा देश चुपचाप ऊपर का मुँह देखने, और ऊटपटाँग हुक्म मानने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता था! साथ ही, जो भी गड़बड़ी हो रही हो, पहले उसे छिपाना, लीपा-पोती करना, और जब बात खुल जाए तो ‘विदेशियों’, ‘गद्दारों’, या ‘कामचोरों’ को दोष देकर फिर वैसे ही उल्टा-सीधा करते जाना। यही दशकों से सोवियत कम्युनिज्म में चलता रहा।
उसी कम्युनिज्म से स्वतंत्र भारत की अनेकानेक शासकीय नीतियाँ प्रभावित रही है। चूँकि उस से मुट्ठी भर राजनीतिक वर्ग असीम शक्ति, सुविधा, और भोग-विलास का अवसर पाता रहा है। इसलिए भी हर चीज पर राजकीय कब्जा करने, फिर केंद्रीकरण, आदि उसी पार्टी-एकाधिकारी मानसिकता की व्युत्पत्ति है। सब पर हम, सब कुछ पर हमारा चले। सब हमारे ताबेदार। जो विरोध करें, वह जनता के दुश्मन, या विदेशी एजेंट। इस तरह की बनी-बनाई रट, यहाँ भी सोवियत यूनियन से ही मिलती जुलती लंबे समय से रही है।
दशकों पहले कारखानों का, बैंकों का, अनेक उद्योग व्यापारों, आदि का राष्ट्रीयकरण उसी भावना में हुआ था। जब दशकों में भारी बर्बादी और‌ लूट करके, साथ ही अंतहीन कुव्यवस्था से आगे चलना एकदम असंभव हो गया, तब जाकर किसी तरह कुछ बदलाव हुए। वह भी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की चतुराई से, लगभग चुपचाप, छिपाकर। पर यहाँ आम राजनीतिक वर्ग की वह एकाधिकारी, मनमानी, विशेषाधिकार, राजकीय संसाधनों की छीना-झपट, आदि की मानसिकता यथावत है। शिक्षा क्षेत्र उस का एक बड़ा उदाहरण है। अभी देश के विश्वविद्यालयों के क्रियाकलापों का आम नजारा है — ‘लूट सके सो, लूट। हाँक सके सो हाँक’!
बहरहाल, केंद्रीकरण करने वालों ने यह मोटी बात भी नहीं देखी कि सालो भर, नियमित रूप से, लाखों-लाख आवेदनों को जब एक केंद्रीय कार्यालय में देखा जाएगा, सैकड़ों तरह के प्रश्न पत्र एक ही जगह बनेंगे, तो यह सब अंतिम बाबुओं, क्लर्कों, सहायकों के माथे जाएगा — न शिक्षा मंत्री, न शिक्षा सचिव, न एजेंसी के डायरेक्टर वह सब देखेंगे। वे देख भी नहीं सकते! वह भौतिक रूप से असंभव है। सो, कुल मिलाकर प्रोफेसर और शिक्षकों से उन का काम छीन लिया गया, तथा इसे एक केंद्रीय ऑफिस के यांत्रिक काम में बदल डाला गया। व्यवहार में इस का अर्थ क्या हुआ?
यही कि शिक्षक, प्रोफेसर, वाइस चांसलर, आदि तो अयोग्य अथवा अविश्वसनीय, या दोनों हैं। जबकि किसी केंद्रीय एजेंसी के ऑफिस का बड़ा बाबू, और भाड़े पर बुलाए गये, आते-जाते लोग विश्वसनीय तथा योग्य हैं! यह कैसी समझ है? यह भी याद रहे, उक्त प्रोफेसर, प्रिंसिपल, वाइस चांसलर, आदि को लाखों रूपये का वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। जबकि केंद्रीय ऑफिस के क्लर्क और ठेके वाले कंसल्टेंट्स जिन के हाथों में काम दे दिए हैं, उन्हें मामूली वेतन मिलता है। ऐसी दोहरी, पर विचित्र व्यवस्था कैसी बुद्धि है?
यह बालबुद्धि है, जो केवल भारतीय नेताओं में होती है। ध्यान देकर हमारे नेताओं का जीवनवृत्त देखें। उन में अधिकांश प्रायः जीवन में बिना कोई वास्तविक काम किए, बरसों बरस केवल लफ्फाजी, आपसी समीकरण, चापलूसी और मटरगश्ती करते हुए, विधायक से मंत्री और ऊपर चढ़ते जाते हैं। यानी, जीवन में समाज के लिए किसी ठोस, उपयोगी रोजगार करने के अनुभव से प्रायः खाली! बदले में मुख्यत: भाषण और‌ लफ्फाजी करने का अभ्यास और अनुभव। इसलिए, जब शासन हाथ में आए तब हर विषय पर या तो कल्पना से सोचते हुए, या जिस किसी के सुझाव, विचार या विदेशियों की ऊपरी नकल से निर्णय लेते हुए, फिर सब में अपना चुनावी एवं निजी स्वार्थ व अहंकार जोड़े हुए — यानी वह सब दुर्गुण जो ब्रिटिश शासकों में एक भी नहीं थे! यह बिन्दु कुछ ध्यान देने लायक है।‌
भारत के बड़े भाग पर लगभग दो सौ सालों तक ब्रिटिश राज माना जाता है। अतः तुलना करना रोचक है कि सभी के सभी ब्रिटिश शासक लंबे-लंबे समय तक फौज, व्यापार, कानून, शिक्षा, आदि किसी क्षेत्र में ठोस काम का अनुभव रखते थे। इसलिए वे अपनी, और दूसरों की भी, विशेषज्ञता को समझते थे। उस का महत्व भी जानते थे। वे खामख्याली, संदेह, या किसी क्षुद्र स्वार्थ से भी चलने वाले जीव नहीं थे। जिसे जो काम मिलता था वह उसे निष्ठा और स्वाभिमान से पूरा करने में सन्नद्ध रहता था। चूँकि वह स्वयं ईमानदार और सत्यनिष्ठ होता था, इसलिए प्रायः दूसरों को भी वैसा ही समझता था। यह एक बड़ा महत्वपूर्ण बिन्दु है। शासन के चरित्र और गुणवत्ता का मूल्यांकन करने की दृष्टि से रोचक भी।
इसीलिए पूरा ब्रिटिश राज अपना दैनं-दिन प्रशासन मौखिक वचनबद्धता और मातहतों के साथ परस्पर विश्वास पर चलता था — संदेह पर नहीं। अर्थात, जब तक कोई मामूली देसी कुली या राजा भी, विपरीत चरित्र न दिखाए, तब तक ब्रिटिश अधिकारियों के लिए हर भारतीय भी सहज विश्वसनीय था। आपस में तो वे पक्के विश्वसनीय थे ही। उन के राज में लिखित बातें केवल कानून, नियम, योजनाएं, एकाउंट, बड़े फैसले, आदि होते थे। बाकी रूटीन चीजें मौखिक चलती थीं और उस में कभी हेर-फेर, बात बदलना, गड़बड़, आदि नहीं होता था। संक्षेप में, अंग्रेज गुणवान और चरित्रवान थे, इसलिए गुणग्राहक और चरित्र का सम्मान भी करते थे। उन में ईर्ष्या-द्वेष का अभाव, और दूसरों पर विश्वास करना कोई आकस्मिक, सांयोगिक तत्व नहीं था।
कहने का मतलब यह नहीं कि यहाँ अंग्रेज शासकों, अधिकारियों में कोई निजी स्वार्थ, पदोन्नति की चाह, अच्छी पोस्टिंग, अपने बाल-बच्चों की चिन्ता, सिफारिशों का उपयोग, आदि नहीं थी। यह सब था। पर किसी जिम्मेदारी की उपेक्षा करके, अपने वर्तमान पद के कर्तव्य के प्रति बेपरवाही से, या उस में घपला करके, अपने पद या राजकोष का दुरुपयोग करके पाया जाए — ऐसा वे प्रायः कल्पना भी नहीं करते थे! इसी बात से उन की वित्तीय ईमानदारी भी जुड़ी थी।
अतः नोट करें — कट्टर से कट्टर भारतीय राष्ट्रवादी नेता, अंग्रेजों से घृणा करने वाले भारतीय भी, किसी ने कभी अंग्रेजों पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया। कभी नहीं। अंत तक नहीं। अर्थात, वायसराय से लेकर अंतिम सबाल्टर्न, यानी सब से निचला अंग्रेज सिपाही, कर्मचारी भी अपने वेतन के सिवा कुछ नहीं जानता था। यह उन के चरित्र का अंग था। यह शासक की दक्षता और विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा तत्व है।

यहाँ जब भारतीय कर्मचारियों, अधिकारियों पर विश्वास करके अंग्रेजी साम्राज्य चलने-चलाने की बात कही जा रही है — वह भी दसियों पीढ़ियों तक — तो इस तथ्य का एक गहरा अर्थ है। चूँकि आम अंग्रेज सत्यनिष्ठ, कर्तव्यपरायण थे, इसलिए दूसरों में भी जब तक किसी अदद व्यक्ति का गलत आचरण दिख न जाए, तब तक वे उसे भी यथावत सही समझते थे। फिर, उन के राज में पुरस्कार और दंड कर्म पर तय होता था, मुँह, रंग या जाति समुदाय देख कर नहीं। तदनुरूप, भारतीय लोगों में भी, अपने अनुभव से विभिन्न जातियों, समुदायों, कबीलों, क्षेत्रों, आदि की महीन विशेषताएं जानकर अंग्रेजों ने उन के प्रति ठोस, व्यवहारिक नीतियाँ रखीं थीं। वे ‘सब धान बाइस पसेरी’ की तरह सब को एक सा मान जिस किसी को कोई भी काम या पद नहीं दे देते थे! अपराधिक मामलों में कानून के समक्ष समानता के सिवा, वे हर भारतीय समूह की अपनी विशेषता के अनुरूप व्यवहार रखते थे। कारण वही था:  कर्तव्यनिष्ठा और अपने संपूर्ण राज्य के लक्ष्य का ध्यान। न कि किसी किताबी सिद्धांत या मतवाद या दलीयता या निजी स्वार्थ का आग्रह। (जारी)

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