‘पुरुषार्थ’ का अर्थ है— पुरुषेण अर्थ्यते इति पुरुषार्थः, अर्थात विवेकशील मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए किया गया श्रेष्ठ प्रयास। भारतीय वाङ्मय में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म नैतिक आधार है, अर्थ जीवन के लिए आवश्यक संसाधन है, काम इच्छाओं और आनंद का क्षेत्र है, जबकि मोक्ष आत्म-मुक्ति का सर्वोच्च लक्ष्य है।
वैदिक जीवन-दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक कल्याण को कभी एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना। जहां पाश्चात्य दर्शन अक्सर या तो भौतिकवाद की ओर झुकता है या फिर पूर्ण वैराग्य की ओर, वहीं भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन की संपूर्णता के लिए एक संतुलित, व्यावहारिक और वैज्ञानिक व्यवस्था दी, जिसे चतुर्विध पुरुषार्थ कहा जाता है।
‘पुरुषार्थ’ का अर्थ है— पुरुषेण अर्थ्यते इति पुरुषार्थः, अर्थात विवेकशील मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए किया गया श्रेष्ठ प्रयास। भारतीय वाङ्मय में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म नैतिक आधार है, अर्थ जीवन के लिए आवश्यक संसाधन है, काम इच्छाओं और आनंद का क्षेत्र है, जबकि मोक्ष आत्म-मुक्ति का सर्वोच्च लक्ष्य है। इन चारों का क्रम भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। यह मानव चेतना के क्रमिक विकास का मार्ग दिखाता है।
इन चारों में धर्म सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है। महाभारत के कर्णपर्व में कहा गया है—
धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।
अर्थात धर्म वही है, जो समाज को धारण करता है। यहां धर्म का अर्थ किसी संकीर्ण पूजा-पद्धति या संप्रदाय से नहीं है। धर्म वह नैतिक विवेक और आचार-संहिता है, जो मनुष्य के जीवन को संतुलित रखती है तथा अर्थ और काम को अनियंत्रित होकर विनाशकारी बनने से रोकती है।
अर्थ का संबंध धन, संपत्ति और संसाधनों से है। जीवन के निर्वाह, परिवार के पालन-पोषण, समाज की सेवा और अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए अर्थ आवश्यक है। सनातन दर्शन धन या समृद्धि का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे जीवन का आवश्यक पुरुषार्थ मानता है।
इसी प्रकार काम केवल इंद्रिय-सुख का नाम नहीं है। इसमें मनुष्य की सभी स्वाभाविक इच्छाएं, भावनाएं, सौंदर्य-बोध, प्रेम, कला, सृजनशीलता और वंश की निरंतरता का भाव भी शामिल है। जीवन में आनंद, संवेदना और रचनात्मकता के लिए काम का संतुलित और मर्यादित होना आवश्यक है।
इन सबका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। यही मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है। जब मनुष्य अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए अज्ञान, मोह और बंधनों से मुक्त होकर आत्मानंद को प्राप्त करता है, तब वह मोक्ष की अवस्था तक पहुंचता है।
इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये चारों पुरुषार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि अर्थ और काम का उपभोग सदैव धर्म की मर्यादा के भीतर होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।
अर्थात— हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और स्वार्थ से रहित बल हूं तथा प्राणियों में धर्म के अनुकूल, मर्यादित काम हूं।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जब अर्थ और काम धर्म से अलग हो जाते हैं, तब वे समाज में विकृति, अपराध और पतन का कारण बनते हैं। अधर्म से कमाया गया धन शोषण का रूप ले लेता है और मर्यादा से मुक्त इच्छाएं अंततः हिंसा, स्वार्थ और क्रूरता में बदल जाती हैं। इसलिए धर्म इन दोनों को सही दिशा देने वाला नियंत्रण है।
प्राचीन ऋषियों ने पुरुषार्थ चतुष्टय को केवल दार्शनिक विचार के रूप में नहीं छोड़ा, बल्कि उसे आश्रम-व्यवस्था के सामाजिक ढांचे से भी जोड़ा।
ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात विद्यार्थी जीवन में मनुष्य का पूरा ध्यान धर्म पर रहता है। इस समय वह अनुशासन, कर्तव्य, ज्ञान और चरित्र का निर्माण करता है। यही उसके आगे के जीवन की नींव बनता है।
गृहस्थ आश्रम समाज का आधार है। इसी अवस्था में मनुष्य अर्थ अर्जित करता है, परिवार का पालन करता है और काम का मर्यादित उपभोग करता है। लेकिन इन दोनों का आधार ब्रह्मचर्य में सीखा गया धर्म ही होता है।
वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य धीरे-धीरे सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठना शुरू करता है। वह अपने अनुभव समाज को समर्पित करता है और मन को मोक्ष की दिशा में तैयार करता है।
संन्यास आश्रम में मनुष्य लौकिक बंधनों का त्याग कर परम सत्य और आत्म-मुक्ति की साधना में प्रवृत्त होता है। इस अवस्था में मोक्ष ही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है।
आज इक्कीसवीं सदी का विश्व मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और नैतिक संकट से जूझ रहा है। इसका एक बड़ा कारण यही है कि पुरुषार्थों का संतुलन बिगड़ गया है। आधुनिक सभ्यता ने धर्म और मोक्ष को लगभग भुला दिया है और अर्थ तथा काम को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया है। परिणाम हमारे सामने है। अपार धन होने पर भी मनुष्य अवसाद से घिरा है, परिवार टूट रहे हैं, समाज में असंतोष बढ़ रहा है और युद्धों की विभीषिका गहराती जा रही है। मनुष्य के पास भौतिक साधन तो हैं, लेकिन जीवन का नैतिक मार्गदर्शन और अंतिम उद्देश्य धुंधला पड़ गया है।
चतुर्विध पुरुषार्थ का यह शाश्वत सिद्धांत हमें बताता है कि जीवन केवल भोग के लिए नहीं है और न ही संसार से भाग जाने के लिए। जीवन का उद्देश्य संसार में रहते हुए, मर्यादा और कर्तव्य के साथ कर्म करना तथा अंततः परम सत्य की ओर बढ़ना है। इसलिए पुरुषार्थ चतुष्टय कोई काल्पनिक दर्शन नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलन, दिशा और पूर्णता देने वाला कालजयी जीवन-दर्शन है।
जब मनुष्य का कर्म धर्म से प्रेरित होगा, उसका अर्थ लोककल्याण में लगेगा और उसकी कामनाएं मर्यादा तथा सृजनशीलता से जुड़ी होंगी, तब वह स्वाभाविक रूप से मोक्ष की दिशा में अग्रसर होगा। यही सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है।
उल्लेखनीय है कि सनातन दर्शन का एक मूल सिद्धांत यह भी है कि इस दिखाई देने वाले जगत में जो कुछ भी है, वह जड़ और चेतन के रहस्यमय संयोग का परिणाम है। सांख्य दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार प्रकृति निष्क्रिय या शून्य नहीं है। वह तीन मूल शक्तियों के संतुलन और असंतुलन से निरंतर संचालित होती रहती है। इन तीन शक्तियों को सत्त्व, रज और तम, अर्थात त्रिगुण, कहा गया है।
यहाँ ‘गुण’ का अर्थ किसी वस्तु के सामान्य गुण या विशेषता से नहीं है, बल्कि उन मूल प्रवृत्तियों से है, जो जीवात्मा को प्रकृति और संसार से बाँधे रखती हैं। संपूर्ण सृष्टि और मनुष्य का मन इन तीनों गुणों के अलग-अलग अनुपात से निर्मित है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों का अत्यंत सरल और गहन वर्णन करते हैं। ये हैं— सत्त्व (प्रकाश, ज्ञान और शांति), रज (गति, इच्छा और कर्म) तथा तम (अज्ञान, आलस्य और प्रमाद)।
सत्त्वगुण का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
अर्थात सत्त्वगुण अत्यंत निर्मल, प्रकाश देने वाला और शांति प्रदान करने वाला है। यह मनुष्य के भीतर ज्ञान, संतोष, करुणा, विवेक और एकाग्रता का विकास करता है। जब मन शांत हो, बुद्धि स्पष्ट हो और सही-गलत का निर्णय सहज रूप से होने लगे, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण प्रबल है।
रजोगुण के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं—
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
अर्थात रजोगुण आसक्ति, इच्छा और तृष्णा को उत्पन्न करता है। यही मनुष्य को कर्म, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और उपलब्धि की ओर प्रेरित करता है। संसार का अधिकांश निर्माण, व्यापार, उद्योग और आर्थिक उन्नति रजोगुण के कारण ही संभव होती है। लेकिन जब यही रजोगुण नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब वही लोभ, बेचैनी और अंतहीन दौड़ का कारण बन जाता है।
तमोगुण के बारे में श्रीकृष्ण कहते हैं—
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
अर्थात तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी प्राणियों को मोह में डाल देता है। यह आलस्य, प्रमाद, अज्ञान, भ्रम और अत्यधिक निद्रा को बढ़ाता है। तमोगुण चेतना की ऊँची अवस्थाओं को रोककर मनुष्य को जड़ता की ओर ले जाता है।
प्रकृति में ये तीनों गुण कभी अलग-अलग नहीं रहते। वे हमेशा साथ रहते हैं और निरंतर एक-दूसरे पर प्रभाव डालते रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं—
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।
अर्थात कभी सत्त्व, रज और तम पर प्रभावी हो जाता है, कभी रज सत्त्व और तम पर, और कभी तम सत्त्व तथा रज पर हावी हो जाता है।
मनुष्य के दैनिक जीवन में भी यह क्रम स्पष्ट दिखाई देता है। प्रातःकाल ध्यान, प्रार्थना और स्वाध्याय के समय मन शांत रहता है, इसलिए सत्त्वगुण प्रमुख होता है। दिन में जब मनुष्य कार्य करता है, तब रजोगुण सक्रिय रहता है। रात में जब शरीर विश्राम की ओर जाता है, तब तमोगुण प्रभावी हो जाता है।
समस्या तब पैदा होती है, जब गुण अपने उचित समय और स्थान से हट जाते हैं। यदि काम के समय आलस्य आ जाए, तो तमोगुण हावी है। यदि साधना या विश्राम के समय मन अत्यधिक चंचल रहे, तो रजोगुण बढ़ गया है। यही असंतुलन जीवन में अनेक कठिनाइयों का कारण बनता है।
यदि आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस की दृष्टि से देखें, तो त्रिगुण सिद्धांत आज भी अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है। जिसे आज अवसाद, मानसिक जड़ता और निराशा कहा जाता है, वह काफी हद तक तमोगुण की अधिकता का रूप है। इसी प्रकार अत्यधिक तनाव, अनिद्रा, बेचैनी और निरंतर प्रतिस्पर्धा रजोगुण के असंतुलन का परिणाम हैं, जहाँ मनुष्य कर्म के फल से इतना बँध जाता है कि उसे विश्राम नहीं मिल पाता।
आज आधुनिक चिकित्सा भी यह स्वीकार करने लगी है कि मानसिक संतुलन, सजगता (माइंडफुलनेस), करुणा और आंतरिक शांति मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। सनातन दर्शन इन्हीं गुणों को सत्त्वगुण का स्वरूप मानता है।
यद्यपि सनातन दर्शन तम से रज और रज से सत्त्व की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है, फिर भी उसका अंतिम लक्ष्य केवल सत्त्वगुण तक पहुँचना नहीं है। अंतिम लक्ष्य गुणातीत होना है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्त्व भी मनुष्य को सुख और ज्ञान के अहंकार से बाँध सकता है। वास्तविक मुक्ति तब मिलती है, जब मनुष्य इन तीनों गुणों को प्रकृति का स्वाभाविक खेल समझकर स्वयं को उनका साक्षी बना लेता है।
इस प्रकार त्रिगुण सिद्धांत केवल ब्रह्मांड की व्याख्या करने वाला दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने और बदलने का एक व्यावहारिक विज्ञान है। मनुष्य को पहले तमोगुण पर विजय पाकर रजोगुण को जागृत करना चाहिए। फिर उसी रजोगुण को धर्म और लोककल्याण की दिशा देकर सत्त्वगुण में रूपांतरित करना चाहिए। अंततः सत्त्व से भी ऊपर उठकर गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ना ही मानव चेतना की सर्वोच्च यात्रा है।
