बावज़ूद इस के कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कट्टर विचारधारा का घनघोर विरोधी हूं, मैं मानता हूं कि संघ-प्रमुख मोहन भागवत को, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन क्या, दुनिया में कहीं भी जा कर, अपनी बात कहने का हक़ है। न्यू यॉर्क के मेयर ज़ोहरान क्वामे ममदानी के अधिकार क्षेत्र में अगर होता भी और वे आज होने वाले भागवत के वैश्विक एकात्मकता उत्सव का आयोजन रोक देते तो मैं तो इस का विरोध करता। हालांकि मैं जानता हूं कि जिस संघ-कुनबे का मुखिया अपने उद्दंडियों को भारत के भीतर ही विभिन्न समुदायों की एकात्मकता को तहस-नहस करने से नहीं रोक पाता हो, वह दुनिया भर में बंधुत्व की भावना क़ायम करने की पहलक़दमी भला किस मुंह से कर सकता है, मगर फिर भी मैं अपना यह विचार बदलने को तैयार नहीं हूं कि भागवत को अपने विचार व्यक्त करने के लिए ब्रह्मांड के किसी भी छोर पर अपने सम्मेलन-संगोष्ठी करने का अधिकार है।
संघ-प्रमुख ने कहां क्या कहा, इस पर बहस हो सकती है। अगर वे कोई ऐसी बात कहते हैं, जो किसी देश विशेष के क़ानून-क़ायदों का उल्लंघन करती है तो उन के ख़िलाफ़ कार्रवाई में भी किसी को गुरेज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन मुंह खोलने से पहले ही उन की ज़ुबान पर ताला जड़ देने का पक्षधर कम-से-कम मैं तो नहीं हो सकता। इसलिए मैं कनाडा के दो सांसदों हीदर मैकफर्सन और जेनी क्वान की कनाडाई सरकार से की गई इस मांग को भी ग़लत मानता हूं कि भागवत को कनाडा में प्रवेश न दिया जाए और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाएं। इस महीने की शुरुआत में लिखी अपनी चिट्ठी में दोनों ने कहा था कि भागवत का इतिहास नफ़रती भाषण देने और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का समर्थन करने का रहा है। इसलिए उन्हें कनाडा में प्रवेश के अयोग्य घोषित किया जाए।
अगर भागवत का इतिहास ऐसा रहा है तो उन के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को करनी चाहिए थी। फ़िलहाल उन्होंने अमेरिका या कनाडा या ब्रिटेन की धरती पर तो ऐसा कोई अपराध किया नहीं है कि वहां के सांसद अपनी-अपनी सरकारों से आप्रवासन क़ानूनों के तहत उन के देश-प्रवेश पर पाबंदी लगाने जैसी मांग करें। भागवत की मौजूदगी से चिंतित कनाडाई सांसद वहां की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य हैं। उन के बेतुके दुराग्रह से तो उल्टे संघ-प्रमुख के वैचारिक ध्रुवीकरण की पोशीदा तमन्ना को उपजाऊ ज़मीन मिल गई। सौ से ज़्यादा इंडो-कैनेडियन संगठनों और हिंदू संस्थाओं ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को पत्र लिख कर भागवत की यात्रा का पुरज़ोर समर्थन कर डाला। मैकफर्सन और क्वान की मूर्खता ने संघ-विचार के बीजों को और तेज़ी से अंकुरित होने के लिए खाद-पानी ही मुहैया कराया। वरना भागवत जैसे गए थे, वैसे ही लौट कर घर को आ जाते।
अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में दो सौ से ज़्यादा ऐसी संस्थाएं बहुत सक्रियता से काम कर रही हैं, जिन का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष और परोक्ष अंतःसंबंध है। हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में 230 के आसपास दैनिक शाखाएं संचालित कर रहा है। विश्व हिंदू परिषद के अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के कार्यकारी-खंड भी दर्जनों की तादाद में हैं। सेवा इंटरनेशनल, हिंदू एजुकेशनल फाउंडेशन और ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ़ बीजेपी की भी तीनों देशों में हर ज़रूरी मुहल्ले तक पहुंच है। यह आज से नहीं है। 35-40 बरस पहले भी जब मैं अमेरिका गया था तो भारतीय जनता पार्टी के समुद्रपारीय मित्रों की संस्था ने तक़रीबन हर छोटे-बड़े शहर में मुझे बुलाया और विचार साझा किए थे। ओवरसीज़ कांग्रेस का मुख्यालय तो तब न्यूजर्सी में भारतीय अचार-मुरब्बे-नमकीन की एक दुकान में था। परदेस में राहुल गांधी के हाड़तोड़ दौरों के बावज़ूद ओवरसीज़ कांग्रेस संघ-संस्थाओं के सामने आज भी अगण्य है। अगर यह दलील मान भी लें कि ऐसा इसलिए है कि भारत में बारह बरस से नरेंद्र भाई की हुक़ूमत है तो भी 2004 से 2014 के दस साल की अवधि में ही ओवरसीज़ कांग्रेस कौन-सी दिन दूनी रात चौगुनी फल-फूल रही थी?
इसलिए जो लोग सोचते हैं कि परदेसी संसदों में बैठे अपने वैचारिक हमजोलियों के ज़रिए वे भागवत की आरएसएस के वैश्विक मंसूबों पर लगाम लगा लेंगे, वे अल्पमति की मीनार में कै़द हैं। वे विदेशों में भागवत-पुराण के वाचन की जितनी ही मुख़ालिफ़त करेंगे, संघ की शाखाएं उतनी ही मजबूत होती जाएंगी। उस की हर शाख पर बैठे घुग्घूओं के बावज़ूद संघ की डालियां मांसल ही होती जाएंगी। अभी तो दूर-दूर तक पतझड़ के ऐसे किसी मौसम के आसार नहीं हैं, जिस में संघ-वृक्ष की देसी-विदेषी प्रजातियों के पत्ते सूख कर झर जाएं। इसलिए उन की जड़ों में डालने के लिए मट्ठे का मटका ले कर विचरने के बजाय सकारात्मक षक्तियों को ख़ुद की जड़ें सींचने के लिए गंगाजल ले कर डगर-डगर डोलने पर ध्यान देना चाहिए।
सौ से ज़्यादा देशों में आरएसएस किसी-न-किसी शक़्ल में मौजूद है। 40 देशों में तो उस की बाक़ायदा शाखाएं लगती हैं। तक़रीबन एक दर्जन मुस्लिम-बहुल मुल्क़ों में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय है। खाड़ी के देशों में भी उस के सहयोगी संगठनों की ख़ासी उपस्थिति है। इस्लामी मुल्क़ों में चूंकि बाहर मैदान में शाखा लगाने की इजाज़त नहीं है, सो, शाखाएं घरों के भीतर लगती हैं। सैकड़ों ई-शाखाएं भी संचालित हो रही हैं। आरएसएस के विश्व विभाग ने पिछले 12 बरस में विदेशों में अपने पैर बेतरह पसारे हैं। नरेंद्र भाई जब प्रधानमंत्री बने थे, तब 39 देशों में संघ की 570 शाखाएं संचालित हुआ करती थीं। आज 55 देशों में संघ की 3200 शाखाएं और केंद्र संचालित हो रहे हैं। 2014 के बाद से आरएसएस ने यूरोप के बहुत-से देशों में अपना काम काफी तेज़ कर दिया है। जर्मनी, डेनमार्क, स्पेन, नीदरलैंड और नॉर्वे में संघ-गतिविधियों की उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि कोई तुलना है नहीं, मगर दिल को बहलाने के लिए अगर कोई तुलना करना ही चाहे तो इंडियन ओवरसीज़ कांग्रेस की इकाइयां महज़ 32 देशों में काम कर रही हैं और यह संख्या तकनीकी ज़्यादा और व्यावहारिक कम है। आज की डिजिटल दुनिया के परिदृश्य के मद्देनज़र अगर आप इंडियन ओवरसीज़ कांग्रेस की अधिकारिक वेबसाइट के सफ़र पर निकल जाएं तो उस की दयनीय दशा देख कर आप की आंखें भर आएंगी। चेयरमेन सत्यनारायण गंगाराम (सैम) पित्रोदा को इतने कुपोषित अनुष्ठान का पुरोहित होने पर कितना गर्व है, कितना नहीं, मुझे मालूम नहीं, मगर ज़्यादातर लोग तो यही मानते हैं कि सारा उपक्रम छू कर निकल जाने जैसा लगता है। अब यह तो इंडियन ओवरसीज़ कांग्रेस के सागर में राहुल गांधी की स्कूबा डाइविंग से ही कभी सामने आए-तो-आए कि उस के अंतःजल में कितनी मैरीन लाइफ़ है और कितनी कोरल रीफ़्स वह अपने में समेटे है। मुझे तो उस के जीवंत जीवन और प्रवाल भित्तियों के घनत्व की बलैंया लेने को उमड़ता समूह किसी भी देश में दिखाई देता नहीं है।
वैचारिक प्रवाह की त्वरा में और सांगठनिक शक़्ल में उस की तब्दीली में आकाश-धरती का अंतर होता है। रूमानी ख़यालात और ज़मीनी हक़ीक़त के दो किनारों को आलिंगनबद्ध करने के लिए ’गिली-गिली छू’ बोल देना काफी नहीं होता है। उस के लिए तो धोती चढ़ा कर मैदान में उतरना पड़ता है। इसलिए भागवत किसी जादू की छड़ी से ग़ायब होने वाले प्राणी नहीं हैं।
