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बच्चों की इंटरनेट पहुंच में अभिभावकों का जिम्मा

अभिभावकों की भूमिका अहम है। डिजिटल साक्षरता केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। माता-पिता को भी समझना होगा कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन नियमित संवाद, समय-सीमा और सकारात्मक उपयोग की आदत डालना जरूरी है।… संतुलन ही भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मजबूत और जिम्मेदार डिजिटल समाज की नींव रखेगा।

सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें बच्चे भी शामिल हैं। यह अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है। कोर्ट ने बच्चों पर इंटरनेट के पूर्ण प्रतिबंध को असंगत और अनुपातहीन माना, जबकि बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग और हटाने के लिए सख्त व्यवस्था करने का निर्देश दिया। साथ ही ‘चाइल्ड मोड’, अभिभावकीय सहमति और लक्षित सुरक्षा उपायों का सुझाव भी दिया। यह फैसला ‘डिजिटल इंडिया’ में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन अब जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। लाखों बच्चे शिक्षा, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क और जानकारी के लिए ऑनलाइन दुनिया पर निर्भर हैं। कोविड काल के बाद डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन इसके साथ ही इसके जोखिम भी बढ़े। सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, गेमिंग की लत और बाल शोषण के मामले बार-बार सामने आते रहे हैं।

कुछ राज्यों में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं चिंताओं के बीच यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पूर्ण प्रतिबंध न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह बच्चों को डिजिटल साक्षरता और अभिव्यक्ति के अवसर से भी वंचित कर सकता है।

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया। उसने बाल यौन शोषण सामग्री के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने, प्लेटफॉर्म्स के लिए त्वरित रिपोर्टिंग की समय-सीमा तय करने और मजबूत मॉडरेशन तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया। देखा जाए तो यह कदम आवश्यक था, क्योंकि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या हल नहीं होती।

इंटरनेट पर हानिकारक सामग्री तेजी से फैलती है और तकनीकी समाधान के बिना उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। कोर्ट ने ‘चाइल्ड मोड’ जैसी व्यवस्था का सुझाव देकर एक मध्यम मार्ग अपनाया है, जिसमें खाते डिफॉल्ट रूप से निजी हों, अजनबियों से संपर्क सीमित हो और विज्ञापन तथा सामग्री का उचित मॉडरेशन हो। यह व्यावहारिक दृष्टिकोण है, जो पूर्ण प्रतिबंध की जगह जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है।

भारत में इस फैसले का महत्व और भी अधिक है क्योंकि यहां डिजिटल डिवाइड अभी भी मौजूद है। शहरी और शिक्षित परिवारों में बच्चे आसानी से स्मार्टफोन और इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जबकि कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में इसकी पहुंच सीमित है। पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जो बच्चे पहले से ही डिजिटल अवसरों से वंचित हैं, वे और पीछे रह जाएंगे।

दूसरी ओर, जिनके पास पहुंच है, उनके लिए बिना उचित मार्गदर्शन के सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अध्ययनों और रिपोर्टों में किशोरों में चिंता, अवसाद और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ने के संकेत मिले हैं। ऐसे में कोर्ट का यह रुख सही है कि समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा और तकनीकी सुरक्षा में है।

इस फैसले से सरकार, टेक कंपनियों और अभिभावकों तीनों की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। सरकार को अब मजबूत नियामक ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सुनिश्चित हो, लेकिन बच्चों के अधिकारों का हनन न हो। टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और मॉडरेशन सिस्टम को और पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा। भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे पहली बार इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, कंपनियों को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय विकसित करने चाहिए। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। डिजिटल साक्षरता केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। माता-पिता को भी समझना होगा कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन नियमित संवाद, समय-सीमा और सकारात्मक उपयोग की आदत डालना जरूरी है।

स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में सक्रिय होना होगा। डिजिटल नागरिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे ऑनलाइन जोखिमों को पहचान सकें और इंटरनेट के सुरक्षित व्यवहार सीख सकें। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता को भी मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक चेतावनी भी है। यदि सरकार और प्लेटफॉर्म्स प्रभावी कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में और अधिक सख्त हस्तक्षेप की मांग उठ सकती है। दूसरी ओर, अगर सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और डिजिटल असमानता को बढ़ाएगा। संतुलित दृष्टिकोण ही भारत के लिए सही है। हमें एक ऐसा डिजिटल वातावरण चाहिए जहां बच्चे सीख सकें, सृजन कर सकें और सुरक्षित रह सकें। इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। समाज, परिवार, स्कूल और तकनीक कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।

कुल मिलाकर, यह फैसला हमें याद दिलाता है कि डिजिटल युग में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं। इंटरनेट एक शक्तिशाली साधन है, जो ज्ञान और अवसर देता है, लेकिन बिना सावधानी के यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सही दिशा दिखाई है। अब जरूरत है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भारत के बच्चे डिजिटल युग का लाभ उठा सकें और उसकी चुनौतियों से सुरक्षित रह सकें। यह संतुलन ही भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मजबूत और जिम्मेदार डिजिटल समाज की नींव रखेगा।

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