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लड़ाकू विमान अपग्रेड का हाल कहीं पहल जैसा न हो

दावा है कि छठी पीढ़ी की ओर अपग्रेड से ‘एमका’ अमरीका के ‘नेक्स्ट जनरेशन एयर डोमिनेन्स’ (NGAD) या चीनी छठी पीढ़ी कार्यक्रमों से मुकाबला अवश्य कर सकेगा। लेकिन वहीं इस परियोजना में चुनौतियां भी हैं। जैसे कि इंजन विकास में देरी, फंडिंग की कमी और समयसीमा का पालन। इसलिए यदि ‘एमका’ को एक सफल परियोजना बनाना है तो सरकार को समय पर फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां सुनिश्चित करनी चाहिए।

उन्नत माध्यमिक लड़ाकू विमान (AMCA) को 5.5वीं और छठी पीढ़ी में अपग्रेड करना भारत की रक्षा क्षमताओं में एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। हाल के वर्षों में, भारत ने अपनी वायु सेना को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी तकनीकों पर जोर दिया है। ‘एमका’ कार्यक्रम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। 2026 तक, ‘एमका’ को 5.5वीं पीढ़ी और आगे छठी पीढ़ी के स्तर तक अपग्रेड करने की योजना ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। इस योजना के तहत, नई स्टेल्थ तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग पर ज़ोर दिया गया है। सवाल उठता है कि क्या यह भारत की वैश्विक वायु क्षेत्र में स्थिति को कैसे मजबूत करेगा और क्या यह अमेरिका तथा चीन से मुकाबला करने में सक्षम होगा?

‘एमका’ कार्यक्रम की शुरुआत 2011 में हुई थी, जब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट विकसित करने का फैसला किया। उल्लेखनीय है कि, ‘एमका’ एक ट्विन-इंजन, सिंगल-सीट विमान है, जिसका वजन लगभग 27 टन है और यह मैक 2.15 की गति से उड़ान भर सकता है। Mk1 संस्करण GE F414 इंजन का उपयोग करेगा, जबकि Mk2 को 110-120 kN थ्रस्ट वाले नए इंजन से लैस किया जाएगा, जो फ्रांस की साफरान या अन्य साझेदारों के साथ सह-विकासित होगा। 2026 तक, ‘एमका’ Mk2 को 5.5वीं पीढ़ी का दर्जा दिया जा रहा है, जिसमें छठी पीढ़ी की विशेषताएं जैसे AI-संचालित इलेक्ट्रॉनिक पायलट और प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस शामिल हैं। इसका प्रोटोटाइप रोलआउट 2028 के अंत तक और पहली उड़ान 2029 में होने की उम्मीद है, जबकि इंडक्शन 2035 तक हो सकता है। यह अपग्रेड भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा, जो पांचवीं पीढ़ी के विमान संचालित करते हैं।

जानकारों का मानना है कि ‘एमका’ में अपनाई जा रही नई स्टेल्थ तकनीक भारत की वायु रक्षा को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करेगी। स्टेल्थ का मतलब है रडार से बचाव, जो विमान को दुश्मन की नजरों से छिपा कर रखता है। ‘एमका’ में डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट (DSI), सर्पेंटाइन एयर इनटेक डक्ट और उन्नत रडार-एब्जॉर्बेंट मटेरियल्स का उपयोग किया जा रहा है। ये विशेषताएं रडार सिग्नेचर को न्यूनतम करती हैं, जिससे विमान दुश्मन के वायु रक्षा सिस्टम को भेद सकता है। उदाहरण के लिए, एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी ने हाल ही में एक नए इंटेक डिजाइन का विकास किया है, जो 98% प्रेशर रिकवरी सुनिश्चित करता है, जो स्टेल्थ और इंजन दक्षता के बीच संतुलन भी बनाता है। यह तकनीक ‘एमका’ को चीनी J-20 या अमेरिकी F-35 जैसे विमानों से बेहतर छिपाव प्रदान करेगी।

गौरतलब है कि ‘एमका’ में ‘इलेक्ट्रॉनिक पायलट’ नामक AI-सिस्टम होगा, जो पायलट के साथ सहयोगी की भूमिका निभाएगा। यह AI खतरे का पता लगाने, रूट ऑप्टिमाइजेशन, कॉम्बैट स्ट्रैटेजी और मिशन प्लानिंग में मदद करेगा। इसके अलावा, AI-आधारित प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस से विमान की उपलब्धता दर 75% तक पहुंच जाएगी, जो वर्तमान विमानों से कहीं अधिक है। सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर सिस्टम ‘एमका’ को ड्रोन स्वार्म्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स के साथ एकीकृत करेगा। यह छठी पीढ़ी की दिशा में कदम है, जहां AI स्वायत्त निर्णय लेने में सक्षम होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अपग्रेड भारत की वायु सेना को आधुनिक युद्धों में बढ़त देगा, जहां AI और स्टेल्थ निर्णायक कारक हैं।

रक्षा विशेषज्ञ यह सवाल भी उठा रहे हैं कि इस अपग्रेड से भारत की वैश्विक वायु क्षेत्र में स्थिति कैसे सुधरेगी? यह स्वदेशी तकनीक पर निर्भरता बढ़ाएगा, जो आयात पर निर्भरता कम करेगा। वर्तमान में, भारतीय वायु सेना में स्क्वाड्रन की कमी है, और ‘एमका’ इस कमी को पूरा करेगा।

स्टेल्थ और AI से लैस ‘एमका’ भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मजबूत डिटरेंस प्रदान करेगा। चीन के साथ सीमा विवादों में, ‘एमका’ J-20 का मुकाबला कर सकेगा, जो वर्तमान में भारत के लिए चुनौती है। पाकिस्तान के चीनी J-10 या JF-17 के खिलाफ भी यह श्रेष्ठ होगा। वैश्विक स्तर पर, ‘एमका’ भारत को क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे गठबंधनों में मजबूत भागीदार बनाएगा। यह एशिया में पावर बैलेंस को भारत के पक्ष में झुका सकता है, क्योंकि यह चौथा देश होगा जो स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विमान विकसित करेगा।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका के F-22 और F-35 परिपक्व तकनीक वाले लड़ाकू विमान हैं, जिनमें दशकों का अनुभव है। ‘एमका’ की स्टेल्थ और AI विशेषताएं F-35 से तुलनीय हैं, लेकिन उत्पादन और संचालन अनुभव की कमी एक कमजोरी है। हालांकि, ‘एमका’ की लागत कम होगी और यह भारत की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप होगा। वहीं चीन के J-20 के खिलाफ, ‘एमका’ की उन्नत स्टेल्थ और AI बढ़त दे सकती है, खासकर LAC पर, जहाँ J-20 की संख्या अधिक है, लेकिन ‘एमका’ की AI एकीकरण से भारत गुणवत्ता में आगे निकल सकता है। दावा है कि छठी पीढ़ी की ओर अपग्रेड से ‘एमका’ अमरीका के ‘नेक्स्ट जनरेशन एयर डोमिनेन्स’ (NGAD) या चीनी छठी पीढ़ी कार्यक्रमों से मुकाबला अवश्य कर सकेगा। लेकिन वहीं इस परियोजना में चुनौतियां भी हैं। जैसे कि इंजन विकास में देरी, फंडिंग की कमी और समयसीमा का पालन। इसलिए यदि ‘एमका’ को एक सफल परियोजना बनाना है तो सरकार को समय पर फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां सुनिश्चित करनी चाहिए। यह न केवल रक्षा बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता का प्रतीक है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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