अब तमाम शैक्षिक संस्थानों में छात्रों को स्थाई रूप से आपसी द्वेष, डर और आक्रोश में उलझाना इस का सब से घृणित उदाहरण है। यूजीसी निर्देश के क्रम में ही, इस से पहले जाति उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटना, नये-नये आरक्षण बढ़ाना, जाति-गणना, आदि हो चुके हैं। यह सब नेताओं के कारनामे हैं।…. योग्यता परीक्षा में शून्य नंबर लाने वाले भी पीएच.डी. में दाखिला दे ले लेते है। बिन सोचे कि वैसे नकली पीएच.डी. किस लिए? ऐसा शिक्षक नियुक्त करना, जो खुद सिफर है….
भारतीय नेताओं का एक वर्ग ऐसे काम सोचता रहता है, जिस से लोगों में द्वेष, संदेह, और आक्रोश फैलता है। वही नेता देश की एकता, उन्नति, ज्ञान, आदि बातें भी करते हैं। दोनों गतिविधि साथ-साथ चलती है।
यही सब करने वाले होशियार समझे जाते हैं। उन की काबिलियत का एक ही तर्क है कि चुनाव जीतते हैं। चुनावी तिकड़म ही उन की बुद्धि में सर्वोच्च योग्यता है, इसलिए उस हेतु कुछ भी उल्टा-सीधा करते रहना सही मान लिया गया है! वह सब रोकने के बजाए सभी दल वही लालसा रखते हैं।
इस तरह, एक ओर सामाजिक विखंडन, तमाम संस्थाओं का दलीय स्वार्थ में दुरुपयोग, अकादमियों का मुंशीकरण-वानरीकरण; तथा दूसरी ओर चुनाव जीतना — दोनों गतिविधियाँ एक-दूसरे की पूरक होती जा रही हैं। चुनाव जीत कर संस्थाओं का दुरुपयोग, ताकि फिर चुनाव जीतें। चाहे इस में सभी संस्थाएं चौपट हो जाएं।
अब यह एक दुष्चक्र सा बन गया है — चुनाव जीतने के लिए समाज को द्वेष-लोभ से बाँटना, और बँटे समाज द्वारा अपेक्षित वोट करवाना। यह दुष्चक्र तोड़ने तो क्या, इसे समझने की क्षमता भी हिन्दू समाज में नहीं दिख रही। आगे परिणाम जो भी हो। पर आसार अच्छे नहीं हैं। ट्रंप से लेकर मदनी तक की भाव-भंगिमाएं, तथा संसद से लेकर रूपया और विश्वविद्यालय, सभी सतत अवमूल्यन के संकेत दे रहे हैं।
सो, चुनावी इंजीनियरिंग में जाति-द्वेष फैलाना मुख्य गतिविधि है। कथित दलित जातियों, जो संविधान में ‘अनुसूचित’ जातियाँ कही गई, को पीड़ित कह कर उकसाना, और उन से दूसरों का दुराव बढ़ाना ही वह इंजीनियरिंग है। उन जातियों के लोग ‘दलित’ या ‘पिछड़े’ जैसी किसी संज्ञा से न पहले अपने को जानते थे, न आज। यह राजनीतिक पावर-गेम के नये मुहावरे हैं, जिन का उपयोग द्वेष-आक्रोश की राजनीति फैलाने में होता है।
वरना, उन ‘अनुसूचित’ जातियों की सामाजिक स्थिति 1956 तक ही काफी सुधर गई, यह डॉ अंबेडकर ने ही कहा था। वह सुधार सभी हिन्दुओं के सहयोग से हुआ। तब से उन जातियों की स्थिति काफी मजबूत हो चुकी है। परन्तु सारी सकारात्मक बातें किनारे कर, केवल नये-नये झगड़े लगाने की तरकीब की जाती है।
अब तमाम शैक्षिक संस्थानों में छात्रों को स्थाई रूप से आपसी द्वेष, डर और आक्रोश में उलझाना इस का सब से घृणित उदाहरण है। यूजीसी निर्देश के क्रम में ही, इस से पहले जाति उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटना, नये-नये आरक्षण बढ़ाना, जाति-गणना, आदि हो चुके हैं। यह सब नेताओं के कारनामे हैं। सब कामों का लक्ष्य है: लोगों में दुराव फैले। एक में लोभ और दूसरे में प्रतिक्रिया बढ़े। ताकि हालात का धूर्ततापूर्ण इस्तेमाल कर नेता अधिक संख्या वालों का वोट खींचे।
एक बड़े नेता ‘कला और संस्कृति’ में भी आरक्षण की बात कर चुके हैं। वे राजपदों पर भ्रष्टाचार करते रहकर भी बड़े राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित हुए। इस तरह, कुर्सी-सनक में शिक्षा और अकादमियाँ ही नहीं, राष्ट्रीय सम्मानों, पुरस्कारों की भी दुर्गति की जा चुकी है। हर चीज में अपनी गद्दी का हिसाब — चाहे समाज, संस्कृति, या देश का भी कुछ भी होता जा! क्या ऐसा आंतरिक ध्वंस कोई बाहरी शत्रु भी कर सकता है?
जबकि मूल आरक्षण व्यवस्था सीमित थी। वह भी मात्र दस वर्ष के लिए। लेकिन पचहत्तर साल बाद भी आरक्षण जारी रख कर, उस के और भी नये-नये क्षेत्र, तरीके बनाये जा रहे हैं। जबकि सभी सत्ता निकायों, संसद, विधान सभाओं, सर्वोच्च पदों, और तमाम राष्ट्रीय, राजकीय संस्थानों में अनुसूचित जातियों जनजातियों की उपस्थिति दशकों से नियमित बन चुकी है। तब भी, उन के लिए विशेष छूट, सुविधा, आदि जारी रहना, बल्कि चित्र-विचित्र नये-नये विशेषाधिकार देना जो यूजीसी वाले निर्देश में आया — यह सब केवल वोट बटोरने का मंसूबा है।
निस्संदेह, आज तमाम आरक्षणों, विशेष जातिगत सुविधाओं का अपने मूल लक्ष्य से कोई संबंध नहीं रह गया है। अब यह छीन-झपट का औजार है। इसीलिए अब मंडल कमीशन की तरह किसी दिखावटी औचित्य से अनुशंसा कराने की औपचारिकता भी नहीं होती। बस, कुर्सी-नेता की मर्जी काफी है। किसी विमर्श की जरूरत ही नहीं! जबकि मूल आरक्षण नीति भी घोषित लक्ष्य नहीं पा सकी। अतः अब उस के बदले भी कुछ और करना उचित होता। जो समानता और योग्यता, दोनों को प्रोत्साहित करता।
परन्तु तमाम सचाइयों की अनदेखी करते हुए आरक्षण को हर दिशा में बढ़ाया जा रहा है। इस मतिहीन नीति ने ऐसे बेशुमार पदधारी बना दिए जो अयोग्य हैं। जबकि योग्य व्यक्ति वंचित हैं। यानी, उन पदों के अपेक्षित कार्य होने-न-होने से मतलब ही नहीं। बस, कुर्सी पर नेता की पकड़ संसाधनों की बंदर-बाँट चलती रहे। संविधान में लिखे समानता, अ-भेदभाव के सिद्धांत ताक पर जा चुके हैं। इसीलिए, अब संविधान की पूजा पर जोर है — जैसे किसी मृतक का स्मृति-आडंबर अधिक होता है।
क्योंकि न यह संविधान, न कोई न्याय-दर्शन कहता है कि किसी को इसलिए वंचित करें, क्योंकि ‘सदियों पहले’ उन के पूर्वजों ने अन्य को ‘वंचित किया होगा’। यही तर्क आरक्षण की मार भोगने वालों को पिलाया जाता है। यह झूठा तर्क दोहरा जुल्म है। एक तो, किसी को उस के अनाम ‘पूर्वजों के जुर्मों’ की सजा देना जुल्म है। दूसरे, उन पूर्वजों ने ऐसे जुर्म किए थे, यह भी केवल घोषित कर दिया गया है। न इस का परीक्षण हुआ, न कोई प्रमाण है। चूँकि कोई प्रमाण नहीं, इसीलिए इस का परीक्षण नहीं किया जाता।
आखिर, विराट सच तो यह है कि 11-12वीं सदी से भारत के बड़े भाग पर मुस्लिम आक्रांताओं का राज और अत्याचार छ: सदियों तक रहा (‘पूर्वजों के अत्याचार’ वाली थ्योरी से वर्तमान मुसलमान उन के उत्तराधिकारी हैं)। तब मुस्लिम राज की उन छ: सदियों में हिन्दुओं ने एक दूसरे को कब और कैसे उत्पीड़ित किया — जब कि सभी हिन्दू इस्लामी जिहाद के निशाने पर समान शिकार थे?
सो, इन जातियों ने उन जातियों को ‘हजारों साल से’ उत्पीड़ित किया, यह झूठ हाल में गढ़ा गया है। संविधान निर्माताओं ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। पर अब कुर्सी-नेता मनगढ़ंत रूप से ब्राह्मणों को दोष देते हैं। जब कि सदा से हर पारंपरिक कहानी ‘एक गरीब ब्राह्मण था’ ही रही है। विश्वामित्र से द्रोण और ब्रिटिश काल तक वही था। इसलिए लोभी नेता नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं!
सारी दलीलें दिखावटी हैं। अब आरक्षण और जातिगत कानूनी विशेषाधिकार केवल राजनीतिक जबर्दस्ती के हथियार हैं। इसीलिए जब भी न्यायपालिका ने उस में कुछ भी सुधार किया, तो संविधान संशोधन कर उसे पलट दिया गया। अब तक कम से कम सात बार ऐसे संशोधन हो चुके हैं। जबकि शिक्षा की गुणवत्ता की गारंटी करने कोई विधेयक आज तक नहीं आया। न ही सब को अपनी-अपनी भाषा में ही बड़े अंग्रेजी स्कूलों की तरह अच्छी शिक्षा मिल सकने के लिए कुछ सोचा गया। इस से साफ है कि ‘भेद-भाव खत्म करना’ या ‘समान अवसर’ बनाना नेताओं की चिंता ही नहीं है।
इसीलिए, योग्यता परीक्षा में शून्य नंबर लाने वाले को भी पीएच.डी. में दाखिला दे दिया जाता है। बिन सोचे कि वैसे नकली पीएच.डी. किस लिए? ऐसा शिक्षक नियुक्त करना, जो खुद सिफर है, सब की हानि करना है। उन छात्रों की भी जो शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं।
निस्संदेह, यह सब मूल संविधान की कल्पना न थी, जिस की आत्मा की हत्या कर अब पूजा शुरू की गई है। फलत: भारत अन्य देशों के सामने गिरता जा रहा है। राजकीय तंत्र रुग्ण हो गया है। उस का आकार तो बढ़ता गया, किन्तु ऊपर से नीचे तक पदधारियों की योग्यता की परवाह नहीं रही। यदि महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकांश लोग योग्यता की बजाए अन्य कारणों से नियुक्त हो रहे हों तो पूरा राज्यतंत्र अकर्मक बनता जाएगा। इस के दुष्परिणाम कहीं तक जा सकते हैं। भारतीय नेता अपने ही हाथों से अपने देश को तहस-नहस करने में लगे हैं!
अंग्रेज शासकों ने कभी वैसा नहीं किया था। जिन्हें झूठ-मूठ ‘फूट डालो राज करो’ का जनक कहा जाता है। उलटे, उन्होंने ही पूरे भारत को पहली बार राजनीतिक रूप से एक किया था। उन्होंने ही यहाँ पहली बार कानूनी समानता स्थापित की, तथा तमाम प्रतिभाओं को उभरने का अवसर, साधन एवं प्रोत्साहन भी दिया। वरना, 12वीं से 18वीं सदी तक भारत में कैसी ‘एकता’ थी? कौन सी ‘राष्ट्रीय’ संस्थाएं थी? पृथ्वीराज चौहान और जवाहरलाल नेहरू के बीच साढ़े सात सौ सालों में हिन्दू भारत की क्या स्थिति थी? क्या जजिया भरते हुए, और हर तरह से जलील होने वाले हिन्दू लोग मुसलमानों के साथ एकता में रहते थे?
साफ देख सकते हैं कि अंग्रेजों को फूट डालने की जरूरत ही नहीं थी। वैसे भी, उन का राज अपनी सैन्य-शक्ति; भारतीय राजाओं के साथ आपसी सहयोग; तथा आम जनगण के लिए शान्ति-सुव्यवस्था करने के बल पर हर तरह से सुदृढ़ था। इसीलिए अंग्रेजी राज को 1858 से लेकर अंत कभी कोई चुनौती नहीं रही थी। उलटे भारत का हर वर्ग उन से निकटता का इच्छुक रहा था। पर राष्ट्रवादी नेताओं ने झूठे इतिहास और अपने ही नारों से अपना माथा खराब कर लिया है। वे खुद द्वेष फैला कर राज करते हैं, और दोष दूसरों को देते हैं।
