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विश्व शांति के लिए जरूरी है आपसी समझ

महोपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य—“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”—दुनिया को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है। ईशोपनिषद कहता है कि जो सबमें स्वयं को और स्वयं में सबको देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।

23 फरवरी- विश्व शांति व आपसी समझ दिवस

पॉल हैरिस ने 1905 में रोटरी इंटरनेशनल की स्थापना की थी। उनकी पहली बैठक की याद में हर साल 23 फरवरी को विश्व शांति और समझ दिवस मनाया जाता है। 23 फरवरी 1905 को शिकागो में पॉल हैरिस और उनके तीन साथियों ने पहली रोटरी क्लब की बैठक की थी। अलग-अलग संस्कृतियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाकर संघर्ष कम करने और विश्व शांति स्थापित करने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि आपसी समझ और सहानुभूति ही युद्ध खत्म करने और सामंजस्यपूर्ण समाज बनाने का सबसे प्रभावी मार्ग हैं।

रोटरी इंटरनेशनल का मुख्य उद्देश्य मानवीय सेवा के माध्यम से शांति, सद्भावना और आपसी समझ को बढ़ाना है। भारत के लिए यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अहिंसा परमो धर्मः और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे सिद्धांतों को विश्व मंच पर दोहराने का अवसर देता है। गांधीवादी विचार के अनुसार शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि न्याय और करुणा की उपस्थिति है। इस दिन दुनिया भर में रोटरी क्लब और अन्य संगठन शांति संगोष्ठियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सेवा कार्य आयोजित करते हैं। आज जब दुनिया में संघर्ष और मतभेद बढ़ रहे हैं, यह दिवस संवाद और समझ के माध्यम से समाधान खोजने का संदेश देता है।

यह दिवस 22 फरवरी को मनाए जाने वाले विश्व चिंतन दिवस के अगले दिन आता है। यह विचार से शांतिपूर्ण कार्य की ओर बढ़ने का सुंदर संकेत है। भारत में विश्व शांति और आपसी समझ की परंपरा बहुत प्राचीन है। वैदिक ऋषियों ने केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, जल, वायु और अंतरिक्ष की शांति के लिए भी प्रार्थना की। यजुर्वेद (36/17) का शांति मंत्र इसका उदाहरण है—“ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः…”

अर्थात आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो और वनस्पतियों में शांति हो। यह बताता है कि प्रकृति में संतुलन होगा, तभी मनुष्य को सच्ची शांति मिलेगी। ऋग्वेद (10/199) का संगठन सूक्त कहता है—

“सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्…”

अर्थात साथ चलो, साथ बोलो और मन भी एक जैसा बनाओ। यह मंत्र मतभेद मिटाकर सामूहिक समझ पर जोर देता है। अथर्ववेद के सामनस्य सूक्त में सभी मनुष्यों के बीच प्रेम और समान भाव की कामना की गई है। यजुर्वेद में कहा गया है—

“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”

अर्थात मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूं। यही विश्व शांति का आधार है। उपनिषद और पुराण भी एकता और करुणा का संदेश देते हैं। महोपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य—“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”—दुनिया को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है। ईशोपनिषद कहता है कि जो सबमें स्वयं को और स्वयं में सबको देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता। श्वेताश्वतर उपनिषद में “शृण्वन्तु सर्वे अमृतस्य पुत्राः” कहकर पूरी मानवता को एक माना गया है।

पुराणों का सार परोपकार है। “परोपकाराय पुण्याय” का संदेश देता है कि दूसरों की सहायता करना पुण्य है और कष्ट देना पाप। पद्म पुराण का वाक्य—“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”—बताता है कि जो व्यवहार हमें अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरों के साथ न करें। “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु” की प्रार्थना समस्त जगत के सुख की कामना करती है।

भारतीय दृष्टि में विश्व शांति केवल कूटनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान है। जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” को वैश्विक मंच पर रखा। बुद्ध, महावीर और गांधी ने अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाया। आज जब दुनिया यूक्रेन या मध्य-पूर्व जैसे संघर्षों से जूझ रही है, भारत “यह युद्ध का युग नहीं है” का संदेश देता है। भारत विविधताओं से भरा देश है, जहां अनेक भाषाएं और धर्म साथ रहते हैं। सहिष्णुता और स्वीकार्यता का यह अनुभव विश्व के लिए उदाहरण है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से भारत मानसिक शांति और संतुलन का मार्ग दिखाता है। कोविड-19 और अन्य संकटों के समय भारत ने दवाइयों और सहायता के माध्यम से सहयोग दिया। भारत के लिए विश्व शांति बाहरी नीति नहीं, आंतरिक संस्कार है। हमारी विदेश नीति में वैदिक और पौराणिक मूल्यों की झलक मिलती है। “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” इसी सोच का आधुनिक रूप है। भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ की आवाज़ और देशों के बीच सेतु के रूप में प्रस्तुत करता है।

पंचशील के सिद्धांत भी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित हैं। भारत रूस-यूक्रेन और गाजा जैसे संघर्षों में संवाद और कूटनीति का आग्रह करता है। हाल में वाशिंगटन में बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में भागीदारी उसकी सक्रिय भूमिका को दर्शाती है। भारत ने सम्मान, संवाद, समृद्धि, सुरक्षा और संस्कृति के आधार पर अपनी कूटनीति को रूप दिया है। 2026 के वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति यथार्थ और आदर्श का संतुलन है, जिसमें राष्ट्रीय हितों के साथ विश्व कल्याण को भी महत्व दिया जाता है।

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