मैंने वह समय देखा है जब चौधरी चरण सिंह ने ‘असली भारत’ की बात करते हुए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। फिर वह भी समय जब हिंदू भारत की हवाबाजी में नरेंद्र मोदी ने शपथ ली। दोनों समय का कुल परिणाम क्या? मोटामोटी राम-राम सा बोलने वाले आम हिंदुओं से धोखा। कथित असली भारत का किसान आज भी बेचारा है। वही राम के नाम पर संघ, भाजपा और नरेंद्र मोदी को जिताने वाला हिंदू अपने धर्म की ऐसी-तैसी होते देख रहा है! बिचारें 1990 की राम रथ यात्रा से 2026 में राम मंदिर के कुल 36 साला इतिहास पर? गांव-गांव से शिला-चंदा एकत्र करने से ट्रस्टियों की चढ़ावा चोरी के कथित सांस्कृतिक पुनर्जागरण वाले मौजूदा हिंदू राष्ट्रवाद पर?
इतिहास में गजनवी मंदिरों को लूटने के लिए बार-बार भारत आता था। वही हिंदुस्तान अब बतौर हिंदू राष्ट्र मंदिरों को लूटने यानी चढ़ावा खाने की आधुनिक व्यवस्थाएं लिए हुए है।
क्या मैं गलत हूं? क्या यह विचित्र हिंदू भारत नहीं है? वह भारत जिसमें संवेदना, शर्म, जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व कोई नहीं है। सभी आंख-नाक-कान बंद किए ठूंठ भाव, ठूंठ हिंदू राष्ट्र बना बैठे हैं। मैंने गुरुवार को एक टीवी चैनल पर विरोधी नेता अखिलेश यादव, कांग्रेस नेता अजय राय की आलोचनाओं, विरोध के जवाब में भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कहे वाक्य सुने। पहली बात, उनके चेहरे पर रत्ती भर शर्म, ग्लानि, खेद नहीं था। उन्होंने प्रभु राम की मर्यादा के हवाले कहा, हमने मर्यादा का पालन किया! ये लोग (अखिलेश, कांग्रेस) लाठी-गोली चलाते थे। इनके दोगले चरित्र को देखो… वे लोग कह रहे हैं कि अयोध्या में राम भक्तों का अपमान हो गया। क्या तब अपमान नहीं हो रहा था?.. ये लोग नहीं चाहेंगे कि अयोध्या का नाम हो!
पता नहीं आदित्यनाथ ने गोरख परंपरा में योगी, पीठाधीश्वर/संरक्षक, महंत, संत के कर्तव्य, भूमिका को पढ़ा है या नहीं? इसमें लिखा है कि देवस्थान की रक्षा, दान-संपत्ति का संरक्षण, मठ की प्रतिष्ठा की रक्षा नाथ परंपरा का परम धर्म है। और ध्यान रहे, बतौर मुख्यमंत्री भी आदित्यनाथ का जिम्मा अलग है। उस नाते उनकी नाक के नीचे भक्तों द्वारा दिए गए दान और मंदिर की आय का उपयोग धर्मार्थ व संस्थागत उद्देश्यों के लिए होना था या चोरी का माल बनना था? क्यों तब वे जांच, एसआईटी की बात कर रहे हैं? जब अपने राज की परंपरा में उन्होने सीधे एनकाउंटर, बुलडोजर का रामराज्य बनाया है तो चंपत राय, अनिल मिश्रा, गोपाल राव, ट्रस्ट पदाधिकारियों के लिए एसआईटी क्यों, उनके सीधे एनकाउंटर का उनका बनाया राजधर्म कहां गया?
ईमानदारी से सोचें, अयोध्या में संघ के स्वयंसेवकों के ट्रस्ट की देखरेख में चढ़ावे की चोरी से भयावह राम के नाम की बदनामी दूसरी क्या है? बाबर ने तो मंदिर ढहाया था, चंपत राय एंड पार्टी ने हिंदू की उस आस्था, गर्व पर बुलडोजर चलाया है, जिसमें राम के जन्मस्थान मंदिर में, कथित हिंदू राष्ट्र के कथित रामराज्य में चढ़ावे की चोरी का एक अकल्पनीय अपराध हुआ है।
इसलिए सवाल है, गोरख संप्रदाय के एक महंत के मुख्यमंत्रीकाल में, आरएसएस के प्रचारकों के ट्रस्ट की व्यवस्थाओं में चोरी की यह बदनामी किस भारत का प्रतीक है? मेरा मानना है कि कबीरदास का यह दोहा आज के हिंदू भारत के इस नए अर्थ का वाहक हैः राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा, प्राण जाएंगे छूट। अर्थात राम नाम से हिंदुओं को उल्लू बनाकर मोतियों का खजाना पाया है तो शर्म छोड़ो, संवेदनशीलता, शालीनता, मर्यादा, बुद्धि, सत्य सभी त्यागो और जितना हो सके हिंदुओं की आस्था, भरोसे को लूटो। सत्ता के इस अमूल्य अवसर को छोड़ो नहीं। क्योंकि समय खत्म होगा तो पछतावे के अलावा कुछ नहीं होगा।
तभी हिंदुओं के कलियुग का यह वह मौजूदा हिंदू भारत है, जिसे दो-ढाई हजार साल के ज्ञात भारत इतिहास में खोजें तो मालूम होगा कि हिंदुओं के साथ ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। दूसरे धर्मों ने जरूर उसे लूटा, पर हिंदू हमेशा अपने धर्म के सनातन सदाचार में जीता रहा। न कभी उसकी मार्केटिंग की, न उसे बेचा, न पंडितों में मंदिर के लिए दान, चढ़ावे को संगठित रूप से लूटने की धोखाधड़ी हुई। न ही आस्था-विश्वास से धोखा कर राजनीति और सत्ता पाने का इतिहास रचा। तभी आज चढ़ावा खाने-खिलाने का दानखोर नया भारत है तो दूसरी तरफ हमेशा की तरह वह सनातनी भारत भी है, जो गुजरे जमाने के इस गाने को याद कराता है, ‘राम का नाम बदनाम न करो। राम को समझो, कृष्ण को जानो। राम ने हंसकर सब सुख त्यागे, कृष्ण ने कर्म की रीत सिखाई… तुमने फ़र्ज़ से आंख चुराई… राम का नाम बदनाम न करो। नींद से जागो ओ मस्तानों। राम को समझो, कृष्ण को जानो…’।
