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अमित शाह की गलतियां

सन् 2011-12 के अन्ना आंदोलन की बात है। दिल्ली में रह रहे अमित शाह एक दिन देर शाम फिएट कार से जंतर-मंतर गए। भीड़ और उसके हाव-भाव देखे और रात में नरेंद्र मोदी को फोन कर कहा- अब दिल्ली आने की तैयारी करें। वही जंतर-मंतर और समय, जुलाई 2026। क्या अमित शाह ने 2026 में इंसानी दिल-दिमाग से जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के लिए आए बच्चे-बच्चियों के बारे में सोचा? मेरा मानना है, कतई नहीं। क्यों? इसलिए क्योंकि समय की तासीर को उन्होंने सत्ता के अहंकार में वैसे ही रंगा हुआ है, जैसे मोदी रंगे हुए हैं।

2015 में 11, अशोका रोड स्थित पुराने भाजपा मुख्यालय की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात है। प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म हुई। अमित शाह का चेहरा पसीने से तर था। उन्होंने रूमाल निकाला और पसीना पोंछने लगे। तभी पास खड़े फोटोग्राफरों के कैमरे उनके चेहरे और भाव-भंगिमा को कैद करने के लिए क्लिक हुए। अमित शाह ने उसका अपना अर्थ निकाला और कहा, “तुम लोग जो सोचते हुए फोटो खींच रहे हो, नोट रखो, उसके छपने का समय कभी नहीं आएगा!”

ताजा 29 जुलाई 2026 को राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। टीवी चैनलों पर लाइव प्रसारण शुरू हुआ तो स्क्रीन पर फैला अमित शाह का चेहरा दिखाई दिया। वह चेहरा क्या बता रहा था? जिसने भी देखा होगा, उसे जुगुप्सा हुई होगी। जैसे कोई बर्बर आततायी। जाहिर है, अहंकार ने नरेंद्र मोदी को सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बना दिया। वैसे ही अमित शाह ने अपने आपको चाणक्य और क्रूर राजनीति का वह गॉडफादर बना लिया है, जिसे मासूम बच्चे-बच्चों पर लाठियों और पैलेट गन से मार पर शर्म नहीं होगी।

इसलिए क्योंकि अमित शाह ने ही पहले पार्टी अध्यक्ष और फिर गृह मंत्री के रूप में दबंगई को भाजपा और संघ में सत्ता का राजधर्म पैठाया है। “भय बिनु होइ न प्रीति”, यानी लाठी और भय के बिना भक्त, अनुशासन और सत्ता स्थायी नहीं बनती। भय से ही मुसलमानों को ठिकाने लगाओ। विपक्ष को पप्पू बनाओ। पार्टियों को तोड़ो। सांसदों-विधायकों को खरीदो। मीडिया की आवाज खत्म करो। जजों से मनमाने फैसले कराओ। पूंजीपतियों की लाइन हाजिरी रखो। भयाकुल हिंदुओं को डराते हुए भीड़ को बांटो। आपस में लड़ाओ। इतना ही नहीं मां भारती की संतानों पर भी अनागरिक होने की वह तलवार लटकाओ कि नागरिकता के अधिकारों की बात तो दूर, लोग पहले नागरिक होने के लिए बाबुओं के चक्कर लगाते रहे। तभी वोटर लिस्ट अपनी बनेगी। सत्ता दीर्घायु होगी। कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होगा।

तभी अमित शाह ने अन्ना हजारे के जंतर-मंतर में लोगों के मूड को सहजता से बूझा लेकिन लेकिन कॉकरोचों को नहीं। सिर्फ और सिर्फ आईपीएस अफसरों के पुलिसिया तौर-तरीकों में सोचा। न कैबिनेट में, न भाजपा के कथित मार्गदर्शकों, मुख्यमंत्रियों और नेताओं से, और न संघ परिवार के भागवत, दत्तात्रेय आदि किसी से सलाह-मशविरा हुआ हो। आखिर मोदी-शाह की दबंगी के आगे ये हैं ही क्या, जो बात या सलाह की जाए।

तभी क्या अर्थ था जो मोदी के धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को करवा देने के बाद भी संसद भवन में प्रधान के सिर पर भाजपाई सांसदों के शाबाशी का मुकुट पहनने का? क्यों नहीं अमित शाह ने स्वयं कॉकरोच नेताओं और सोनम वांगचुक से बात कर फ्रेम में अपनी फोटो बनवाई? क्यों मोदी और शाह दोनों संसद में अनुपस्थित रहे? प्रधानमंत्री की आईटी या मीडिया टीम की क्या तुक थी, जो कॉकरोचों के मीम्स के बीच प्रधानमंत्री ने चेहरे की रील बनाई? क्या ऐसी स्थिति किसी पूर्व प्रधानमंत्री या गृह मंत्री की कभी बनी?

सोचें, एक तरफ सुरक्षाकर्मियों को दौड़ाकर संसद के दरवाजे बंद कराए जाने के फोटो। पैलेट गन, लाठीचार्ज और संसद भवन से निकलते प्रधानमंत्री के काफिले के वीडियो और मीम फैले हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ आधी रात में प्रधानमंत्री “फ्रेंड्स…” कहकर कॉकरोचों को पुचकारने वाला रील जारी करते हुए! घरों में, और खासकर नई पीढ़ी तथा अगली पीढ़ी का खून, क्या मोदी और शाह को कभी “फ्रेंड्स” समझेगा?

संसद मार्ग का ही एक वाकया है। गौहत्या पर पाबंदी की मांग को लेकर नवंबर 1966 में साधु-संतों का संसद कूच हुआ था। साधुओं ने पुलिस की रोक देखी। भड़क गए। अराजक हुए और आसपास के मंत्रियों के घरों में घुस गए। कांग्रेस अध्यक्ष कामराज के घर में भी घुसे। परिवहन भवन तक जा पहुंचे। पुलिस ने गोलियां चलाईं। तब गृह मंत्री भारत साधु समाज के आस्थावान गुलजारी लाल नंदा थे। वे संसद भवन में थे। वे वहां से भागे नहीं, बल्कि पुराने संसद भवन की पहली मंजिल पर प्रेस कक्ष के पास खड़े होकर परिवहन भवन की सड़क के हालात देखने लगे। भीड़ पर गोली चलने की खबर मिलते ही वे कांपने लगे। लेकिन संसद भवन से नहीं भागे। न इंदिरा गांधी भागी। बाद में उन्होंने सदन और पार्टी की आलोचनाएं सुनीं। नैतिक तौर पर अपने को जिम्मेदार माना। वे पुराने नेताओं, यानी सिंडीकेट के सदस्य थे, सनातनी हिंदू थे। इसलिए जब इंदिरा गांधी ने उसी बहाने उन्हें गृह मंत्री पद से हटाया, तो वे मर्यादा के साथ, ग्लानि और खेद के भाव में राजनीति से अलग हुए और अपना बुढ़ापा गांधीवादी सादगी और सत्यनिष्ठा के साथ बिताया।

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