अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।
यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!
सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।
असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।
यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।
अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।
सो, कोर सवाल है 2029 चुनाव किन शर्तों पर होगा?
अमित शाह ने 2029 के नतीजे बता दिए हैं। तो डंके की चोट यह भी बता देना चाहिए कि 2029 की मतदाता सूची में भक्त वोटों का अनुपात याकि ताकत क्या होगी? तब भारत के सभी कुल वयस्क जन-गण वोटर होंगे या मात्र भक्तों के एकत्रीकरण की बूथवार भीड़ की व्यवस्थाओं में ढला चुनाव होगा?
