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भगवान भरोसे भारत

भारत भगवान भरोसे है। अगर ऐसा नहीं होता तो देश के हर हिस्सों में मंदिरों में इतनी भीड़ नहीं उमड़ती जितनी उमड़ रही है। अगर ऐसा नहीं होता है तो मंदिरों का निर्माण, पुनर्निर्माण, धार्मिक कॉरिडोर आदि बनवाना सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होता। भारत का यह जो कथित पुनर्जागरण है वह मंदिर निर्माण और तीर्थाटन है। विज्ञान व प्रौद्योगिकी, साहित्य व खेल में नहीं, बल्कि धर्म जगत में पुनर्जागरण हो रहा है। कहा जा रहा है कि हिंदू जाग गया है इसलिए वह भाजपा चुनाव जिता रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इतिहास की स्मृतियां जीवित हो गईं और इसी वजह से हिंदू अब भाजपा के साथ एकजुट हो रहा है। इसलिए मंदिर बन रहे हैं। धार्मिक कॉरिडोर बन रहे हैं। लोग मंदिरों में भीड़ लगा रहे हैं।

सोचें, इस साल केदारनाथ मंदिर का पट खुलने के बाद लाखों लोग दर्शन करने पहुंच गए। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक कपाट खुलने के बाद 39 दिन में 10 लाख से ज्यादा लोगों ने दर्शन किया है। वहां ठहरने की व्यवस्था नहीं है क्योंकि पहले लोग कम जाते थे और पारिस्थितिकी की सुरक्षा का भी ध्यान रखना था। इसलिए लोग जाते थे और दर्शन करके लौट आते थे। लेकिन अब 10 घंटे से ज्यादा का इंतजार है। इसलिए वहां भी रहने, ठहरने की व्यवस्था करनी होगी। काशी विश्वनाथ के मंदिर में पिछले साल सवा सात करोड़ लोगों ने दर्शन किए। कॉरिडोर बनने के बाद चार साल में 26 करोड़ से ज्यादा लोगों ने दर्शन किया है। 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से 10 करोड़ से ज्यादा लोग दर्शन कर चुके हैं। सरकार इसे टूरिज्म की इकोनॉमी बता कर पीठ थपथपा रही है लेकिन बुनियादी रूप से यह जनता को अधिक धार्मिक बनाने का प्रयास है।

कहते हैं कि मैकियावेली की किताब ‘द प्रिंस’ दुनिया के कई बड़े नेताओं, योद्धाओं और तानाशाहों की पसंदीदा किताब थी। नेपोलियन से लेकर हिटलर और स्टालिन तक उसे बिल्कुल धर्मग्रंथ की तरह पढ़ चुके थे। उस किताब में मैकियावेली ने शासक के गुण और शासन करने का तरीका बताते हुए लिखा था कि राजा को चाहिए कि वह जनता को ज्यादा से ज्यादा धार्मिक बनाए क्योंकि धार्मिक जनता पर शासन करना आसान होता है। जनता अगर विज्ञान व तर्क की बात करने लगेगी तो वह सरकार के हर फैसले पर सवाल करेगी और सवाल करने वाली जनता शासन के लिए खतरा बन जाती है। सो, एक प्रयोग के तौर पर देश के युवाओं को धार्मिक बनाया जा रहा है। धर्म का गौरव बता कर भारत की महानता बताई जा रही है। पिछले दिनों सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे हुए तो भव्य कार्यक्रम हुआ। प्रधानमंत्री खुद वहां मौजूद थे और भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने मंदिर के ऊपर से उड़ते हुए अपने करतब दिखाए। लोगों को बताया गया कि आक्रांताओं ने इस मंदिर को बार बार लूटा और खंडित किया लेकिन उतनी ही बार भारत ने, हिंदुओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

सवाल है कि बार बार कैसे लूटा गया और खंडित किया गया? उस समय हिंदू इतने कमजोर क्यों थे कि कुछ सौ या हजार आक्रांता आकर सब लूट ले जाते थे और आस्था को चोट पहुंचाते थे? गौरव इस बात का है कि हमने बार बार पुनर्निर्माण कराया। यही सारे मंदिरों के बारे में कहा जा रहा है। उत्तर प्रदेश का चुनाव आ रहा है तो इस नाम पर वोट मांगा जा रहा है कि पांच सौ साल की प्रतीक्षा के बाद राममंदिर का निर्माण हुआ है। बहरहाल, देश के हर हिस्से में मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण जोर शोर से चल रहा है। भारत का नौजवान जो भारत गाथा का हिस्सा था वह अब परजीवी है। गरीब बन कर पांच किलो अनाज उठा रहा है, युवा पुरुष महिला बन कर महिला सम्मान योजना के पैसे उठा रहे हैं, उम्र का फर्जी सर्टिफिकेट बनवा कर वृद्धावस्था या दिव्यांगता की पेंशन ले रहे हैं।

हालात यह हो गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट को आदेश जारी करना पड़ा है कि आठवीं पास के लिए जो नौकरी निकल रही है उसमें एमए और पीएचडी किए हुए लोग आवेदन न करें, उनको वह नौकरी नहीं मिलेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि आठवीं पास की योग्यता वाली नौकरी के लिए बीटेक, एमटेक किए हुए लोग आवेदन कर रहे हैं। कुछ समय पहले सरकार ने रेलवे में एक लाख भर्ती का विज्ञापन निकाला था। उसके लिए एक करोड़ आठ लाख लोगों ने आवेदन किया है। कई बरस बीत गए अभी तक रेलवे उनके आवेदनों की छंटनी नहीं कर पाया है। वह हो जाए तो फिर आगे की कार्रवाई हो।

हर साल करीब 50 लाख लोग भारत में ग्रेजुएट की डिग्री लेकर रोजगार तलाशने निकल रहे हैं। शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ में प्रशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुछ समय पहले तक कॉल सेंटर में या आईटी आधारित सेवाओं में युवाओं को जो नौकरी मिल रही थी उसका भी स्कोप सीमित होता जा रहा है। आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस यानी एआई ने आईटी सेक्टर में नौकरियां कम कर दी हैं। सस्ते नेट का इस्तेमाल करके रील बनाने को रोजगार का अवसर देना कहा जा रहा है। ऐसे में अगर नौजवान अपने को कॉकरोच बता रहे हैं तो क्या आश्चर्य की बात है।

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