भारतीय जनता पार्टी कभी आंदोलन करने वाली पार्टी थी। जब उसके दो सांसद थे तब उसने देश भर में राममंदिर का आंदोलन खड़ा किया था। यह उसके संगठन की ताकत थी और उसके बड़े नेताओं की वैचारिक व सांगठनिक ईमानदारी थी कि पार्टी इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर पाई। भाजपा के संगठन के लिहाज से कहें तो नब्बे का दशक उसका स्वर्णिम समय था। एक तरफ राममंदिर का आंदोलन चल रहा था और दूसरी ओर जब उसके काउंटर में मंडल का आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें भी भाजपा ने अपने समर्थक समूहों को आंदोलित करके मंडल के खिलाफ भी एक व्यापक नैरेटिव बनाया था। मंदिर आंदोलन और मंडल विरोधी आंदोलन ने भाजपा को इतना ताकतवर बनाया कि नब्बे के दशक में उसने तीन बार सरकार बनाई। पहले 13 दिन की, फिर 13 महीने की और फिर पांच साल की।
भाजपा उस समय विचारधारा वाली पार्टी थी। चाल, चेहरे और चरित्र की बात करती थी। भाजपा को पार्टी विद डिफरेंस कहा जाता था। लगातार छह साल तक सत्ता में रहने के बाद भी भाजपा का वह चरित्र काफी हद तक बचा हुआ था। उसका जीवंत संगठन था और कई बार सरकार के साथ संगठन का भी टकराव हुआ। भाजपा और संघ के संगठन जैसे भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागण मंच आदि सरकार पर दबाव बनाए रखते थे।
अब पिछले 12 सालों में क्या हुआ? भाजपा, उसके अनुषंगी संगठन और संघ के संगठनों की आंदोलन की क्षमता लगभग समाप्त है। वह किसी भी तरह के आंदोलन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित नहीं कर पा रही है। अब सब कुछ सरकार के भरोसे है। संगठन के लोग आराम से बैठे हैं कि सब सरकार देख लेगी। सरकार कैसे देख लेगी! सरकार के पास एजेंसियां हैं। ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स, एनआईए आदि एजेंसियां हैं और उससे भी ऊपर न्यायपालिका है।
याद करें कैसे 2011 और 2012 में दिल्ली में आंदोलन हुए थे। उस समय तक भाजपा और संघ की आंदोलन को प्रभावित करने की क्षमता थी। तभी चाहे वह आंदोलन अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे का हो या बाबा रामदेव का हो या निर्भया कांड के विरोध में हुआ आंदोलन हो, हर आंदोलन के दौरान कांग्रेस और उसकी सरकार परेशान हुई। यह आरोप लगाया कि भाजपा व संघ इन आंदोलन को बढ़ा रहे हैं। यह बात काफी हद तक सही थी कि सीधे आंदोलनों में शामिल होकर उनका नेतृत्व करने की बजाय भाजपा और संघ ने उस समय के जन आक्रोश को परदे के पीछे से एक दिशा दी और उसका राजनीतिक लाभ लिया। आज भाजपा और संघ या कांग्रेस राज के समय इनके द्वारा तैयार किए गए गुरू और प्रवचनकर्ता, कोई भी आंदोलन खड़ा करने में अक्षम हैं।
उलटे भाजपा और संघ के संगठनों की ताकत इतनी कम हो गई है कि सरकार के खिलाफ होने वाले किसी आंदोलन के समानांतर न तो कोई दूसरा आंदोलन कर पाए और न उसे डिफ्यूज कर पाए। नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों समझ रहे हैं कि चुनाव जीत रहे हैं तो बाकी चीज की कोई जरुरत नहीं है। उनको यह भी लग रहा है कि उन्होंने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दी तो अब क्या करना है। लेकिन सबसे बड़ी पार्टी में कोई दम नहीं दिख रहा है। ऐसा सग रहा है कि पार्टी का शरीर फूल गया लेकिन उसमें ताकत नहीं बची है।
सोचें, सरकार में आने के बाद से नरेंद्र मोदी को कितनी बार आंदोलकारियों ने झुकाया! यूपीए सरकार के समय के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का कानून नरेंद्र मोदी की सरकार लेकर आई थी। लेकिन इतना आंदोलन हुआ कि सरकार को कानून वापस लेना पड़ा। ऐसे ही कृषि कानून मोदी सरकार ने बनाए थे और कहा था कि इससे किसानों की किस्मत बदल जाएगी। एक साल तक आंदोलन करके किसानों तीनों कानून वापस कराए। राष्ट्रीय टीवी पर माफी मांगते हुए प्रधानमंत्री ने कानून वापस लिया। सरकार और भाजपा के नेता कहते थे कि इस सरकार में इस्तीफा नहीं होता है। लेकिन जंतर मंतर पर प्रदर्शन करके छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराया।
यह सब इसलिए हुआ क्योंकि सरकार के पास नैतिक बल नहीं है और संगठन की शक्ति नहीं है। अगर संगठन और विचारधारा बची रहती तो पेपर लीक होने और परीक्षा में गड़बड़ी होने पर संघ का छात्र संगठन और भाजपा का युवा संगठन भी आंदोलित होता। वह कॉकरोच जनता पार्टी को आंदोलन का स्पेस नहीं लेने देता। लेकिन सारे छात्र व युवा नेता इस अति आत्मविश्वास में बैठे रहे कि सरकार सब संभाल लेगी। माना गया कि पुलिस लाठी चला कर छात्रों को भगा देगी और कुछ नहीं होगा। सोचें, एक समय भाजपा स्वंय बड़े आंदोलन खड़े करती थी या हर लोकप्रिय आंदोलनों के पीछे उसका किसी न किसी रूप में हाथ होता था। लेकिन अब उसकी सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन हो जा रहा है, किसान और छात्र व युवा उसे सरकार को झुकाने का माध्यम बना रहे हैं और भाजपा का मुख्य संगठन या उसके दर्जनों अनुषंगी संगठनों को जंग लग गई है। वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गैर भाजपा शासित राज्यों में भी परीक्षा के पेपर लीक हो रहे हैं या परीक्षा में धांधली हो रही है लेकिन भाजपा और उसके संगठन वहां आंदोलन खड़ा नहीं कर पा रहे हैं।
