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प्रादेशिक चुनौतियां खत्म करने का अभियान

भारतीय जनता पार्टी एक तरफ अपने ब्रांड के हिंदुत्व की राजनीति को स्थापित करना चाहती है और परिसीमन के जरिए अपने असर वाले राज्यों में सीटें बढ़ा कर सत्ता स्थायी करने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर प्रादेशिक चुनौतियों को खत्म करने का काम भी किया जा रहा है। इसमें कुछ भाजपा का प्रयास है और कुछ परिस्थितियों का योगदान है कि एक एक करके राज्यों में प्रादेशिक क्षत्रपों की स्थिति कमजोर हो रही है। हालांकि अब भी कई राज्यों में मजबूत प्रादेशिक क्षत्रप हैं। लेकिन बहुत से राज्यों में भाजपा का काम लगभग पूरा हो गया है।

मिसाल के तौर पर कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार और ओडिशा का नाम लिया जा सकता है। बिहार में भाजपा की सहयोगी और बड़ी प्रादेशिक पार्टी जनता दल यू की स्थिति दिन प्रतिदिन कमजोर होने वाली है। नीतीश कुमार अभी तो सक्रिय राजनीति से दूर हुए हैं उनके और कमजोर होने के बाद पार्टी की कोई हैसियत नहीं बनेगी। उनके बेटे में अभी वह क्षमता नहीं दिख रही है कि वह पार्टी की मजबूती बनाए रखे। सो, बिहार में हमेशा हाशिए की पार्टी रही भाजपा अब सबसे बड़ी पार्टी है, उसका मुख्यमंत्री है और आगे वह बिहार की केंद्रीय राजनीतिक ताकत होगी।

ध्यान रहे बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं, जो बढ़ कर 60 होंगी। ऐसे ही ओडिशा में नवीन पटनायक की उम्र बहुत हो गई है और चुनाव हारने के बाद उनकी पार्टी भी कमजोर हुई है। उन्होंने अपनी पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेता पैदा नहीं किए और उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है। वहां भी हाशिए से उठ कर भाजपा केंद्रीय ताकत बन गई है। ऐसे ही महाराष्ट्र में प्रादेशिक राजनीति की चुनौती या तो समाप्त हो गई या बहुत कमजोर हो गई है। शिव सेना और एनसीपी दोनों में विभाजन हो गया है और भाजपा अपने दम पर बहुमत के बहुत करीब पहुंच गई है।

उसने एकनाथ शिंदे की शिव सेना और अजित पवार की एनसीपी को साथ रखा है लेकिन वह उसकी रणनीति है। वह चाहे तो इन दोनों के बगैर भी सरकार बना सकती है। कर्नाटक में भी भाजपा की किस्मत या उसकी राजनीति के चलते कांग्रेस में बहुत मजबूत वोक्कालिगा नेता डीके शिवकुमार उभर गए हैं और एचडी देवगौड़ा परिवार की पार्टी जेडीएस बहुत कमजोर हो गई है। जेडीएस अब भाजपा के रहमोकरम पर है।

बिहार, ओडिशा, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बाद अब अन्य राज्यों में प्रादेशिक क्षत्रपों की राजनीति समाप्त या कमजोर करने का प्रयास हो रहा है। पश्चिम बंगाल उसके केंद्र में है, जहां लोकसभा की 42 सीटें हैं, जो बढ़ कर 63 होने वाली हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में इतनी ताकत इसलिए झोंकी गई है क्योंकि पिछली बार भाजपा ने विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीती थी। इस बार वह तीन अंक में पहुंचने या सरकार बनाने की उम्मीद कर रही है। हालांकि अभी यह मुश्किल दिख रहा है। लेकिन भाजपा ने प्रयास में कमी नहीं छोड़ी है। उसको पता है कि अगर ममता बनर्जी को हरा कर सत्ता से बाहर कर दिया जाता है तो भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक चुनौती समाप्त हो जाएगी। भाजपा के अपने असर वाले राज्यों में अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा हैं।

भाजपा की एक कोशिश यह भी है कि जो प्रादेशिक क्षत्रप मजबूत है और अभी खत्म नहीं हो सकता है उसे अपने साथ मिला लिया जाए। इसी तरह दक्षिण भारत के प्रादेशिक क्षत्रप, जिनके कमजोर होने की संभावना अभी नहीं दिख रही है उनको भी साथ मिलाने की रणनीति पर भाजपा काम कर रही है। जैसे आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु में ई पलानीसामी भाजपा के साथ हैं। तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की पार्टी अभी बहुत कमजोर नहीं हुई है। लेकिन भाजपा ने वहां त्रिकोणात्मक मुकाबला बना दिया है। वहां जिस अनुपात में कांग्रेस और भाजपा मजबूत होंगे उसी अनुपात में भारत राष्ट्र समिति की शक्ति कम होगी। भाजपा की कोशिश झारखंड में भी हेमंत सोरेन की पार्टी को अपने गठबंधन में लाने की है। दोनों के बीच रणनीतिक समझदारी बन जाने की बात पिछले कई महीनों से कही जा रही है।

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