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कॉकरोच और फिर ‘सांप-सपेरा’

बाहर वर्षों में भारत को लेकर दुनिया ने क्या-क्या ख्याल नहीं बनाए? कभी गाय की राजनीति। कभी लंगूरों की उछलकूद। कभी हाथी की चाल तो कभी छप्पन इंची छाती का शेर। देखो, देखो कौन आया, शेर आया, शेर आया! और शेर ने क्या बनाया? नया राष्ट्रीय प्राणी उभरा! और वह भी कॉकरोच याकि हिंदी में तिलचट्टा।

त्रासद है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नई डिजिटल आबादी, युवा शक्ति ने खुद को शेर, बाज, चीता, गरुड़, हनुमान, यहां तक कि गधा भी नहीं चुना। चुना तो कॉकरोच चुना। यह हमारा आत्म-व्यंग्य है या चाहे तो आत्म-ज्ञान कहें! प्रधानमंत्री मोदी ने बतौर अवतारी राजा अवतरित होने के बाद डींग मारी थी कि दुनिया कभी भारत को सांप-सपेरों का देश कहती थी। लेकिन मैंने भारत की इमेज बदल दी।

और हाल में क्या सुनने को मिला? कुछ दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने डिजिटल संसार को भारत के नरक कुंड होने की जानकारी पहुंचाई। इस सप्ताह प्रधानमंत्री यूरोप घूमने गए। नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली की यात्रा हुई। नॉर्वे में कमाल हुआ और उसकी यूरोप में खबर बनी। वहां के राष्ट्रीय अखबार ‘आफ़्टेनपोस्टेन’ ने पाठकों के लिए एक ओपिनियन लेख के साथ कार्टून छापा जिसमें नरेंद्र मोदी ‘सपेरे’ के रूप में थे और पेट्रोल पंप का पाइप सांप की तरह नाचता हुआ। शीर्षक था, ‘एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी।’

सवाल है, क्यों दादा-परदादा के समय के सांप-सपेरों वाली भारत इमेज नॉर्वे को याद हो आई? भारत में भक्तों ने कहा है कि देखो, नॉर्वे जैसा देश भी नस्लवादी। पर असल बात नॉर्वे के लेखक का यह निचोड़ था कि मोदी के समय की विदेश नीति लुढ़कता लोटा है। कभी इधर, कभी उधर। आवश्यकता अनुसार (कार्टून का पेट्रोल पंप) ‘रियलपॉलिटिक’ वाली रीति-नीति। पर ऐसा बतलाने के लिए सांप-सपेरे वाला कार्टून ही क्यों?

ध्यान रहे, नॉर्वे से पहले नीदरलैंड के मेजबान प्रधानमंत्री ने भी अखबार को दिए इंटरव्यू में भारत में लोकतंत्र, हिंदू-मुस्लिम राजनीति को लेकर चिंता जतलाई। बताया कि यूरोपीय संघ भी चिंता में है। हैरानी की बात इसलिए है क्योंकि अमेरिका, चीन, ईरान, रूस सभी देशों से भारत के आज जैसे असहज संबंध हैं तो यूरोपीय संघ (भारत-ईयू मुक्त व्यापार संधि की सहमति हो जाने से) से भारत के रिश्तों का पकना आवश्यक है। विश्व राजनीति के तकाजे में दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। लेकिन कूटनीति के ऑप्टिक्स में भारत और प्रधानमंत्री अब लगभग अप्रासंगिक उपस्थिति लिए हुए हैं। कोई मतलब ही नहीं बचा। न वह काम का है न काज का।

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