Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

कॉकरोच से मोदी राज का बाल बांका नहीं होना!

वजह साफ है। भारत अब 2014 से पहले का नहीं है। भारत में राजनीति, विचार, बुद्धि, सत्य आदि वे तमाम बातें अब बेमतलब हैं, जिससे भारत के लोगों की जिंदगी कभी जिंदादिली में फड़कती थी। 145 करोड़ लोगों की भीड़ मोटामोटी वैश्विक तुलना, पैमाने में न काम की, न काज की है, तो सोचें, कॉकरोच किसी भी किस्म, किसी भी उम्र का हो, वह राजनीतिक जिंदादिली वाला कैसे हो सकता है? भारत की राजधानी दिल्ली हो या देश के नौजवानों में 2014 से पहले की जिंदादिली, हौसले, हिम्मत का जज्बा कहां से आएगा? न केवल देश का चाल, चेहरा, चरित्र बदला है, घर-घर का भी बदला है। तभी तो भारत के सुप्रीम कोर्ट से व्यक्त हुआ ‘कॉकरोच’ सचमुच सटीक साबित हुआ!

राजनीति हो या अर्थव्यवस्था या सामाजिक हालातों का हर पहलू, भारत की भीड़ अब वह नहीं है जो 2014 से पहले थी। याद करें 2012 के भारत को। दिल्ली और देश में तब नौजवान चेहरों की भाव-भंगिमा क्या बताती थी? भारत राष्ट्र-राज्य का सार्वजनिक विमर्श, मीडिया तब क्या बोलता हुआ था? तब लोग रोजमर्रा की जिंदगी में भ्रष्टाचार को कोसते थे। डॉ. मनमोहन सिंह के उस राज को ढीला-ढाला कहते थे, जिसमें सीएजी के विनोद राय सरकार को कटघरे में खड़ा कर देते थे या सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाएं भी सरकारी कामकाज में दखल या मनमानी करती थीं।

मतलब वे सत्ता, राजनीति, शासन-विरोधी भभके, जिससे नौजवानों का दिमाग खदबदाता था। मन में परिवर्तन की हूक बनती थी। भीड़ एकत्र होती थी। तभी अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल जैसे लोग दिल-दिमाग में छाए। हां, हिंदू आकांक्षा, संघ परिवार, उसके चेहरों की साख का भी रोल था। उसी के चलते नरेंद्र मोदी का वह मौका बना, जिससे कांग्रेसी नेता, मतदाता भी अच्छे दिनों के ख्याल में मोदी की ओर देखते हुए थे। उन्हें कांग्रेसियों ने भी वोट दिया था। तब भारत के लोग राजनीतिक रूप से चेतन थे, न कि भक्त या अंधे।

तब लोकतंत्र काम करता हुआ था। जबकि आज तीस वर्ष से कम उम्र की नौजवान आबादी की दशा-दिशा क्या है? बेरोजगार है, पर भक्त है। सोशल मीडिया ने नस्ल में वह राजनीतिक अज्ञानता बना दी है, जिसमें असमानता, भ्रष्टाचार, भाईचारा, स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार (राजनीति, लोकतंत्र के मंत्र-कसौटी) आदि की इतनी भी चेतना नहीं बनी है, जो तब और अब के फर्क या सत्य और झूठ में फर्क कर सके।

पूछ सकते हैं, कॉकरोच जनता पार्टी के फटाफट इतने फॉलोवर बनना किस बात का प्रमाण है? मेरा मानना है कि सोशल मीडिया के जुमले, तमाशे की मात्र भेड़चाल है। डिजिटल या वर्चुअल हो-हल्ले से राजनीति के संस्कार नहीं बनते। मोदी राज के बारह वर्षों की यह भी एक उपलब्धि है कि उसने कॉलेज, विश्वविद्यालय, कैंपस सभी तरफ छात्र राजनीति, यानी नागरिक अधिकारों, नागरिक चेतना, डिबेट आदि के सभी खिड़की-दरवाजे बंद कर दिए हैं, जिससे भारत का नौजवान वोट डालने जाए तो अपने विवेक और हकीकत में सोचने में समर्थ न हो।

सोचें, सब कुछ बंद करवा के, दिमाग को ठस्स बनवा कर सरकार ने छात्रों और नौजवानों को किस काम में रमाया? हिंदू बनाम मुस्लिम की घुट्टी तथा धर्म-तीर्थ की महिमा में। भारत के घर-परिवारों में भ्रष्टाचार, असमानता, महंगाई, बदहाल अर्थव्यवस्था और सामाजिक बिखराव जैसे मसलों से सामना भले दिन-रात हो, लेकिन वे सांस हिंदू बनाम मुस्लिम में ही ले रहे हैं।

ध्यान रहे, हिंदू-मुस्लिम की ग्रंथि इतिहासजन्य है। 2014 से पहले भी इसका सरोकार था। पर अब इसके साथ धर्म और नियति का वह जाल गूंथ गया है, जिससे बाहर निकल कर खड़ा होना संभव ही नहीं है। सो, कॉकरोच जनता पार्टी से कुछ संभव नहीं है। कॉकरोच शब्द ही यह बतलाता है कि चप्पल और स्प्रे ही उन्हें मारने या दुबकाने के लिए पर्याप्त हैं। फिर यों भी इस तरह के आंदोलन के अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे जैसे चेहरों को मोदी राज ने हर तरह से अविश्वसनीय बना दिया है! नए केजरीवाल, नई पार्टी, नए नेता पैदा हो जाएंगे, वे भी तो उतने ही बिकाऊ होंगे जितने सब हुए हैं।

Exit mobile version