Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

हे राम! मोदी-शाह ने लोकतंत्र का सब तो खा लिया!

Chennai, Feb 27 (ANI): Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar addresses during a review meeting on poll preparedness ahead of Tamil Nadu Assembly Elections 2026, in Chennai on Friday. Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi also present. (@ECISVEEP X/ANI Photo)

यों रामजी को भी क्या याद करें! आखिर खुद रामजी को भी मोदी-शाह ने कम बेच नहीं खाया। उनके मंदिर तक को चोरों का अड्डा बनाया। रामजी भी सोचते होंगे इन दो इंसानों के अहंकार, भूख के नाश के लिए वे क्या अवतार धरें! या अभी इंतजार करें कि इनका और क्या-क्या खाना बाकी है? किस मर्यादा को इन्होने बख्शा है। मंदिर हो, सनातन धर्म की सत्यता, नैतिकता, चरित्र, मर्यादाओं को राक्षसों जैसे तहस-नहस किया है। लोकतंत्र, संसद, सरकार, जांच एजेंसियां, मीडिया, विश्वविद्यालयों, राज्यपाल, नौकरशाही, न्यायपालिका, लोकजीवन—सभी की ऐसी-तैसी की है। और पिछले दस महीनों से मां भारती की संतानों, इंसानों, नागरिकों, उनके वोटों को भी खा जा रहे हैं। ऐसा तो रावण राज में भी नहीं था। ज्ञात इतिहास के किसी भी लोकतंत्र में नहीं था।

लोकतंत्र यानी मनुष्य व्यवस्था आखिर है क्या? यदि मनुष्य (नागरिक) को यह भी मालूम न हो, भरोसा न रहे कि देश विशेष में पैदा हुआ वह नेचुरली नागरिक, मतदाता है या नहीं तो वह क्या व्यवस्था हुई? बतौर मतदाता देश की सूची में वह नेचुरली है भी? और नहीं है तो क्यों, किसने काटा? किसके आदेश से वापस जुड़ता है या नहीं जुड़ता तो आखिर कैसी तो यह व्यवस्था है या लोकतंत्र है?

मगर मोदी-शाह ने अंधभक्तों की ऐसी फौज बनाई है जो मानती-सोचती है कि रावण जो करता था वही हिंदू राष्ट्र की राजनीति है, शासन का राजधर्म है।

तभी 1950 से अपनाए गए गणतंत्र का सब खा जाना है। कौम-नस्ल व सभ्यता का राक्षसी छप्पन भोग बनाना है।

सोचें, जून 2025 से तीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मतदाता ड्राफ्ट सूची से तेरह करोड़ से अधिक नाम बाहर हुए हैं। अभियान इस सही दलील से शुरू हुआ कि लिस्ट से मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट आदि नाम हटने चाहिए। पर इसकी आड़ में प्रक्रिया क्या हुई? और प्रक्रिया का कर्ता कौन था? स्वाभाविक है भारत का चुनाव आयोग। चुनाव आयोग के कर्ता हैं तीन समान अधिकारों वाले चुनाव आयुक्त। कानून में दो टूक उल्लेखित है कि तीनों सदस्य अपनी बैठक में विचार करेंगे। यदि तीनों में किसी बात पर सर्वानुमति हुई तब प्रक्रिया, नियम बनेगा और उस अनुसार काम आगे बढ़ेगा।

बतौर मिसाल नए मतदाता के Form 6 का सत्य है। इसे तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (यानी एक सदस्य) ने अकेले की मनमानी में लागू किया। इसे लेकर मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने बाकायदा फाइल पर लिखा कि नियमों में बदलाव किए बिना Form 6 इस तरह नहीं बदला जा सकता। संधू सहमत हुए। यानी तीन सदस्यीय आयोग में दो की राय सामने थी। फिर भी ECINet पर नया declaration आ गया। जुलाई में मामला सार्वजनिक हुआ। 13 अगस्त को संधू ने फाइल पर इसे “unauthorised and illegal” बताया और तुरंत हटाने को कहा ताकि young और first-time voters परेशान न हों। फिर भी Form ऑनलाइन मौजूद था। इस तरह मनमाने काम होने का चौदह दफा का रिकॉर्ड, आपत्तियां आज जगजाहिर है। हां, ज्ञानेश कुमार के साथी बाकी दोनों चुनाव आयुक्त—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने दस महीनों में कम-से-कम चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज की है। मां भारती की जमीन पर जन्म लेने वाले मनुष्यों, लोगों, नेचुरल नागरिकों के नाम कटने, जुड़ने यानी जिंदा या मृत की लिस्ट के मामलों में। मतलब ये मसले कि किसका नाम मतदाता सूची में जुड़े, किसका कटे, नए मतदाता का Form 6 कैसा हो और भारत की पूरी मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस को कौन नियंत्रित करे!

सोचें, मोदी-शाह के इस रावणी डिजिटल इंडिया पर। चुनाव आयोग वर्षों से कहता आया है कि मतदाता सूची स्थानीय स्तर पर वैधानिक Electoral Registration Officer यानी ERO बनाता और नियंत्रित करता है। मगर दोनों चुनाव आयुक्तों ने ECINet के जरिए electoral-roll database के “gradual centralisation” पर आपत्ति की। उनका सवाल था कि दिल्ली का आईटी सिस्टम जमीन पर कानून से अधिकार पाए ERO की शक्तियां क्यों सीमित कर रहा है? चिंता इतनी गंभीर हुई कि दोनों चुनाव आयुक्त देश के कैबिनेट सचिव तक पहुंचे।

लेकिन भारत राष्ट्र के कैबिनेट सचिव की भी औकात नहीं है जो वह सोचे, अपनी आत्मा को जगाए या कोई पूछताछ करें या जवाब दें।

नतीजतन आज क्या तस्वीर है? भारत के एक अरब मतदाताओं के मालिक नरेंद्र मोदी-अमित शाह है।

Exit mobile version