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प्रदूषण तो पुतिन ने भी महसूस किया होगा

एक समय जो नैरेटिव मेनस्ट्रीम मीडिया का सबसे प्रिय विषय होता था वह समय के साथ या सरकार बदलते ही कैसे गायब हो जाता है इसकी मिसाल सिर्फ रुपए की गिरती कीमत का मामला नहीं है, बल्कि प्रदूषण का मामला भी है। जब बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप सर्दियों में दिल्ली आए थे तब मीडिया ने हिसाब लगाया था कि राजधानी दिल्ली के प्रदूषण से अमेरिकी राष्ट्रपतियों के जीवन के कितने घंटे कम हो गए। यह हिसाब भी लगाया गया कि दिल्ली के  वायु प्रदूषण के कारण यहां रहने वाले लोगों का जीवन औसतन कितने साल कम हो जा रहा है। जिस समय यह हिसाब लगाया गया उस समय दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं थी। अब दिल्ली में भाजपा की सरकार है और वायु प्रदूषण लगातार ‘बेहद खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में है। वायु प्रदूषण के आंकड़े को यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स, एक्यूआई को इन दो श्रेणियों में रखने के लिए कितनी तरह के तिकड़म किए जा रहे हैं वह सबको पता है। फिर भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

जिस समय रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली पहुंचे उस समय भी सरकारी आंकड़े के मुताबिक दिल्ली की हवा ‘बेहद खराब’ श्रेणी में थी। यानी एक्यूआई तीन सौ से ऊपर था। लेकिन किसी ने हिसाब नहीं लगाया कि ऐसी हवा में सांस लेने से पुतिन और उनके साथ आए मंत्रियों की उम्र कितने घंटे कम हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है कि रूस या दुनिया के दूसरे देशों के लोग दिल्ली की वहा की गुणवत्ता को नहीं देख रहे हैं या नहीं महसूस कर रहे हैं। सारी दुनिया देख रही है कि भारत में वायु प्रदूषण महामारी बन गया है और सरकारें आंकड़ों के प्रबंधन में लगी हैं। सरकारें समय काट रही हैं कि किसी तरह से सर्दियां बीत जाए तो प्रदूषण पर से लोगों का ध्यान हट जाएगा। भारत में गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन स्थायी है और बाकी हर समस्या ऐसे ही सीजनल है। प्रदूषण, हीटवेब, बाढ़ आदि अलग अलग मौसम में महामारी की तरह आते हैं और चले जाते हैं। लोगों के साथ साथ सरकारें भी भूल जाती हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दिवाली के बाद से अकेले नोएडा में दो लाख से ज्यादा सांस के मरीज अस्पतालों में भर्ती हुए हैं। दिल्ली और पूरे एनसीआर में यही स्थिति है। सर्दियां आते ही प्रदूषण बढ़ता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ने लगते हैं। ध्यान रहे प्रदूषण कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता है। बीजिंग ने दुनिया को दिखाया है। एक दशक पहले बीजिंग वायु प्रदूषण की वैश्विक राजधानी था। लेकिन राष्ट्रीय सरकार, स्थानीय प्राधिकरण की इच्छाशक्ति और आम लोगों के सहयोग से उसने प्रदूषण को समाप्त कर दिया। पिछली सदी के लंदन ने पूरी दुनिया को इसका रास्ता दिखाया था। औद्योगिक क्रांति के बाद से लंदन कई तरह के प्रदूषण की चपेट में था लेकिन उसने हवा और पानी पूरी तरह से स्वच्छ कर दिए। भारत में सिर्फ राजधानी दिल्ली नहीं है, बल्कि देश के दर्जनों शहरों में हवा जहरीली हो गई है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची बनती है तो शीर्ष 10 देशों में हर समय पांच या उससे ज्यादा शहर भारत के होते हैं।

और ऐसा भी नहीं है कि भारत में कोई औद्योगिक क्रांति हो रही है। विनिर्माण की ज्यादातर इकाइयां तो बंद हैं। सब कुछ आयात होता है। फिर भी वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि दिल्ली के पानी में यूरेनियम की मात्रा है, जिससे कैंसर जैसी घातक बीमारी हो रही है। एक साल में दिल्ली में कैंसर के 28 हजार नए मरीज मिले हैं। लेकिन सरकारें एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं किसके शासन वाले राज्य में किसान ज्यादा पराली जला रहे हैं। जबकि यह आंकड़ा सामने आ गया है कि पराली जलाना नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल का धुआं दिल्ली की प्रदूषण का मुख्य कारण है। लेकिन जीएसटी व पेट्रोल, डीजल पर लगने वाले टैक्स के लालच में और ऑटोमोबाइल सेक्टर के दबाव में कोई भी सरकार गाड़ियों की बिक्री को नियंत्रित नहीं करती है।

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