क्या बुद्धि का दिवालियापन है कि नीट यूजी पेपर लीक और परीक्षा की दूसरी गड़बड़ियों के खिलाफ देश के नौजवान सड़कों पर उतरे और आंदोलन किया तो भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के मंत्री नौजवानों की आपस में शॉर्ट मैसेजिंग की भाषा बोल कर उनको लुभाने की कोशिश कर रहे हैं! ऐसा लग रहा है, जैसे देश का ‘जेन जी’ यानी 14 से 29 साल तक की उम्र का युवा इस वजह से नाराज था कि देश के नेता उनकी भाषा नहीं बोलते हैं और नहीं समझते हैं। असल में नौजवान यह नहीं चाहते हैं कि 76 साल के प्रधानमंत्री और 76 साल के सरसंघचालक अपनी बातचीत में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करें, जिन्हें ‘जेन जी’ की भाषा के तौर पर सोशल मीडिया में प्रचारित किया जाए। हालांकि यह भी महामूर्खतापूर्ण बात है कि शब्दों या वाक्यों के शॉर्ट फॉर्म में बोलना ‘जेन जी’ की पहचान है। पहले की पीढ़ियों की भी अपनी शब्दावली होती थी। पहले भी बातें शॉर्ट फॉर्म में कही जाती थीं और तब भी वह पीढ़ी यह नहीं चाहती थी कि नेता उसके साथ उस भाषा में संवाद करें।
अभी सरकार और विपक्ष दोनों के नेता ‘जेन जी’ के साथ कनेक्ट करने के लिए उसकी डिक्शनरी के कुछ शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और समझ रहे हैं कि इससे वे नौजवानों को पटा लेंगे। लेकिन असल में ऐसा नहीं होगा। इसका कारण यह है कि नौजवान पीढ़ी को लेकर नेताओं की समझ बुनियादी रूप से गलत है। इस पीढ़ी ने हर घटना, घटनाक्रम और अपने जीवन से जुड़ी बातों के लिए अपने शब्द बनाए हैं। उनके शब्दों के मायने पारंपरिक अर्थ से बिल्कुल भिन्न हैं। दूसरी बात यह है कि वे तुरंत सामने वाले व्यक्ति को बॉक्स्ड करते हैं। एक खांचे में डालते हैं और उसके बाद आप कुछ भी कहते रहे वे आपको इस खांचे से बाहर नहीं देखेंगे।
‘जेन जी’ के लिए पढ़ाई और नौकरी या रोजगार के अलावा जो चीजें सबसे अहम हैं, उनके प्रति अगर सरकार सरोकार नहीं दिखाती है तो वह उनका विश्वास नहीं जीत सकती है। चाहे नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत कितनी भी बात कर लें। उनका एक सरोकार पर्यावऱण औऱ पारिस्थितिकी के बदलाव को लेकर है। तभी किसान आंदोलन के समय 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग उनकी नायक बन गई थी। उनका दूसरा सरोकार मानसिक स्वास्थ्य को लेकर है और तीसरा सरोकार अपनी पहचान को लेकर है। दुर्भाग्य से भारत की सरकार इनमें से किसी को भी एड्रेस नहीं कर रही है। पर्यावऱण को लेकर हम गंभीर नहीं हैं। प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं है। ऐसे ही मानसिक स्वास्थ्य का पुरानी पीढ़ी के लोग मजाक ही उड़ाते हैं। कई लोग कहते मिल जाएंगे कि हमारे लिए जो मामूली स्ट्रेस था वह ‘जेन जी’ के लिए डिप्रेशन बन गया है। इससे आप उनको अपने साथ जोड़ नहीं पाएंगे। उलटे और दूर करेंगे। ऐसे ही पहचान का मामला है। वे एलजीबीटीक्यू का समर्थन करते हैं। याद करें कैसे युवाओं के आंदोलन में जंतर मंतर पर सबसे पहले एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग पहुंचे थे। तब राइटविंग का पूरा इकोसिस्टम उनका मजाक उड़ाता था। क्या उस पहचान को स्वीकार किए बगैर कोई भी पार्टी या नेता ‘जेन जी’ से जुड़ सकता है?
भारत ही नहीं पूरी दुनिया का राइटविंग उनकी इस पहचान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। याद करें कैसे सत्ता में आते ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि अमेरिका में अब सिर्फ दो ही जेंडर होंगे। यानी थर्ड जेंडर के लिए कोई जगह नहीं होगी। भारत का राइटविंग भी इसी सोच का है। तभी यह तय मानें कि सिर्फ उनकी भाषा के शब्द बोलने से काम नहीं चलने वाला है। उनके विचारों को भी स्वीकार करना होगा। वे पहचान को लेकर जो विचार रखते हैं औऱ संबंधों को लेकर जो विचार रखते हैं। वे जितनी सहजता से लिव इन रिलेशनशिप को स्वीकार कर रहे हैं क्या राइटविंग या उनसे पहली वाली पीढ़ी उतनी ही सहजता से उसे स्वीकार कर पाएगी? अगर नहीं कर पाएगी तो सिर्फ बातों से कुछ नहीं होगा।
सोचें, प्रधानमंत्री को अचानक याद आय़ा कि सात अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन हुआ था। उन्होंने युवाओं के साथ कनेक्ट होने के लिए ‘जीआरडब्लुएम’ यानी ‘गेट रेडी विद मी’ कहते हुए एक वीडियो बनाया और हस्तकरघा, बुनकर आदि को बचाने और भारत के पारंपरिक वस्त्रों को प्रमोट करने की बात कही। दूसरी ओर राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की पेट डॉग ‘नूरी’ को लेकर आए और उसके साथ वीडियो बनाई। पशु प्रेम और इथनिक चीजें भी युवाओं को पसंद आती हैं। लेकिन इस रूप में उनका प्रमोशन करके देश के नेता उनसे जुड़ जाएंगे यह भी संभव नहीं लगता है।
