किताबों तक में गलतियां
अब किताबे गलतियों से भरी होती है। जिसको जो मन में आया उसने किताब में लिख दिया। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय आठवीं कक्षा की किताब में शामिल कर दिया गया, जिस पर बाद में बहुत हंगामा हुआ और किताब वापस लेनी पड़ी। ऐसा कई किताबों के मामले में हुआ है। ओडिशा की इस साल समाजशास्त्र की एक किताब में तो इतनी गलतियां हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका मजाक बना है। उसके बाद नीतिगत स्तर पर ऐसे काम हुए, जिनका प्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षा में सुधार से ज्यादा विवाद पैदा करना और प्रचार पाना था। चाहे नई शिक्षा नीति हो,...