अब किताबे गलतियों से भरी होती है। जिसको जो मन में आया उसने किताब में लिख दिया। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय आठवीं कक्षा की किताब में शामिल कर दिया गया, जिस पर बाद में बहुत हंगामा हुआ और किताब वापस लेनी पड़ी। ऐसा कई किताबों के मामले में हुआ है। ओडिशा की इस साल समाजशास्त्र की एक किताब में तो इतनी गलतियां हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका मजाक बना है।
उसके बाद नीतिगत स्तर पर ऐसे काम हुए, जिनका प्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षा में सुधार से ज्यादा विवाद पैदा करना और प्रचार पाना था। चाहे नई शिक्षा नीति हो, चाहे त्रिभाषा फॉर्मूला हो, चाहे पीएम श्री की योजना हो, कौशल विकास के लिए शुरू की गई स्किल इंडिया योजना हो या ‘एक देश, एक परीक्षा’ की जिद हो। इन सबका साझा असर यह हुआ कि देश के नौजवान पूरी तरह से असहाय और किंकर्तव्यविमूढ़ हुए। अंत में उसे कोई तरीका नहीं सुझा तो वह आंदोलन पर उतरा। उसके सरोकारों को समझने और उसे ठीक करने की बजाय सरकार के लोग अब उनके बातचीत के तरीके, सोशल मीडिया रील्स और मीम्स की नकल करके अपना मजाक बनवा रहे हैं। असल में अनपढ़ और कुपढ़ लोगों के हाथ में शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था सौंप दी गई है, जिससे नौजवान पीढ़ी के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है और जब युवा नाराज हुए हैं तो उनकी भोंड़ी नकल करके उनको पटाने की कोशिश हो रही है। इस कोशिश में लगे सब बहुत दयनीय दिख रहे है।
शिक्षा में विकास की पूरी प्रक्रिया को रोक दिया गया। अच्छे संस्थानों को सुनियोजित तरीके से खत्म करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके लिए वहां अनुशासन से बंधे अपढ़ और कुपढ़ लोगों को बहाल किया गया। इसके साथ ही उन संस्थानों के क्लोन बनाने का काम भी बड़े पैमाने पर हुआ। आज बड़े गर्व से बताया जाता है कि कांग्रेस के शासन में छह आईआईटी थे, अब दो दर्जन हो गए हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अब भी पहले वाले छह आईआईटी में दाखिले के लिए ही मारामारी है। ऐसे ही दर्जनों आईआईएम खुल गए, दर्जनों एम्स बन गए या बनाने की घोषणा हो गई। नए और गुणवत्तापूर्ण संस्थान बनाने की बजाय पुराने संस्थानों के क्लोन बनाने का विचार अपने आप में गड़बड़ है। सोचें, ब्रिटेन में कभी किसी ने सोचा भी नहीं कि दूसरा ऑक्सफोर्ड बनाते हैं या दूसरा कैम्बिज बनाते हैं। उन्होंने उस गुणवत्ता के कई संस्थान बनाए। अमेरिका में आईवी लीग के नौ कॉलेज हैं। किसी ने दूसरा हार्वर्ड या दूसरा स्टैनफोर्ड बनाने का प्रयास नहीं किया। भारत में दो दर्जन आईआईटी हो गए लेकिन अमेरिका में एक ही एमआईटी है और वह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संस्थान हैं। भारत में इतने आईआईटी, आईआईएम, एम्स और पता नहीं क्या क्या बन गए लेकिन दुनिया के सौ सबसे श्रेष्ठ संस्थानों में एक को भी जगह नहीं मिली। दोराब जी टाटा का बनवाया और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस यानी आईआईएससी एक ही हैं और वह देश का सर्वश्रेष्ठ संस्थान है।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



