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दीया गरीब जलाए, रोशनी अमीर ले जाए

भाजपा की वाह की जाए या संघ परिवार की? ये देश के हिंदुओं से नरेंद्र मोदी के पच्चीस ल के भड़भड़िए शासन की वैसी ही पूजा कराना चाहते हैं, जैसे हिंदू लक्ष्मीजी की कृपा और समृद्धि की कामना में दिवाली के दिन दीया जलाकर पूजा करते हैं।

सोचिए, 17 सितंबर की शाम सात बजे से मोदीजी का दीपोत्सव शुरू होना है। फिर पूरे एक महीने, सात अक्टूबर तक वह चलेगा। लक्ष्मीजी का भी दीपोत्सव इतना लंबा नहीं चलता, जितना मोदीजी का चलेगा। और सबसे बड़ी बात, भारत की सेक्युलर सरकार की मोदी राज से पहले मजाल नहीं थी जो अफसर गांव-गांव जाएं, लोगों को दीये बांटें, लोगों से दीये जलवाएं, गली-मोहल्लों में फोटो-वीडियो खिंचवाएं। फिर उन्हें सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाएं, ताकि दुनिया जान जाए कि भारत सचमुच मूर्खों का देश है। हिंदुओं ने जैसे ताली-थाली बजाकर कोविड भगाने का कमाल दिखाया था, तो अब स्वतंत्र भारत दुनिया को दिखा दे रही है कि भारत में हिंदुओं के लिए प्रधानमंत्री भगवान होता है। उसकी आरती होती है। दीये भी जलते हैं।

निश्चित ही बतौर प्रधानमंत्री बारह वर्षों में मोदी का कमाल घर-घर पैसा बांट सबको लाभार्थी बनाना है। इसलिए भाजपा और संघ के स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, नेता, मंत्री बांटे गए सरकारी राशन, सब्सिडी, आयुष्मान, आवास, किसान सम्मान निधि आदि की लिस्ट लेकर जाए तो इसमें बुरा क्या है? गरीब-गुरबों को यह भी कहना जायज की मोदीजी का नमक खा रहे हो, रोटी खा रहे हो तो तुम्हें क्या उनका दीया नहीं जलाना चाहिए! बताओं दुनिया को कि हिंदू राजनीति जैसी विश्वगुरुता पृथ्वी पर और कही नहीं है।

भारत के लोकतंत्र में सन् 2014 से पहले लोग स्वाभिमानी नागरिक थे, मतदाता था। वह सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि अपने अधिकार-विवेक से चलता था। न नेहरू ने अपने लिए दीये जलवाए, न इंदिरा ने और न वाजपेयी ने। लेकिन नितिन नबीन, अमित शाह और मोहन भागवत की भाजपा और संघ परिवार भारत के इतिहास में पहली बार हिंदुओं से कह रहे हैं कि जिसने तुम्हें रोटी और पैसा बांटा, उसके लिए दीया जलाओ। यही बतौर हिंदू तुम्हारा पुण्य है, यही तुम्हारा कर्तव्य है। यानी नागरिक और मतदाता की जगह अब मात्र “लाभार्थी” भीड़ का भारत है।

सोचिए, कुछ गहराई से। मोदी के पच्चीस वर्षों के सबसे बड़े लाभार्थी कौन हैं? मेरा मानना है कि गरीब-गुरबे कतई नहीं, बल्कि गुजरात और देश के वे अरबपति-खरबपति, जिन्होंने पूरी सरकार और देश को बंधक बना रखा है। इनके आगे संघ परिवार और खुद प्रधानमंत्री मोदी इनसे दीया जलाने के लिए नहीं कहेंगे? भाजपा-संघ का कार्यकर्ता, स्वयंसेवक या कैबिनेट सचिव जैसे तमाम अफसर और नौकरशाह अडानी, अंबानी जैसे अरबपतियों-खरबपतियों के घर जाकर लाखों-करोड़ों-अरबों रुपए की उन पर हुई मेहरबानियों की सूची नहीं गिनाएंगे। लेकिन गरीब महिला के घर जा कर उसे सिलेंडर का हवाला दे कर उससे बदले में दीया ज़रूर जलवाएंगे।

इन गरीबों को पता नहीं है कि  2014 के जिस साल मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, उसी वर्ष Forbes की वैश्विक सूची में भारत के सौ सबसे अमीर लोगों की कुल संपत्ति तब 346 अरब डॉलर थी। ठीक दस साल बाद, 2024 में भारत के सौ सबसे अमीरों की दौलत पहली बार एक ट्रिलियन डॉलर पार कर 1.1 ट्रिलियन डॉलर हो गई। यानी मोटे तौर पर दस साल में तीन गुनी से अधिक। 2026 में Forbes की विश्व अरबपति सूची में रिकॉर्ड 229 भारतीय नागरिक अरबपति थे और उनकी संयुक्त संपत्ति फिर एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक थी। 2014 में मोदी के दिल्ली आने के आसपास Forbes ने गौतम अडानी की संपत्ति 2.8 अरब डॉलर दर्ज की थी, जो चुनाव के बाद 6.2 अरब डॉलर हुई। 2026 की Forbes सूची में अडानी 63.8 अरब डॉलर पर हैं। वही मुकेश अंबानी की संपत्ति मार्च 2014 में जो 18.6 अरब डॉलर थी; 2026 की सूची में 99.7 अरब डॉलर।

World Inequality Lab के अनुसार भारत के टॉप के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की करीब 40.1 प्रतिशत संपत्ति है और वे राष्ट्रीय आय का 22.6 प्रतिशत प्राप्त करते हैं। नीचे की आधी आबादी (याकि 75 करोड़ लोग) के पास केवल 6.4 प्रतिशत संपत्ति और 15 प्रतिशत आय है।

तो मोदी की मनाई जा रही दिवाली का असल सीन, दृश्य क्या है? भारत के सौ करोड़ से ज़्यादा लोग राशन, सब्सिडी वाले लाभार्थी। इन्हीं से संघ परिवार मोदी के नाम का दीया जलवाएगा! मतलब पांच किलो अनाज पाने वाला लाभार्थी घर के बाहर दीया लिए कैमरे के सामने फोटो खिंचवाएगा। उसे अफसर और भाजपा देश-दुनिया में प्रचारित करेंगे। वहीं सौ अरब डॉलर वाले सौ-डेढ़ सौ भारतीय अरबपति भारत की भीड़ की बेवकूफियों में अपने आपको सुरक्षित-भाग्यवान मान, मज़ा लेंगे।

एक और बात। संघ ने 2025-26 में अपना शताब्दी वर्ष मनाया। देश भर में कार्यक्रम, पथ संचलन, हिंदू सम्मेलन, घर-घर संपर्क और “पंच परिवर्तन” अभियान हुए। याकि संघ ने बिना दीये जलवाए अपना शताब्दी वर्ष मना लिया। जबकि अब मोदी की सत्ता के लाभार्थी संघ प्रचारक और स्वयंसेवक मोदी के नाम का दीया जलवा रहे हैं। उस नाते क्या संघ के नागपुर मुख्यालय से लेकर झंडेवाला कार्यालय और देश भर के संगठन कार्यालयों में भी मोदी का दीया नहीं जलना चाहिए? आखिर मोदी की सत्ता का सबसे बड़ा लाभार्थी तो संघ स्वयं है? दीन-ईमान के तकाज़े में तो मोहन भागवत को भी मोदी के लिए दीया जलाना चाहिए। क्या जलाएंगे?

कुल मिलाकर, राजा कहता है-सेवा। पार्टी कहती है-संकल्प। सरकार कहती है-लाभार्थी। और अफसर-कार्यकर्ता पहुंचता है-दीया लेकर। और फिर धड़ाधड़ कैमरा गरीब-गुरबों से कहता है-मोदीजी का फोटो नहीं देखा? जैसे वे सीधे देखते हुए मुस्कराते हैं, वैसे ही मुस्कराओ। अगले साल ज्यादा खैरात मिलेगी। मोदीजी है तो मिलता ही रहेगा।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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