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तब हेमंत, विजय आदि क्या करें?

केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ जिन लोगों को मिल रहा है उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर दीया जलाने को कहा जा रहा है तो जो राज्य सरकारें लोगों को नकद पैसे या दूसरे लाभ दे रही है वहां क्या होना चाहिए? क्या झारखंड में हेमंत सोरेन और तमिलनाडु में विजय को भी अपने जन्मदिन पर इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन करना चाहिए? अगर हेमंत सोरेन और विजय इस तरह के आयोजन करते हैं या कांग्रेस शासन वाले चार राज्यों के मुख्यमंत्री इस तरह का आयोजन कराते हैं तो क्या भाजपा उसका समर्थन करेगी? जाहिर है कोई दूसरा मुख्यमंत्री या नेता इस तरह का काम कराने लगे और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से दीया जलाने को कहे तो भाजपा तुरंत नाराज हो जाएगी।

लेकिन वास्तविकता यह है कि महिला सम्मान योजना के तहत सबसे ज्यादा पैसा हर महीने महिलाओं को देने वाले राज्यों में झारखंड अव्वल है। वहां दिल्ली की तरह बहुत शर्तें भी नहीं लगाई गई हैं ताकि महिलाओं को लाभ लेने से रोका जा सके। हेमंत सोरेन महिलाओं को ढाई हजार रुपए महीना दे रहे हैं। महिला सम्मान के अलावा युवाओं को गुरुजी क्रेडिट कार्ड के जरिए भी पैसे दे रहे हैं। सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा नकद पैसे बांटने में ही जा रहा है। फिर हेमंत सोरेन को तो युवाओं, महिलाओं और अन्य नागरिकों से अपने जन्मदिन पर हर साल दिवाली मनवानी चाहिए।

ऐसे ही तमिलनाडु में नए मुख्यमंत्री विजय ने आते ही खजाना खोल दिया है। उन्होंने तो जन्म के साथ ही ल़ड़कियों को एक ग्राम सोने की एक अंगुठी देने की योजना चलाई है। इसके लिए लाखों की संख्या में अंगुठियां बनवाई जा रही हैं। विजय ने लड़कियों की पढ़ाई से लेकर शादी तक के समय के लिए नकद पैसे देने की योजनाएं शुरू की हैं। हर लड़की की शादी पर आठ ग्राम सोना और एक सिल्क की साड़ी दी जा रही है। वे पहले से कलैगनार योजना के तहत महिलाओं को मिल रही एक हजार रुपए की मासिक राशि को ढाई हजार करने वाले हैं और सभी महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी है। विजय ने साल में तीन सिलेंडर मुफ्त देने की योजना भी चलाई है। अब सोचें, क्या इतना करने के बाद विजय को अपने जन्मदिन पर दीये जलवाने और दिवाली मनाने की घोषणा नहीं करनी चाहिए!

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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