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‘मेरा जेन-ज़ी, तेरा जेन-ज़ी’ का बीजारोपण

भाजपा की भावी संभावनाओं का मोशाने जिस तरह नाश किया और आरएसएस की नेकनीयत-छवि का लिमये ने जिस तरह सत्यानाश किया, उस के बाद भागवत ने मरम्मत के औजार ले कर मैदान में उतरने में देर करना ठीक नहीं समझा। इसलिए मुंबई के नीता-मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में देश भर के दो हज़ार चुनिंदा युवाओं के बीच भागवत ने शिक्षा प्रणाली, आरक्षण, समलैंगिक विवाह और सामाजिक सद्भाव जैसे पेचीदे मसलों पर अपनी बात रखी। बड़े सलीके से रखी। चाशनी में डुबा कर रखी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा जेन-ज़ी के मन में घुमड़ रहे मसलों के बारे में दिए गए जवाब सुन कर मैं तो दंग रह गया। उन्होंने ऐसी-ऐसी बातें कहीं कि अच्छे-अच्छों का मन डोल जाए। पिछले बारह बरस में बीच-बीच में भागवत कई बार इतनी मनमोहक बांसुरी-धुन बजाते रहे हैं कि बहुतों के दिल को बड़ा सुकू़न मिल जाता है और कइयों के दिल का करार फ़ना हो जाता है। यह अलग बात है कि बारह बरस में सामने आए उन के मीठे-उद्गारों के बावजूद हमारे देश के हुक़्मरानों के हिमालयी अहंकार से बह रहे झरनों की कड़वाहट में तो अब तक कोई फ़र्क़ पड़ा नहीं है। बहरहाल, इस बार की भागवत-कथा का सार भी ज़रा समझ लीजिए।

सब से बड़ी बात भागवत ने यह कही कि जेन-ज़ी को देशविरोधी बताने वाले ख़ुद देशविरोधी हैं। जेन-ज़ी तो हमारी पीढ़ी से भी ज़्यादा नैतिक-ईमानदारी का पालन कर रही है। वह हमारी अगली पीढ़ी है और अगर युवा कोई मुद्दा उठाते हैं तो उन की बात सुनी जानी चाहिए। आंदोलन तब होते हैं, जब अनसुनी की जाती है। आंदोलन भी संवाद का ही एक माध्यम है। जब हमारी पढ़ी जेन-ज़ी थी तो वह अपने बुजु़र्गों की बात सुनती थी। मगर आज की जेन-ज़ी बातों को जस-का-तस मान लेने के बजाय सवाल करती है। उसे उन सवालों के तार्किक जवाब मिलने चाहिए। उसे प्यार और संवेदना चाहिए।

संघ-प्रमुख को जेन-ज़ी के बारे में इतनी स्पष्ट और ठोस राय देश के सामने रखने की ज़रूरत क्यों पड़ी? इस में कोई रहस्य नहीं है। यह एकदम खुला रहस्य है। नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह की दुकड़ी ने अपनी गफ़लत भरी ऐठ से जंतर-मंतर पर हो रहे युवा-आंदोलन के लिए जिस तरह रातोंरात देश भर के शहरों-कस्बों में उपजाऊ धरती मुहैया करा दी थी, अगर वह नहीं थमती तो जेन-ज़ी भारतीय जनता पार्टी और उस के पितृ-संगठन आरएसएस के वैचारिक गोलगप्पे को बिना डकार लिए निगल जाती।

फिर पता नहीं, संघ के सह-सरकार्यवाह यानी संयुक्त महासचिव अतुल लिमये के दिमाग़ में क्या खारिश हुई कि उन्होंने कह डाला कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे युवा देश-विरोधी और संविधान-विरोधी हैं। इस से अब तक भाजपा-सरकार के ख़िलाफ़ उठ रही गुस्से की लपटों का रुख आरएसएस की तरफ भी मुड़ने लगा। सच्चाई तो यह है कि अगर भागवत ने अपने तेवर कड़े कर के नरेंद्र भाई को शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लेने का अंतिमेत्थम न दिया होता तो वे तो आंदोलनकारियों को सख़्त सबक सिखाने के लिए कमर कस कर बैठे हुए थे।

तो आंदोलन का समाधान निकालने में अपने पुण्य-कर्म की उलटबांसी होते भला भागवत कैसे देखते? भाजपा की भावी संभावनाओं का ‘मोशा’ ने जिस तरह नाश किया और आरएसएस की नेकनीयत-छवि का लिमये ने जिस तरह सत्यानाश किया, उस के बाद भागवत ने मरम्मत के औजार ले कर मैदान में उतरने में देर करना ठीक नहीं समझा। इसलिए मुंबई के नीता-मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में देश भर के दो हज़ार चुनिंदा युवाओं के बीच भागवत ने शिक्षा प्रणाली, आरक्षण, समलैंगिक विवाह और सामाजिक सद्भाव जैसे पेचीदे मसलों पर अपनी बात रखी। बड़े सलीके से रखी। चाशनी में डुबा कर रखी।

कुछ ख़ुराफ़ती चाहें तो इस आयोजन को प्रायोजन भी कह सकते हैं। वे यह विलाप कर सकते हैं कि 15 से 19 साल के बीच जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा के दो हज़ार युवक युवतियां आए नहीं, लाए गए थे। जोड़ने वाले उन के आने-जाने पर हुए खर्च का हिसाब भी जोड़ सकते हैं। पूछने वाले सांस्कृतिक केंद्र के ग्रैंड थियेटर का किराया भी पूछ सकते हैं। कहने वाले यह भी कह सकते हैं कि संस्कृति से नीता और मुकेश का क्या लेना-देना है, सो, सांस्कृतिक केंद्र उन के नाम पर क्या सिर्फ़ इसलिए कि उन की गांठ के पैसे से वह बना है? छींटे उछालने वाले यह सुरसुरी भी फैला सकते हैं कि यह समूचा मजमा जुटाने वाली संस्था ‘इंडियाज़ इंटरनेशनल मूवमेंट टु युनाइट नेशन्स’ (आईआईएमयूएन) के 15वें वार्षिकोत्सव में भागवत को मुख्य अतिथि बनाना क्या अनायास था?

अब ज़रा आईआईएमयूएन की बात कर लें। भागवत से सवाल करते जिस नौजवान को आप ने इस बृहस्पतिवार देखा, उस का नाम है ऋषभ शाह। तकनीकी तौर पर वे ख़ुद जेन-अल्फ़ा तो ख़ैर हैं ही नहीं, जेन-ज़ी भी नहीं हैं। उन की उम्र 34 साल है। यानी वे चार साल पहले तक जेन-ज़ी थे। आईआईएमयूएन की स्थापना ऋषभ ने ही 15 साल पहले की थी। तब वे जेन-ज़ी थे। उन्होंने कॉमर्स विषय में स्नातक तक की पढ़ाई की है, लेकिन आज वे कई विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता और कई संस्थानों में सलाहकार हैं। ऋषभ अपने पिता के आयरन और स्टील कारोबार के संचालन में भी हाथ बंटाते हैं।

आईआईएमयूएन की पितृ संस्था ‘टेकिंग इंडिया फॉरवर्ड फाउंडेशन’ है। पीरामल उद्योग समूह के अजय पीरामल इस फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। गोदरेज और बजाज उद्योग समूह आईआईएमयूएन को बड़ी आर्थिक मदद करते रहे हैं। बैंकर नैना लाल किदवई क़ॉरपोरेट कंपनियों के सामाजिक उत्तरदायित्व कोष से पैसा दिलाने में ऋषभ की मदद करती हैं। फिल्म निर्माता करन जौहर और कांग्रेस के सांसद पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर आईआईएमयूएन के बोर्ड में हैं। धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल, जे. डब्ल्यू. मैरियट ग्रुप, एम्बी वैली सिटी और मुंबई के संपन्न गुजराती और पारसी दिग्गजों का पूरा आशीर्वाद ऋषभ के साथ है। वैसे तो वार्षिकोत्सव में हर साल अलग-अलग मुख्य अतिथि होते हैं, मगर अब तक के 15 वार्षिकोत्सवों में से 3 में भागवत को आमंत्रित किया गया है। भागवत 2016 और 2020 में भी मंचस्थ थे।

आईआईएमयूएन कुछ कुहासों में भी घिरा हुआ है। देश भर में उस से संबद्ध युवा समय-समय पर संस्था की संरचना और कार्यविधि को ले कर कई तरह के सवाल उठाते रहे हैं, जिन का ऋषभ ने कभी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। आईआईएमयूएन के बहुत-से स्वयंसेवी सदस्यों की ये शिक़ायतें भी सामने आई हैं कि उन्हें राजनयिक प्रतिनिधि के बजाय बिक्री-प्रतिनिधि की तरह इस्तेमाल किया जाता है और एक विशुद्ध अकादमिक गतिविधि का पूरी तरह व्यवसायीकरण कर दिया गया है। देश भर में होने वाले अकादमिक सत्रों में हिस्सा लेने वाले युवाओं से कहने को तो शुल्क रियायती दरों पर लिया जाता है, मगर स्वयंसेवी-सदस्यों को एक बड़ी संख्या में भागीदार पंजीकृत करने का लक्ष्य रख कर ज़्यादा-से-ज़्यादा धन इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है।

आईआईएमयूएन के प्रायोजन में भागवत की ताज़ा शिरकत के बाद यह विवाद भी ज़ोर पकड़ गया है कि युवाओं के ख़ालिस अकादमिक उत्थान के लिए काम कर रही एक संस्था का राजनीतिकरण क्यों किया जा रहा है? सवाल उठ रहा है कि जेन-ज़ी के क्षोभ का निशाना बनने के फ़ौरन बाद किशोर-पीढ़ी से मुख़ातिब होने के लिए संघ-प्रमुख को आईआईएमयूएन का मंच क्यों उपलब्ध कराया गया? यह संदेह ज़ाहिर करने वालों का मुंह आख़िर कौन बंद कर सकता है कि कहीं ऋषभ शाह के ज़रिए हुए प्रायोजन से ‘मेरा जेन-ज़ी, तेरा जेन-ज़ी’ के दंगल के अंकुर तो आकार नहीं ले रहे हैं?

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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