हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।
  • राष्ट्रवादी आंदोलन और बौद्धिक पतन

    नीरद बाबू की आत्मकथा के दोनों भाग समकालीन भारत का वास्तविक इतिहास समझने के लिए एक अनिवार्य स्त्रोत-ग्रंथ हैं। उन के प्रकाशन के सात और चार दशक बाद भी उन में कोई बुनियादी भूल कठिनाई से मिलती है। उसे इतिहास, राजनीति, एवं साहित्य शिक्षण की एक महत्वपूर्ण पाठ्य सामग्री बनाना चाहिए। नीरद चौधरी की विहंगम दृष्टि - 2 राष्ट्रीय सुरक्षा, विशेषतः आंतरिक सुरक्षा में स्वतंत्र भारत की भारी दुर्गति हुई है! जहाँ अंग्रेजों ने भारत में सदियों से चल रही अराजकता, हिंसा, लूट, उत्पीड़न, आदि नियंत्रित कर अंदर-बाहर सुरक्षित किया। वहीं भारतीय शासकों ने सत्ता लेते-लेते ही अपने हाथों देश...

  • नीरद सी. चौधरी का लिखा सही साबित हुआ

    भारतीय साहित्य तथा बौद्धिकता का घोर पतन स्वतंत्र भारत में हुआ। ब्रिटिश राज में हमारी भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य रचे जाते रहे। नई साहित्य विधाएं पनपीं। देश-विदेश की सर्वोत्तम रचनाओं का अध्ययन-अध्यापन होता था। स्कूल से विश्वविद्यालयों तक सुयोग्य शिक्षक, प्रशासक ही नियुक्त, प्रोन्नत, सम्मानित होते रहे। यह सब स्वतंत्र भारत में तेजी से गिरा।..जिस यूरोपीय शिक्षा से ही यहाँ असंख्य विद्वान, चिंतक, वैज्ञानिक, साहित्यकार बने, उसी की अंधनिन्दा करके गत सौ साल से हमारे नेताओं ने सस्ती तालियाँ बटोरी हैं। वे अनजान जनता व खुद को भी बेवकूफ बनाते हैं। ब्रिटिश राज और देसी राज-1: अनूठे इतिहासकार नीरद सी....

  • अरुण, यह क्षरता देश हमारा!

    सत्य वोट से तय नहीं होता। यह कुरू-सभा में अकेले विदुर से लेकर गाँधी-मजमे के सामने अकेले टैगोर तक प्रमाणित है। तब, कैसा देश है हमारा? उत्तर के लिए कुछ सर्वविदित तथ्यों पर विचार करें। यह ऐसा देश है, जहाँ….. Social political issue भारत विश्व-गुरू बन रहा है, या विश्व-मजदूर जो अपना पेट पालने और चमड़ी बचाने के सिवा कोई विशेष काम नहीं जानता? यह परखने का कोई पैमाना तो होगा। लेकिन इस से बच कर हर बात शोर-शराबे, लोभ-धमकी, मान-अपमान, तैश-तुर्शी और 'संख्या' बल‌ से सही ठहराने की जिद आज व्यापक है। पर सत्य वोट से तय नहीं होता।...

  • … कस्मै देवाय हविषा विधेम?

    कवियित्री महादेवी वर्मा ने दशकों पहले पाया था कि हमारे बीच जाति-भेद से भी अधिक घातक पार्टी-बाजी भेद है। सो यदि हमारे नेता मंदिरों को दलीय लाभ-हानि के मंसूबे से जोड़ेंगे तो सभ्यतागत शत्रु ताक में बैठे हैं। यहाँ जो जिहादी ध्वंस 1921, 1947, 1990 आदि में बड़े पैमाने पर, और छोटे पैमाने पर अनवरत होता रहा है, वह करने वाले हिन्दुओं के अज्ञान, अहंकार, और भेदभाव से और उद्धत बनते हैं।आज हिन्दू समाज में दलबंदी की सनक से ही अज्ञान और दुराव बढ़ रहा है।‌ कविगुरु टैगोर ने देखा था कि हमारे क्रियाकलापों में मुख्य को उपेक्षित कर गौण...

  • संघ परिवार: मंदिर का व्यापार

    अभी तो बस हाथ में आया, बल्कि किसी से छीना हुआ चेक भुनाना ही उन की संपूर्ण दृष्टि है। समाज-हित में दूरदर्शिता से उन का शायद ही कभी संबंध रहा है। वे मंदिर को पार्टी का व्यापार बनाकर मुनाफे की जुगत में हैं। आगे अयोध्या की गरिमा और सुरक्षा का भी क्या होगा? यह पहले की तरह उन के रडार से बाहर है। लुई पंद्रहवें की तरह, 'मेरे बाद कुछ हो, मेरी बला से!' ही उन की मानसिकता लगती है। इस्लामी आक्रांताओं ने सदियों से हजारों हिन्दू मंदिर तोड़े, और अनेक प्रमुख मंदिर-स्थलों पर मस्जिदें खड़ी कर दी। पर किसी...

  • मैकॉले की झूठी बदनामी

    भारत में मैकॉले शब्द मानो गाली की तरह चलता है। यह दोहरी लज्जा की बात है। एक तो, स्वतंत्र होने के 76 वर्ष बाद, अपने कर्मों के लिए, दो सदी पहले के विदेशी को कोसना। जिस चीज को हमारे शासक बदलना, या नया चलाना चाहते हैं, उसे एक झटके में करते रहते हैं। इसलिए दशकों से यहाँ जो भी चल रहा है, उस का संपूर्ण उत्तरदायित्व भारतीयों का है। दूसरी लज्जास्पद बात मैकॉले के बारे में भी झूठी बातें कह कर अपने को होशियार समझना है। लॉर्ड बाबिंगटन मैकॉले (1800-1859) एक ब्रिटिश राजनीतिज्ञ, कवि और इतिहासकार थे। उन्होंने कानून की...

  • संघ सुखानुभूति का सच

    चुनाव से चुनाव तक की अनन्त आशा करते जीवन पूरना चाहिए। भाषा, संस्कृति, शिक्षा, कानून, जजिया, संख्या, मात्रा, आदि किसी पैमाने की बात ही नहीं उठानी चाहिए। सब गाँधीजी जैसे अवतार पर भरोसा कर छोड़ देना चाहिए। ''क्या आप को हमारी नीयत पर भी संदेह है?'' इसे तुरुप के इक्के की तरह रखकर वे आत्मविश्वास से तमतमा उठते हैं। पर संदेह तो गाँधीजी की नीयत पर भी न था! संघ-परिवार, और उस के उत्साही समर्थक सुखानुभूति में सराबोर हैं। ऐसे कि एक भी असुविधाजनक सत्य सामने रखने वाले पर व्यंग्य/धमकी की बौछार करने को तैयार, चाहे वह शुभचिंतक क्यों न...

  • संघ परिवार: हिन्दुओं पर प्रहार

    संघ नेताओं द्वारा गंभीर मुद्दों पर मुल्लों की तरह फतवे देकर मनगढ़ंत बातें कहने की जिद क्या दर्शाती है? यह कैसा आचरण है? यह न हिन्दू आचार है, न हिन्दू ज्ञान परंपरा से जुड़ाव, न जिम्मेदार बौद्धिकता, न देश-हितकारी।….नित झूठे बयानों से ऐसे संघ-भाजपा नेता कौन सा 'चरित्र निर्माण' कर रहे हैं, यह सभी के लिए विचारणीय है। हाल में आर.एस.एस. (संघ) के एक सर्वोच्च नेता ने हिन्दू समाज पर कहा: "हम ने अपने ही साथी मनुष्यों को सामाजिक व्यवस्था में पीछे रखा। हम ने उन की परवाह नहीं की और यह सिलसिला दो हजार साल चलता रहा। उन का...

  • क्या नीरद चौधरी गलत थे?

    नीरद चौधरी का आधारभूत अवलोकन यह था कि भारत मानो लोहे का एक विशाल बेलन (पिस्टन) है, जिसे अंग्रेजों ने खींच कर स्थिर किया और दृढ़ता से स्थिर रखा। जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का स्थान लिया वे दुखती बाँह से किसी तरह उस बेलन को पकड़े हुए हैं। वह बेलन टिकाए रखने के लिए कोई खूँटी या रस्सी नहीं है। भारतीय नेताओं में उस बेलन को पकड़े रखने लायक स्नायुबल नहीं है। फलत: ‘‘यह बेलन इंच दर इंच हाथों से फिसल रहा है। एक दिन हमारी शक्ति जबाव दे जाएगी, बेलन एक झटके में भयावह आवाज के साथ पुरानी खाई...

  • राज्य और पार्टी का घालमेल रोकें-2

    भारतीय दलों ने ऐसे अघोषित अधिकार ले लिये हैं, जो यूरोप, अमेरिका में कोई सोच भी नहीं सकता। एक ओर यहाँ किसी के बैंक-खाते में भी बड़ी रकम आने पर देखने की व्यवस्था है। तब यह कैसा मजाक कि राजनीतिक पार्टियाँ द्वारा सैकड़ों करोड़ लेन-देन की कोई हिसाबदारी न हो! स्थानीय से ऊपर तक के चुनावों में एक-एक सीट पर कई पार्टियाँ जो खर्चती हैं, उस से एक ही चुनाव में सैकड़ों करोड़ रूपये लगाती हैं। वह धन कहाँ से आया, क्या यह संवैधानिक संस्थाओं को भी जानने की जरूरत नहीं? एक ओर लघुतम दुकानदार या क्लर्क से भी आमदनी...

  • क्या पार्टियां देवमंदिर और नेता देवता है?

    आज सुप्रीम कोर्ट में यह दावा कैसे हो रहा, कि राजनीतिक दल अन्य संस्थाओं, नागरिकों से ऊपर और वित्तीय हिसाब देने से परे हैं? इस से बड़ी जबरदस्ती और सत्ता का दुरुपयोग क्या होगा - कि जो सब से अधिक लोभ-लालसा के शिकार होने, और भयंकर गड़बड़ियाँ कर सकने की स्थिति में हो, उसी को जबावदेही से मुक्त कर दें! .. क्या राजनीतिक दल और उन के नेता कोई देवमंदिर और देवता हैं, जिन की हस्ती दूसरी संस्थाओं और मनुष्यों से ऊपर है?...क्या हम रूस वाली सोवियत व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ पार्टी और राज्य एकम-एक बना दिए...

  • क्या इजराइल मिट जाएगा?

    दरअसल इजराइल की जान पर वही जिहादी आफत है, जो भारत के हिन्दुओं पर पिछले हजार, विशेष कर सौ सालों से है! जैसे विविध इस्लामी दस्तों, संगठनों ने भारत पर बाहर-अंदर से हमले किए हैं, उसी तरह इजराइल के बनते ही उस पर मिस्र, इराक, जोर्डन, लेबनान, सीरिया ने इकट्ठा हमला किया था। पर जो इजराइल को ही दुष्ट दोषी मान कर सारा विमर्श करते हैं, उन्हें याद रहे कि यहूदी लोग इतने शान्त स्वभाव रहे हैं कि खुद मुस्लिम उन्हें कायर कहते थे! भारत में सदा की तरह फिलीस्तीन का रोना शुरू हो गया है। जबकि इजराइल के लिए...

  • संघ-परिवार: हिन्दुओं का बंटाधार

    संघ-भाजपा महापुरूषों ने उसी तबलीगी जमात के सरपरस्त को दो-दो बार राष्ट्रीय सम्मान देकर, तथा अन्य विविध संसाधन सहयोग देकर उस का हौसला बढ़ाया है। यह कैसी वीभत्स नीति है!अर्थात, हिन्दुओं की ही अन्य पार्टियों के प्रति विषैला दुष्प्रचार करना, और खुद जिहादी तत्वों को पुरस्कृत, संसाधित, उत्साहित करना। ऐसे लोगों को जो किसी भी तरह से गैर-मुस्लिमों का खात्मा ही अपना लक्ष्य मानते हैं। ... यह नजारा संघ-परिवार के बारे में सीताराम गोयल के अवलोकन की सिहरा देने वाली पुष्टि है।  कांग्रेस को हमास, बोको हराम, लश्कर-ए-तैयबा,  हिजबुल्ला, आइसिस, तालिबान जैसा बताकर 'हिन्दुओं सावधान' - इस आशय के मीम...

  • लोकतंत्र पर रोना/गाना हास्यास्पद है

    लोकतंत्र की क्लासिक आलोचना अखंडित हैं, तो लोकतंत्र को ही मानदंड मानना स्वत: एक छल है। जिस से लोगों को झूठे गुमान में फुलाकर इधर या उधर के प्रपंची को समर्थन देने के लिए फुसलाया जाता है।...विश्वविद्यालयों में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह...’ और ‘ला इलाहा इलल्लाह...’ के नारे अनायास नहीं है। उस के पीछे दशकों से अबोध किशोरों, युवाओं को 'मायनोरिटी' चिंता और हिन्दू-द्वेष के पाठ पढ़ाना है। उसे संघ-परिवार के महापुरुष रोकने के बजाए मजे से चलने देते हैं, ताकि उन्हें हिन्दू 'प्रतिक्रिया' का लाभ मिलता रहे! किसी दल को सचाई, निष्पक्ष आकलन, या समाज की परवाह नहीं...

  • क्या मीडिया बिकाऊ है?

    मीडिया के सदस्य उसी हद तक बिकाऊ हैं जिस हद तक अन्य संस्थाओं के सदस्य।...यदि हमारा मीडिया अपने पर छोड़ दिया जाए तो अभी भी बिकाऊ नहीं है। सभी अखबारों, चैनलों में परिश्रम और सत्यनिष्ठा से काम करने वाले पत्रकार भी हैं। समाचारों को कुछ मतवादी झुकाव, बनाव-छिपाव करने के सिवा, अच्छे संस्थानों के अधिकांश पत्रकार गड़बड़ नहीं करते। पर यदि राजनीतिक वर्ग ही अपने बल का उपयोग मतवादी या धंधेबाज किस्म के पत्रकारों को बढ़ाने और मीडिया मालिकों पर दबाव देने में करे तो मूल दोष उस का है। तब इस उस पत्रकार को चुनकर निशाना बनाना राजनीतिक ही...

  • संघ-परिवार: विषकन्या का शिकार

    डॉ. अंबेदकर ने देखा था कि “मुसलमानों की माँगें हनुमानजी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं”। जिसे पूरा करते जाने के चक्कर में गाँधी ने देश-बँटवारा तक मान लिया।…      इस प्रकार, भारत में वोट-बैंक लालसा के पहले शिकार गाँधी थे। जिस से देश की अकूत हानि के सिवा कभी कुछ न मिला। 1919-48 तक की घटनाओं के आकलन से यही निष्कर्ष मिलेगा। उस दौरान अनेक नेताओं, मनीषियों ने गाँधी को चेतावनी दी। पर वे अपने मोह, अहंकार से उबर न सके।अब संघ-भाजपा नेता उसी लालसा और अहंकार में डूब रहे हैं। जिन लोगों ने 'मुस्लिम तुष्टिकरण' की दशकों निन्दा...

  • संघ परिवारः मुस्लिम मोह में गिरफ्तार

    नजारा घातक राजनीति है। सभी सूफी इस्लामी माँगे रखते हैं। उस ‘वर्ल्ड सूफी फोरम’ ने आतंकवाद विरोध के नाम पर दिल्ली सम्मेलन किया जिस में भाजपा महाप्रभु गये थे। पर उस की माँगे यह थीं - मुसलमानों के खिलाफ हुई ‘ऐतिहासिक गलतियाँ’ सुधारें; अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा दें; केंद्रीय सूफी संस्थान बनाएं, तथा उस की शाखाएं खोलें; सूफी विश्वविद्यालय बनाएं; ‘सूफी कॉरिडोर’ बना कर सभी सूफी केंद्रों को जोड़ें, आदि। उन में से कई माँगें पूरी हो चुकी हैं। खुद भाजपा मंत्री और पदाधिकारी गर्व से बताते रहते हैं!  आगामी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए...

  • धर्म नीचे, मूर्ति ऊपर!

    संघ-भाजपाई बच्चों से भी हल्का व्यवहार करते हैं। बच्चे तो शिक्षक की भावना समझ लेते हैं, किन्तु संघ-परिवार के नेतागण दशकों बाद भी संवेदनहीन हैं। पीढ़ियों, नेताओं के बदलने पर भी उन में कुछ नहीं बदलता। वे राजनीतिक तिकड़मों के बाद भावनाओं, लफ्फाजी, और तमाशों के सिवा किसी चीज को महत्व नहीं देते।....सच यह है कि आगे हिन्दू समाज बचेगा भी या नहीं, वे इस से बेपरवाह हैं। अपने कथित ‘राष्ट्रवाद’ के लिए उन की एक ही लालसा है, कि उन के दल, संगठन, और नेताओं का नाम जैसे भी ऊपर रहे। मानो किसी नीम-हकीम की लालसा हो कि मरीज...

  • भाजपा बनाम इन्डिया: गलती कहाँ?

    भारत का इन्डिया नाम लगभग ढाई हजार वर्ष से चला आ रहा है। इस नाम के उद्भव और प्रयोग का अंग्रेजी राज से कोई लेना-देना ही नहीं है। ….सोचना चाहिए कि हमारे तमाम राजनीतिक दलों में असली बुद्धू कौन है? कथित पप्पू, या खुद को तीसमार खाँ समझने और अपने मुँह-मियाँ मिट्ठू बनने वाले संघ-भाजपा नेता? केवल कुर्सी पर होना बुद्धिमत्ता का प्रमाण नहीं, जो विविध संयोग दुर्योग से भी होता है। इक्कीस वर्ष पहले गोवा में लालकृष्ण अडवाणी केवल चुप रह गए होते तो आज कुर्सीनशीन कोई और होते। भारत में अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादी, विशेषकर संघ-परिवार के नेता और...

  • लोकतंत्र का सच झूठ

    कुछ लोग विदेशी नेताओं के जमावड़े में भारत के लोकतंत्र का गौरव बखानने की तैयारी कर रहे हैं। इस दावे से कि भारत में ही लोकतंत्र पैदा हुआ, आदि। यह दिखाता है कि अंग्रेजों के जाने के 75 वर्ष बाद भी हम गुलाम और हीन मानसिकता से ग्रस्त हैं। हमारे नेता और बौद्धिक पश्चिम की नकल, और ठकुरसुहाती से निकल स्वतंत्र चिंतन और व्यवहार नहीं अपना सके हैं। जब जिस पश्चिमी विचार का वर्चस्व हो, वे अपने को ‘हम भी वही’ की भंगिमा ओढ़ मैसी साहब की तरह इतराने लगते हैं।…पार्टियों और नेताओं की सारी लड़ाई में 'जन-सेवा' है ही...

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