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हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।
खड़गे का स्वायत्त अग्निपथ

शशि थरूर को हारना था, वे हार गए। जिन्हें लग रहा था कि थरूर कांग्रेस-अध्यक्ष का चुनाव बुरी तरह हारेंगे, उनका अंदाज़ा ग़लत निकला।

जीत-हार के घूंघट से झांकता मुस्तक़बिल

जिन्हें नहीं मानना, न मानें, मगर कांग्रेस की सियासत का एक नया दौर तो शुरू हो गया है। इस दौर में कांग्रेस एक नई संरचना के सांचे में ढलेगी।

नमक-बयानी के दौर में प्रश्न-शून्य उपासना

गांधी जयंती के अगले दिन महामहिम राष्ट्रपति अपनी पहली गुजरात यात्रा पर गईं तो उन्होंने हमें बताया कि सभी देशवासी गुजरात का नमक खाते हैं।

बेढब बबूल, सुघड़ देवदार और हम-आप

ज़िद्दी होना और दृढ़ होना, दो अलग-अलग प्रवृत्तियां हैं। पहली नकारात्मक चित्त-वृत्ति हैं और दूसरी सकारात्मक अंतःप्रकृति। ज़िद विस्तारवादी वासना है।

विलोम घर्घर नाद का श्रीगणेश

कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को शुरू हुए तीन दिन ही हुए हैं और सूचना मंचों पर ‘मोशा’ के अनुचर इतनी ताताथैया करते दिखाई दे रहे हैं कि क्या कहा जाए?

किस्सा दिल्ली की ‘अरेबियन नाइट्स’ का

खाशोगी की यादों के मटमैले बादल आज 31 बरस बाद भी रायसीना की पहाड़ी के ऊपर मंडराते आपको दिख जाएंगे। खाशोगी 1991 की फरवरी के अंतिम दिनों में दिल्ली आए थे।

राहुल गांधी से माफ़ीनामे के साथ

राहुल जी, उन कांग्रेसजन की तरफ़ देखिए, जो उदासी, निराशा और हताशा के तमाम थपेड़ों के बीच भी बरसों-बरस से डिगे नहीं हैं।

जगदीप धनखड़ और सियासी मोहिनीअट्टम

धनखड़ के चार दशक के सियासी सफ़र से जो वाकिफ़ हैं, वे जानते हैं कि बावजूद इसके कि उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक निर्णय लिए, उनका राजनीतिक आचरण-व्यवहार टटपूंजिएपन से हमेशा परे रहा।

विपक्ष के अंकगणित का असली बीजगणित

महंगाई और बेराज़गारी के ख़िलाफ़ कांग्रेस के देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत से पहले राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में पांच अहम् बातें कहीं।

महामहिमों के लिए ‘ॐ अपवित्रः पवित्रो वा’ मंत्र-जाप

उम्मीद करें कि अगले पांच बरस राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भवन की दीवारें पहले से ज़्यादा संप्रेषणीय साबित होंगी।

सीढ़ियों से छत तक पहुंचा लोकतंत्र का मंदिर

नरेंद्र भाई मोदी को लोकतंत्र के परम पावन मंदिर की सीढ़ियों पर दंडवत प्रणाम करते देखने वाला दृश्य अब तक मेरे दिमाग़ पर चस्पा है।

मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और संघीय व्यवस्था

किसी मुख्यमंत्री को अपने राज्य में प्रधानमंत्री के आने पर उनकी अगवानी के लिए जाने की कोई संवैधानिक अनिवार्यता तो है नहीं?

अफ़साना चश्मे-बद्दूर अभिलाषाओं का

लीपापोती कोई कुछ भी करे, असलियत यही है कि समूचा समाज दो-फाड़ हो गया है। हर तरफ़ तलवारें तनी हुई हैं।

ठुमकों की उम्मीद पर प्रतिदंड के पानी की कहानी

बालासाहेब के ज़माने में किशोरवयी रहे शिवसैनिकों को उद्धव की रहनुमाई तो रास आ सकती थी, मगर आदित्य ठाकरे को अपने सिर पर वे कैसे नाचने दें?

ख़ामोशी की बर्फ़ के नीचे बहता ताताचट लावा

अपनी ग़लतियों को सार्वजनिक तौर पर मानने का तो छोड़िए, मन-ही-मन उनका अहसास कर लेने की भी संवेदना आज कितनों में आप को दिखाई देती है?

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