अनुचरों की झांझरें और समय का घर्घर-नाद

42 बरस पहले एक फ़िल्म आई थी ‘घर’। उसमें गुलज़ार का लिखा एक गीत लता मंगेशकर…

हाहाहूहू युग के नक्कारखाने की तूती

घर, घर होता है। चाहे वह समंदर किनारे न हो, चाहे वह हरे-भरे जंगलों के बीच…

आराधना में डूबे देश का तंद्रा-भंग दौर

इससे क्या कि कबीर दास जी 1398 में जन्मे थे या 1440 में? इससे भी क्या…

ऐसी प्रजा कहां मिलती, नरेंद्र भाई!

मैं ऐसे बहुत-से लोगों को जानता हूं, जो छह साल पहले मानते थे कि भारत को…

ढपोरशंखी व्यवस्था से उकताहट का दौर

राष्ट्रीय नज़रबंदी में कल के बाद हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को कुछ-न-कुछ राहत तो इसलिए…

इतना छिछोरा तो प्रचंड भंडारी भी नहीं था

परसों-तरसों जब मैं ने शक़्ल-पुस्तिका की अपनी दीवार (फेसबुक वॉल) पर यह इबारत लिखी कि ‘‘इतना…

मुमुक्षु-भवन की खिडकी से दिखता चांद

बचपन से सुनते आ रहे थे कि भैया, मनुष्य बली नहीं होता है, बलवान तो समय…

धरती को महज़ सैरग़ाह समझने का नतीजा

मैं बचूंगा तो विचार बचेगा, विचारधारा बचेगी। पहले ख़ुद तो बच जाऊं, तब जनतंत्र का सोचूं,…

लोक-संस्कृति का राम-राज्य! और एक विषाणु

मुझे याद नहीं कि दुर्गा-अष्टमी पर घर में कभी कन्या-पूजन न हुआ हो। मगर इस बार…

अवसाद के समय में पालनहार से गुहार

हे प्रभु! क्या ग़लती हो गई हम पृथ्वी-वासियों से? क्या हम से राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक…

कमलनाथ और कांग्रेस का अंतिम सत्य

मध्यप्रदेश-प्रसंग ने भाजपा की जिस नंगई को खुलेआम उज़ागर किया है, उसे अब किसी भी हथेली…

राम-नाम सत्य की खोज में निकलने के बाद

मैं व्यक्तिगत तौर से जानता हूं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का मन कांग्रेस में तीन-चार महीने से…