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स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।
  • राहुल के छकड़े से कांपती नरेंद्र भाई की बग्घी

    राहुल गांधी का छकड़ा नरेंद्र मोदी की बग्धी के एकदम बगल में आ कर खड़ा हो गया है। एक प्रतिशत का मत-अंतर आख़िर होता ही कितना है? सो, भी तख़्त-ए-मुनाफ़िक़त के हर मुमकिन प्रपंचों के बाद।....अब बस एकाध बरस में उस का अंतिम पर्व आरंभ हो जाएगा। राजनीतिक मौसम तेज़ी से पहलू बदल रहा है। सो, अपनी आंखें मसलिए और इस बदलती करवट के इशारे समझिए।  इस संसार में कोई भी मानव न तो गुणों की खान है और न कोई अवगुणों की खदान है। इसलिए अगर कोई मुझ से यह कहे कि फ़लां का तो पोर-पोर खूबियों से सराबोर...

  • आर-पार के संग्राम की अवतरणिका

    पूत के पांव भी पालने में ही दिख जाते हैं, सपूत के पांव भी और कपूत के पांव भी। कहते हैं कि पूत सपूत तो का धन संचय और पूत कपूत तो का धन संचय। अब कौन पूत है, कौन सपूत और कौन कपूत - यह तो आप तय करिए, मैं तो आप को इतना ही आगाह कर सकता हूं कि हमारे लोकतंत्र पर ये पांच साल, पिछले दस साल से भी, ज़्यादा भारी पड़ने वाले हैं। ये पांच बरस भारत के सियासी महाभारत की लड़ाई का अठारहवां दिन साबित होंगे। इस के संकेत अठारहवीं लोकसभा की शुरुआत होते ही...

  • मरियल कुंडियां और प्रतिपक्ष का तात्विक कर्म

    अगर चुनाव कुप्रबंधन के थोड़े भी पर्याप्त प्रमाण हों तो विपक्ष को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के ख़िलाफ़ संसद में महाभियोग चलाने का प्रस्ताव पेश करना चाहिए।....विपक्ष को एक काम और करने की गांठ बांधनी चाहिए। नरेंद्र भाई ने विमर्श के गलियारे बंद करने की मंशा से संसद के नए भवन में केंद्रीय कक्ष का निर्माण ही नहीं होने दिया है। पुराने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष को पुनर्जीवित करने का ज़ोरदार उपक्रम सकल-विपक्ष अगर करेगा तो उसे सांसदों, पूर्व सांसदों, राज्यों के मंत्रियों, विधायकों, पूर्व विधायकों और पत्रकारों का निर्विवाद अखिल भारतीय समर्थन हासिल होगा। इस मुहीम की जीत का...

  • संग्राम सत्रहवें दिन में आ पहुंचा है

    नरेंद्र भाई हवा का रुख भांप गए थे कि स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाने की दलील दे कर आरएसएस इस बार उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने देगा। सो, उन्होंने भाजपा संसदीय दल की बैठक ही नहीं होने दी और एनडीए के सहयोगी दलों से समर्थन की चिट्ठियां इकट्ठी कर ख़ुद को ख़ुद ही प्रधानमंत्री नामित कर लिया। अनुचरों ने पूरी निर्लज्जता से इसे ‘मोदी-3.0’ का ख़िताब दे दिया और हमारे नरेंद्र भाई ने इसे ‘एनडीए की निरंतरता’ के ज़ुमले से नवाज़ दिया। सोचिए कि अगर नरेंद्र भाई मोदी का जन्मदाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही जब दस बरस की उन की...

  • अब लद्दू मत बनिए नरेंद्र भाई

    अगर वे 2014 की ही तरह 2024 में भी प्रधानमंत्री बनने के लिए अड़े रहे तो अपनी डोली ढोने वाले कहार इस बार कहां से लाएंगे? कहारों की यह अनुपस्थिति ही आगामी ओस-बूंदों का आश्वासन है। नरेंद्र भाई मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का नैतिक हक़ भी खो चुके हैं और तकनीकी हक़ भी। बावजूद इस के अगर वे ख़ुद को रायसीना की पहाड़ी पर लादने की कोशिश करेंगे तो मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि उन की इस ढिठाई पर देशवासियों के मन से तो वे और भी ज़्यादा तिरस्कृत होंगे ही, भारतीय जनता पार्टी और उस के पितृ-संगठन...

  • ‘ध्यान’ की पंचवर्षीय योजना का उपसंहार

    ‘ध्यान’ अगर ‘ध्यान’ है तो उसे मतदान के अंतिम चरण की पूर्व संध्या से शुरू कर मतदान ख़त्म होने पर ख़त्म करना ही क्यों ज़रूरी है? ध्यान अगर ‘ध्यान’ पर है और चुनाव पर नहीं तो फिर तो ‘ध्यान’ कभी भी, कहीं भी, किया जा सकता है। उस के लिए विवेकानंद शिला की ही क्यों ज़रूरत है, उस के जीवंत प्रसारण की क्यों ज़रूरत है, उसे मंचीय स्वरूप देने की क्यों ज़रूरत है? पांच बरस पहले केदारनाथ की गुफ़ा में बैठ कर भी अपने ‘ध्यान’ का जीवंत प्रसारण नरेंद्र भाई ने कराया था। .. नरेंद्र भाई के ‘ध्यान’ की यह...

  • ‘मोशा’- झोले से झांकता ग़लतियों का ज़ख़ीरा

    आधुनिक चाणक्य समझने की झौंक में मोशा-क्लब से यह महा-भूल हो गई कि उस ने पिछली बार जीते अपने कुल 124 सांसदों को बड़े बेआबरू हो कर बाहर जाने पर मजबूर किया। पिछली लोकसभा में भाजपा के पारंपरिक दिग्गजों का यह 41 फ़ीसदी हिस्सा क्या इन चुनावों में पहले सरीखे उछाह से काम कर रहा होगा? जिन के टिकट काटे गए हैं, उन्हें 2019 के चुनाव में पौने तीन करोड़ वोट मिले थे। तो देश भर में नरेंद्र भाई के खि़लाफ़ पसरी उकताहट के बीच से झांकते इस क्षोभ पर भी ग़ौर कीजिए। 400 पार के अपने अति-आत्मविश्वास में, अपने...

  • अकिंचनों की धरती पर परमात्मा का दूत

    नरेंद्र भाई ने जो कहा, वह शब्दशः यूं हैः ‘‘मां के जाने के बाद मैं कन्विंस हो चुका हूं कि परमात्मा ने मुझे भेजा है। ऊर्जा बायोलोजिकल शरीर से नहीं, ईश्वर को मुझ से कोई काम लेना है, इसलिए उसने सामर्थ्य भी दी है, वही उर्जा देता है। ईश्वर मुझ से कुछ विशेष करवाना चाहता है।’’ प्रधानमंत्री जी ने इस इंटरव्यू में यह भी कहा कि मैं ने जीवन में तपस्या की है जी। अपना पल-पल खपाया है। इसलिए खपाया है कि ये (यानी हम भारतवासी) डिज़र्विंग हैं।... अब आप को और मुझे तो परमात्मा ने पृथ्वी पर भेजा नहीं।...

  • निश्चिंत दिखते नरेंद्र भाई की बेचैनी

    अब इस बात में कोई शुबहा बाकी नहीं रह गया है कि हमारे प्रधानमंत्री जी इस लोकसभा चुनाव में ख़ुद को मिलने वाले समर्थन को ले कर मन-ही-मन हिले हुए हैं। मैं ने रिपब्लिक टीवी के सर्वेसर्वा अर्णब गोस्वामी को दिया उन का इंटरव्यू बहुत ध्यान से सुना और मुझे बार-बार लगा कि दिखाने को भले ही ऊपर-ऊपर से वे ख़ुद को निश्चिंत और तनाव-मुक्त दिखा रहे हैं, मगर उन के भीतर खलबली मची हुई है। अगर ऐसा न होता तो न तो नरेंद्र भाई मोदी इंटरव्यू की शुरुआत में ही यह न कह डालते कि ‘मैं भी आख़िर एक...

  • नरेंद्र भाई भूल गए थे कि बड़ा तो बड़ा ही होता है

    अटलजी तो अटलजी थे। जुगाड़ू सरकार का मुखिया बनाने के लिए उन की पालकी लोग अपने कंधों पर ख़ुशी-ख़ुशी लाद कर रायसीना पहाड़ी तक ले गए थे। नरेंद्र भाई तो लोगों के कंधों पर जबरन लद कर रायसीना पहाड़ी पहुंचे हैं। एक प्रचारक और दूसरे प्रचारक का यह फ़र्क़ सबसे बड़ा फ़र्क़ है।…यदि अब नरेंद्र भाई की चुनावी मुसीबत के वक़्त संघ ने भी चिकने घड़े का ज़ामा ओढ़ लिया है तो कुसूर किस का है? नरेंद्र भाई उम्र में मोहन जी 6 दिन छोटे हैं। और उन्हें मालूम होना चाहिए कि बड़ा-तो-बड़ा ही होता है। नरेंद्र भाई मोदी हमेशा...

  • सफ़ेद झूठ की काली मूसलाधार

    मैं ने इतिहास के वे पन्ने भी पढ़े हैं, जिन में 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद जयप्रकाश नारायण से उन की मुलाकात का ज़िक्र है। जेपी आपातकाल के बाद जनता पार्टी की जीत और इंदिरा जी की हार के महानायक थे। वे इंदिरा जी से मिलने गए तो भीगी आंखों के साथ उन का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछने लगे, ‘इंदु, अपना खर्च कैसे चलाओगी?’ जवाब भी नम आंखों के साथ मिला, ‘पापू की क़िताबों से जो कुछ रॉयल्टी मिलेगी, उस से थोड़ा चल जाएगा।’ ‘मोशा’-सूरत पर हवाइयां उड़ती साफ़ दिखाई दे रही...

  • कारकूनों के कुचक्र में कसमसाती कांग्रेस

    हुआ यह कि पांच चरणों के इस युग में कांग्रेस का ढोल बजा तो खूब, लेकिन तरह-तरह की व्यक्तिगत कार्यावलियों को अपनी चोर-जेब में छिपाए बहुत दिनों से ताक में बैठे कारकून इस ढोल की पोल में घुस गए।.. 139 बरस पुरानी पार्टी का सारा क्रियान्वयन-तंत्र सियासी सहभागियों के बजाय कारिंदों के सुपुर्द हो गया। कांग्रेस की मुसीबत की आज यही असली जड़ है।.. यह जाने वालों के मीन-मेख निकालने का नहीं, आत्म-निरीक्षण का समय है। देर से ही सही, कभी तो अंतर्दर्शन भी हो। जब जागो, तब सवेरा। जागो तो सही। और, फिर जागते रहो! यह अलग बात है कि...

  • दर-दर दस्तक का गूढ़ार्थ

    पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा से समझौता करने से इनकार ऐसे ही नहीं किया है। ओडिशा में भी नवीन पटनायक भाजपा से अपना दामन बांधने से ऐसे ही नहीं कतराए हैं। समझ लीजिए कि ये सारे संकेत क्या कह रहे हैं? ....राजनीतिक रजतपट पर दस साल से चल रहे दृश्यों ने मतदाताओं के मन में बदलाव की एक परत बहुत गहरे बसा दी है। इसलिए इतनी बड़ी शक़्ल-बदलू कार्रवाई के बावजूद 272 के स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा भी छू पाना भाजपा के लिए दूर के ‘चंदा’मामा साबित होती दिख रही है। lok sabha election 2024 पिछले एक महीने...

  • एक स्वयंसेवक के बेनूरीपन की फ़िक्र

    घूमते-फिरते रहते हुए स्वयंसेवक बने रहना आसान है। प्रधानमंत्री-भाव का बोध अपने में भरना बहुत मुश्क़िल है।… सारे मंत्रालयों की सारी परियोजनाओं का शिलान्यास-उद्घाटन किसी और मंत्री को नहीं करने देने, बात-बात पर ‘एक अकेला, सब पर भारी’ का स्वयं ही उद्घोष करते रहने और ‘मोदी की गारंटी का मतलब है गारंटी की गारंटी’ का ख़ुद ही अनवरत आलाप लगाते रहने की नरेंद्र भाई की ताबड़तोड़ मशक्क़त देख कर देशवासियों में यह धारणा ठोस आकार लेती जा रही है कि इस बार स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा भाजपा की मुट्ठी से तेज़ी से फिसल रहा है। Lok Sabha election 2024 अपने...

  • प्रश्नों की उमड़-घुमड़ का अंतर्व्यूह

    पिछले हफ़्ते मैंने टीवी बहसों में भाजपा के हर प्रवक्ता से पूछा कि 12 लाख मतदान केंद्रों में से हर एक पर 370 अतिरिक्त वोट का मतलब क्या होता है, इसका हिसाब जानते है?  क़रीब 44 करोड़ अतिरिक्त वोट। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल मिला कर तक़रीबन 23 करोड़ वोट मिले थे।  उन में 44 करोड़ अतिरिक्त वोट जुड़ने का मतलब है कि 2024 में भाजपा के 67 करोड़ वोट। इसका अर्थ है कुल मतदान के 70 फ़ीसदी वोट भाजपा पाए। पिछले चुनाव में भाजपा को 37.7 प्रतिशत वोट मिले थे। तो क्या 2024 में उस के...

  • ‘आएगा तो मोदी ही, आएगा तो मोदी ही’

    मुझे नहीं मालूम कि नरेंद्र भाई ही आएंगे या नहीं। लेकिन मुझे इतना मालूम है कि अगर वे आएंगे तो हमारे देश का, हमारे समाज का, क्या-क्या जाएगा और अगर वे जाएंगे तो क्या-क्या आएगा। भाजपा का आना अलग बात है। नरेंद्र भाई का आना अलग बात। नरेंद्र भाई के आने को भाजपा का आना समझने वाले मासूम हैं। भाजपा तो अब तब आएगी, जब नरेंद्र भाई जाएंगे। जो यह समझ लेंगे, देश पर उपकार करेंगे। pm narendra Modi ‘आएगा तो मोदी ही, आएगा तो मोदी ही’ की रट जैसे-जैसे नरेंद्र भाई मोदी (pm narendra Modi) ख़ुद ही ज़ोर-ज़ोर से...

  • नरेंद्र भाई की फ़िक्र में घुलता मैं

    मैं अपने माथे पर हाथ रखे कई दिनों से इस फ़िक्र में घुला जा रहा हूं कि अगर नरेंद्र भाई को 2019 में जीती सारी सीटें दोबारा मिल भी जाएं तो अपने 370 का आंकड़ा पूरा करने के लिए 67 अतिरिक्त सीटों का जुगाड़ वे करेंगे कैसे? अपनी तिलस्मी टोपी से 67 अतिरिक्त खरगोश प्रकट करने के लिए अब और कौन-सी दिहाड़ी बाकी है, जो उन्होंने अब तक नहीं की है? नरेंद्र भाई मोदी ने ऐलान कर दिया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 370 सीटें मिलेंगी और एनडीए 400 पार करेगा। कितना पार, यह...

  • दादी-पिता से ज़्यादा नसीब वाले हैं राहुल

    44 और 52 सीटों वाले राहुल को कांग्रेस के भीतर मिल रहे अपार स्नेह का बीजगणित क्या है? क्या वे कांग्रेसजन के लिए अपनी दादी और पिता से भी बड़े आस्था-केंद्र हैं? क्या आज के मोशा-दौर में वे जिस शुचिता-मूलक सियासत की स्थापना के रास्ते पर चल रहे हैं, वह कांग्रेसजन के लिए विश्वास-धुरी है? क्या कांग्रेस के कायाकल्प और पुनरुत्थान को ले कर राहुल की क्षमता पर कांग्रेसजन का अविचलित यक़ीन इस की बुनियाद में है? मैं राहुल गांधी को भाग्यशाली मानता हूं कि उन्हें एक ऐसी कांग्रेस मिली हुई है, जो दस साल में दो-फाड़ नहीं हुई। राहुल...

  • विपक्ष के आकुल लपोरीलालों की ना-लायकी

    विपक्षी दलों को एकमंचीय करने और उन्हें एकाकार बनाए रखने की प्रक्रिया अगर सोनिया की सीधी रहनुमाई में चली होती तो इंडिया-समूह के राजनीतिक दलों की संख्या 28 से कहीं ज़्यादा होती। मैं अपनी प्रामाणिक निजी जानकारी के आधार पर कह रहा हूं कि ठोस सियासी जनाधार रखने वाले कई राजनीतिक दल अभी भी ऐसे हैं, जो न इधर हैं, न उधर और जिन्हें मलाल है कि इंडिया-समूह की तरफ़ से उन से क़ायदे के किसी व्यक्ति ने संपर्क ही नहीं किया। नरेंद्र भाई मोदी हम पर राज करने के कितने लायक हैं, कितने नहीं, इस पर तो बात तब...

  • तालठोकू फ़रमान और कांग्रेस का इनकार

    हालांकि बहुतों को लगता है, मगर मुझे नहीं लगता कि 22 को अयोध्या पहुंचने के फ़रमान को सरयू में तिरोहित कर देने के कांग्रेसी निर्णय से उसे कोई चुनावी नुक़्सान होगा। उलटे इस से भारतीय जनता पार्टी समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम सहयोगी संगठनों की नीयत पर प्रश्नचिह्न लग गया है।…मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ईसा से 5114 साल पहले जनवरी महीने की दस तारीख़ को जन्मे थे। तब चैत्र महीने का शुक्ल पक्ष था। इस दिन हम हर साल रामनवमी मनाते हैं। इस वर्ष रामनवमी 18 अप्रैल को है।….इसलिए सोनिया गांधी इस रामनवमी पर रामलला के दर्शन करने...

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