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मोदी-भागवत मल्लयुद्ध का धारावाहिक

सोचने की बात यह है कि आज गडकरी के साथ, जो कुछ हो रहा है, क्यों हो रहा है? इस के बीज कम-से-कम 17 साल पुराने हैं। तब नरेंद्र भाई गुजरात के मुख्यमंत्री थे और गडकरी 2009 में भाजपा के अध्यक्ष बन गए थे।… पूरा देश पूछ रहा है कि पेट्रोलियम मंत्री तो हरदीप सिंह पुरी हैं, गडकरी तो राजमार्ग-परिवहन मंत्री हैं, फिर पेट्रोल में इथेनाल के मिश्रण का प्रतिशत तय करने और इस जनविरोधी कदम का इतने आक्रामक तरीके से बचाव करने में उन की इतनी केंद्रीय भूमिका क्यों है?

नितिन जयराम गडकरी की मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक-व्यक्तिगत बदहाली देख कर मुझे उन की दक्षता और कौशल पर तरस आ रहा है। वे हमेशा से प्रखर रहे हैं, परिश्रमी रहे हैं, नए-नए विचारों के जन्मदाता भी रहे हैं और पोषक भी, उन की छवि कुल मिला कर उजली रही है और भारतीय जनता पार्टी के भीतर-बाहर सब को समान भाव से साध कर चलने की उन की क्षमता पिछले पांच दशक से बहुतों ने देखी है। नागपुर विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से 1976 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले गडकरी ने अपने को तक़रीबन हर मौक़े पर कइयों से बेहतर साबित किया है।

लेकिन इन दिनों वे अपने जीवन के संभवतः सब से निराशाजनक दौर से गुज़र रहे हैं। उन की सियासी साख पर बट्टा लग रहा है। उन की सामाजिक प्रतिष्ठा पर बेटों के इथेनाल व्यवसाय का काला साया मंडरा रहा है। उन के प्रति व्यक्तिगत आदर का भाव लोगों के मन में डगमगा गया है। सोशल मीडिया के मंचों पर उन के ख़िलाफ़ हो रही थू-थू अब मुख्य धारा के मीडिया के पन्नों और परदों पर भी अपने पैर बेतरह पसार चुकी है।

विकास की परिभाषाओं को नए सिरे से गढ़ने वाली गडकरी की जिन बातों पर लोग आंख मूंद कर भरोसा करते थे, अब उन जुमलों के खोखलेपन की मिसालों से सूचना-जगत लबालब भरा हुआ है। सड़क मार्ग से दिल्ली से मुंबई 12 घंटे में, दिल्ली से देहरादून 2 घंटे में और पुणे से मुंबई डेढ़ घंटे में पहुंचा देने वाले एक्सप्रेस-वे बना देने के उन के दावे गड्ढों और भरभरा कर गिरते नए-नकौर पुलों के मलबे में दबे हाय-बाप कर रहे हैं। ऐसी तस्वीरों और वीडियो-रील की भरमार ने गडकरी को असरानी और कादर खान सरीखी शक़्ल दे दी है।

थोड़ा-बहुत जो बचा था, उसे दोनों बेटों निखिल और सारंग की इथेनाल-जुगलबंदी ने ठिकाने लगा दिया। उन का इथेनाॅल कारोबार दो-तीन साल में 17 करोड़ रुपए सालाना से बढ़ की 500 करोड़ रुपए सालाना हो गया। सरकार की नीतियों में बदलाव की वज़ह से बेटों की कंपनियां तीस गुना फूल गईं, मगर पिता का राजनीतिक रुतबा तीन सौ गुना लुढ़क गया। बेटों की कंपनियों के शेयर 40 रुपए से अस्सी गुना ऊपर उछल कर 3100 रुपए पर पहुंच गए, मगर बाप की विश्वसनीयता का पारा आठ सौ गुना नीचे आ गया।

बेटों की इथेनाल-गतिविधि पर हो रही प्रतिकूल टिप्पणियों को ले कर अभी एक दिन गडकरी ने पूरी ढीठता से कहा कि इथेनाल तो उन की सकल व्यापारिक आमदनी का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। बात उन की सही है। बेटों की कंपनियों का सालाना टर्न ओवर दो हज़ार करोड़ रुपए यानी बीस अरब रुपए के आसपास है और इथेनाल व्यवसाय का हिस्सा तो महज़ पांच अरब रुपए का है। यानी एक चैथाई। गडकरी का मतलब है कि इत्ती-सी बात पर इतना ज़्यादा हो-हल्ला ठीक नहीं है। मगर पूरा देश पूछ रहा है कि पेट्रोलियम मंत्री तो हरदीप सिंह पुरी हैं, गडकरी तो राजमार्ग-परिवहन मंत्री हैं, फिर पेट्रोल में इथेनाल के मिश्रण का प्रतिशत तय करने और इस जनविरोधी कदम का इतने आक्रामक तरीके से बचाव करने में उन की इतनी केंद्रीय भूमिका क्यों है? देशवासी हैरत में हैं कि इस सवाल का कोई जवाब पुरी, गडकरी या नरेंद्र भाई मोदी क्यों नहीं दे रहे हैं?

सोचने की बात यह है कि आज गडकरी के साथ, जो कुछ हो रहा है, क्यों हो रहा है? इस के बीज कम-से-कम 17 साल पुराने हैं। तब नरेंद्र भाई गुजरात के मुख्यमंत्री थे और गडकरी 2009 में भाजपा के अध्यक्ष बन गए थे। मोहन भागवत मार्च 2009 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख बने और उन्होंने नौ महीने के भीतर गडकरी को महाराष्ट्र के भाजपा-अध्यक्ष से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया था। गडकरी के अध्यक्षीय-काल में नरेंद्र भाई अपने को ख़ासा असहज महसूस करने लगे थे। 2012 आते-आते वे ख़ुद को 2014 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर पेश करने लगे थे। गडकरी भाजपा की भीतरी राजनीति में थे तो अटल बिहारी वाजपेयी गुरुकुल के छात्र, मगर लालकृश्ण आडवाणी से भी उन का सामंजस्य बहुत अच्छा था, सो, वे आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक प्रत्याशी मानते थे। नरेंद्र भाई थे तो आडवाणी के पटु-चेले, मगर जब बात महत्वाकांक्षा की हो तो कौन गुरु और कौन चेला?

2011 में उत्तर प्रदेश की विधानसभा के लिए चुनाव हुए तो गडकरी ने नरेंद्र भाई को यह कह कर वहां प्रचार के लिए न जाने का सुझाव दिया कि गुजरात के बाहर उन की सभाओें का उलटा असर पड़ता है। गडकरी ने नरेंद्र भाई के कट्टर विरोधी संजय जोशी को भी भाजपा में वापस लाने का फ़ैसला कर ही लिया था। इस तरह के प्रसंगों से गडकरी का कंटक दूर करना ज़रूरी लगने लगा था, सो, 2012 के मध्य में उन के पारिवारिक व्यावसायिक प्रतिष्ठान ‘पूर्ति समूह’ पर फ़र्ज़ी कंपनियों से निवेश लेने, बेनामी संपत्ति जमा करने और धन की हेराफेरी करने के आरोपों की बौछार होने लगी। आख़िरकार 2013 की शुरुआत में गडकरी को भाजपा-अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा और इस्तीफा देने के अगले ही दिन मुंबई और नागपुर में पूर्ति समूह की कंपनियों पर आयकर विभाग के छापे पड़े। गडकरी की जगह राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष बन गए। अगर गडकरी-उन्मूलन अभियान कामयाब न होता तो वे दिसंबर 2015 तक पार्टी-अध्यक्ष रहते। ज़ाहिर है कि अगर वे रहते तो नरेंद्र भाई का रायसीना पहाड़ी पहुंचना आसान नहीं होता।

राजनाथ के अध्यक्ष बनने के बाद जून 2013 में भाजपा-कार्यकारिणी की बैठक गोवा में हुई तो अरुण जेटली की बिछाई बिसात ने नरेंद्र भाई को 2014 के चुनावों के लिए प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित करवा दिया। आडवाणी इस से इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने भाजपा के संसदीय बोर्ड, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और चुनाव समिति से इस्तीफ़ा दे दिया। बाद में आरएसएस के कहने पर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया। अब नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री-चेहरा बनने से सिर्फ़ एक क़दम दूर थे और तीन महीने बाद सितंबर में हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में इस का औपचारिक ऐलान भी हो गया। कुपित आडवाणी संसदीय बोर्ड की बैठक में शिरकत करने नहीं गए।

2014 में गडकरी को मंत्री बनाना नरेंद्र भाई की इसलिए मजबूरी थी कि वे मोहन भागवत के सक्रिय समर्थन से प्रधानमंत्री बने थे और गडकरी को भागवत से अलग कर के देखना संभव ही नहीं था। हालांकि भागवत और नरेंद्र भाई के बीच तनाव बढ़ने लगा था, लेकिन 2019 में दोबारा सरकार बनने पर भी वे गडकरी की अनदेखी नहीं कर पाए। 2023 आते-आते रिश्ते बेहद तल्ख़ हो गए और प्रधानमंत्री और गडकरी के बीच मंत्रिमंडल की बैठकों में गर्मागर्मी होने तक की ख़बरें आने लगीं।

2024 का आम चुनाव आया तो भाजपा के उम्मीदवारों की पहली सूची से गडकरी का नाम गायब था। उस दौर में नरेंद्र भाई नागपुर गए तो विमानतल पर कतार में गडकरी उन की अगवानी के लिए खड़े थे, मगर प्रधानमंत्री ने सीधे मुंह उन से बात तक नहीं की। आरएसएस के गहन दबाव के बावजूद नरेंद्र भाई ने बहुत पदा-पदा कर गडकरी को एकदम अंतिम समय पर लोकसभा का उम्मीदवार बनाया। इसलिए समझ लीजिए कि गडकरी के किए-धरे का घड़ा आज इसलिए फूट रहा है कि संघ-प्रमुख के सिंहासन पर कब्जे का यह चरणबद्ध मल्लयुद्ध दरअसल भागवत और नरेंद्र भाई के बीच हो रहा है। इस धारावाहिक की कुछ कड़ियां आप देख चुके हैं। कुछ आगे देखेंगे।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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