पंकज दुबे
-
-
-
‘माइकल’: एक अधूरी जीवनी
पॉप-संस्कृति के इतिहास में माइकल जैक्सन सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक बहुत बड़ी घटना हैं, एक ऐसी रचना हैं जो संगीत, नृत्य, फैशन औ...
-
विज्ञान के पार की संवेदना है ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’
यहां फ़िल्म किसी आदर्श नायक की छवि नहीं गढ़ती, बल्कि एक साधारण इंसान को दिखाती...
-
देह, दोष और दृष्टि की राजनीति: ‘एक्यूज्ड’
आज के सिने–सोहबत में हम बात करेंगे हाल ही में आई फ़िल्म ‘एक्यूज्ड’ की, एक ऐसी फ़िल्म जो केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि दर...
-
चुप्पी की छटपटाहट: ‘बयान’
फ़िल्म का सबसे भयावह पहलू उसका ‘विलेन’ नहीं, बल्कि उसका पूरा ‘सिस्टम’ है, जिसमें पंथ, सत्ता और ...
-
जंग ख़त्म, संघर्ष बाक़ी: ‘सूबेदार’
यह फ़िल्म युद्धभूमि से लौटे एक सैनिक की कहानी है, जो अपने ही समाज में मौजूद अन...
-
जंग ख़त्म, संघर्ष बाक़ी: ‘सूबेदार’
यह फ़िल्म युद्धभूमि से लौटे एक सैनिक की कहानी है, जो अपने ही समाज में मौजूद अन...
-
‘जब खुली किताब’: रिश्तों के अनकहे पन्ने
पंकज कपूर का किरदार इस कहानी का भावनात्मक केंद्र है। उनका चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का है,
-
रोशनी की तलाश में भटकते ‘दो दीवाने शहर में’
आज के 'सिने-सोहबत' में जो फ़िल्म चर्चा का विषय है वो है ‘दो दीवाने शहर में’ जिसके निर्देशक हैं रवि उद्यावर और लिखा है अभ...
-
‘ओ’ रोमियो’: माफ़िया, मोहब्बत और मिज़ाज का शेक्सपीरियन संगम
सिने-सोहबत फ़िल्म पत्रकार-लेखक हुसैन ज़ैदी की किताब 'द माफ़ि...
-
धुंध, दोष और दर्द की पड़ताल: ‘कोहरा 2’
लेखक गुंजित चोपड़ा और डिग्गी सिसोदिया अपराध को सनसनी नहीं बनाते। वे उसे सामाजिक संरचना की उपज की तरह देखते हैं। ...
-
‘गांधी टॉक्स’: एक मौन क्रांति
"गांधी टॉक्स" दो समानांतर जीवन-रेखाओं पर चलती है। एक ओर है विजय सेतुपति का किरदार जो कि एक आम आ...
-
आत्मसंघर्ष का फ़साना: ‘तस्करी: द स्मगलर्स वेब’
‘तस्करी: द स्मगलर्स वेब’ सिर्फ एक क्लासिक क्राइम-थ्रिलर नहीं है। यह एक बौद्धिक और नैतिक जांच का मंच भी है जो यह बताती है...
-
समय संग बहती स्मृति ‘ट्रेन ड्रीम्स’
फ़िल्म बार-बार यह अहसास कराती है कि आधुनिकता का सपना किसी के लिए सपना होता है,