‘पूजा मेरी जान’: मर्दों को ‘ना’ सुनना कब आएगा?
‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अप...
‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अप...
सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले श...
कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ...
‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ देखकर आप यह कह सकते है कि वाह, क्या बिल...
‘टोनी’ आइकोनिक शेफ़ एंथनी बॉर्डेन की ही लिखी किताब ‘किचन कॉन्...
कुछ कहानियां हमें डराती नहीं हैं। वे हमें बेचैन करती हैं। डर कुछ देर का होता है। बेचैनी देर तक साथ चलती है। वह कहानी खत्...
आज के दौर में एक दिलचस्प बात और देखने को मिलती है। हम अक्सर कहते हैं कि दर्शक हमेशा कुछ नया चाहता है। लेकिन सच्च...
हिंदी सिनेमा में रिश्तों पर एक नई लहर आने की ज़रूरत है। ऐसी फ़िल्में जो उपदेश न दें,
जब ओटीटी पर अपराध आधारित कहानियां अक्सर हिंसा, अंधेरे और सनसनी का सहारा लेती ह...
फ़िल्म का शीर्षक भी अपने भीतर एक विचित्र बेचैनी समेटे हुए है। 'बेबी डू डाई डू
आलिया भट्ट इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनके भीतर का अभिनेता लगातार संघर्ष करता दिखाई देता है। उनका शरीर भले...
फ़िल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह लगातार हंसाने की कोशिश करती है, लेकिन अपने पात्रों को ज...
‘कॉकटेल 2’ सिर्फ प्रेम त्रिकोण की कहानी नहीं...
इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सीमाएं देशों को बांट सकती हैं,
यहां स्त्री-विमर्श है, लेकिन नारेबाज़ी नहीं। यहां सामाजिक टिप्पणी है