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कथित वैश्विक संवाद की आईआईसी अड्डेबाजी

आज आआईसी की ज़मीन की कीमत 30 अरब रुपए है। क़रीब चार हज़ार एसोसिएट सदस्यों में से कइयों को सदस्यता देने पर तरह-तरह के सवाल हैं और क़रीब डेढ़ हज़ार अल्पकालिक सदस्यों में से तो ज़्यादातर की प्रोफ़ाइल गहरे कुहासे से लिपटी हुई है। सदस्यता देने की चयन प्रक्रिया को ले कर पिछले वर्षों में गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।।।। आईआईसी के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी में 7 मुख्य सदस्य होते हैं। इन मे से 5 की नियुक्ति ज़िंदगी भर के लिए होती है। वे तभी हटते हैं, जब ख़ुद इस्तीफ़ा दे दें या उन का निधन हो जाए।

जिमखाना क्लब के बहाने – 4

मात्सुमोतो शिगेहारू जापानी पत्रकार और विचारक थे। टोक्यो विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका चले गए और वहां येल विश्वविद्यालय में इतिहास और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। 1930 के दशक में जापान और चीन के बीच तनाव चरम पर पहुंच रहा था। तब ‘रेंगो’ समाचार एजेंसी ने अपने संवाददाता के तौर पर उन्हें शंघाई भेजा। बाद में ‘रेंगो’ का नाम ‘डोमेई’ हो गया था। 1936 में चीन में हुए शीआन हादसे के दौरान राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई-शेक को हिरासत में लिए जाने की ख़बर सब से पहले मात्सुमोतो ने दी और वे दुनिया भर में मशहूर हो गए। बाद में वे ‘डोमेई’ के प्रधान संपादक बने।

दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के बाद जापानी समाज वैश्विक स्तर पर एकदम अलग-थलग पड़ गया था। उसे वैश्विक समुदाय से दोबारा जोड़ने और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ संबंधों को मजबूत करने की ज़रूरत तब बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही थी। मात्सुमोतो ने इस के लिए अमेरिका के जाॅन डी राॅकफेलर तृतीय के साथ मिल कर काम शुरू किया। रॉकफेलर के दादा दुनिया के सब से पहले अरबपति थे। वे स्टेंडर्ड आॅयल कंपनी के संस्थापक थे और सामाजिक-सांस्कृतिक कामों के लिए खुले दिल से दान दिया करते थे।

राकफेलर फाउंडेशन की मदद से मात्सुमोतो ने 1952 में टोक्यो के रोप्पोन्गी इलाके में इंटरनेशनल हाउस ऑफ जापान (आई-हाउस) की स्थापना की। मकसद था सांस्कृतिक आदान-प्रदान के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय समझ बढ़ाना। यह आई-हाउस ही दिल्ली में बने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) का प्रणेता है। रॉकफेलर अक्टूबर 1958 में भारत आए तो उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन से बातचीत में उन्होंने आई-हाउस का ज़िक्र किया। राधाकृष्णन को विचार आया कि ऐसा एक केंद्र भारत में भी विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से बात की। इस तरह वैश्विक शांति और संवाद को बढ़ावा देने के लिए आईआईसी की स्थापना हुई।

नेहरू जी चाहते थे कि इस केंद्र की इमारत दिल्ली के ऐसे हरे-भरे शांत और प्राकृतिक वातावरण में हो कि बौद्धिक चिंतन और रचनात्मक चर्चाओं के लिए अनुकूल माहौल मिले। उन्होंने लोधी गार्डन के पास पौने पांच एकड़ ज़मीन आईआईसी के निर्माण के लिए आरक्षित कर दी। 30 नवंबर को जापान के तत्कालीन क्राउन पिंस अकिहितो ने आधारशिला रखी और 1962 में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने आईआईसी के मुख्य परिसर का उद्घाटन किया।

सी। डी। देशमुख को इस अंतरराष्ट्रीय केंद्र का आजीवन अध्यक्ष बनाया गया। वे नेहरू जी के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहे थे। उस के पहले वे भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को ले कर उन के नेहरू से गंभीर मतभेद हो गए और उन्होंने 1956 में मंत्री पद छोड़ दिया था। मगर जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) बना तो नेहरू ने कहा कि उस के नेतृत्व के लिए देशमुख से बेहतर कोई और है ही नहीं। नेहरू ने देशमुख से अधिकारपूर्वक मुद्रा में इसरार किया और उन्हें यूजीसी का पहला अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

आईआईसी के लिए ज़मीन के आवंटित करने के अलावा सरकार ने कोई और आर्थिक मदद नहीं दी थी। तब इस भूमि का बाज़ार मूल्य अधिकतम तीन लाख रुपए रहा होगा। उस ज़माने में इस केंद्र के निर्माण में क़रीब 60 लाख रुपए का खर्च आया था। इस में से 40 लाख रुपए की अनुदान राशि रॉकफेलर फाउंडेशन ने दी थी और 11 लाख रुपए से कुछ ज़्यादा की रकम तक़रीबन तीन दर्जन भारतीय विश्वविद्यालयों ने दान की थी। देशमुख ने शुरू में देश भर के 32 विश्वविद्यालयों को आईआईसी के संस्थापक सदस्यों के तौर पर जोड़ा था।

तो इस तरह अस्तित्व में आया भारत अंतरराष्ट्रीय केंद्र आज पांच संरचनाओं वाला परिसर है। परिसर में उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी ब्लॉक हैं, कमलादेवी कांप्लेक्स है और एक एनेक्सी भवन है। कला, इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राजनीति पर दुर्लभ पुस्तकों वाली एक लाइब्रेरी है। 230 लोगों के बैठने की क्षमता वाला एक आॅडिटोरियम है। दो सम्मेलन कक्ष हैं और तीन सेमिनार हॉल हैं। कला दीर्घा है। दो लेक्चर रूम हैं। सदस्यों और उन के मेहमानों के ठहरने के लिए 91 कमरे हैं। इन में से 48 सिंगल रूम हैं और 46 डबल रूम। दो फैलो-फ्लेट्स भी हैं। दो भोजन कक्ष हैं, दो लाउंज हैं। दो बार हैं। एक इनहाउस बेकरी भी है। फाउंटेन लॉन है। रोज़ गार्डन है।

देश और दुनिया के क़रीब 8 हज़ार लोग आईआईसी के सदस्य हैं। 2,082 व्यक्तिगत सदस्य ऐसे हैं, जिन्हें प्रशासनिक मामलों में मतदान करने का अधिकार है। 3,965 एसोसिएट सदस्य हैं, जो सेंटर की सुविधाओं का इस्तेमाल तो कर सकते हैं, मगर उन्हें मताधिकार प्राप्त नहीं है। 1,419 अल्पकालिक सदस्य हैं, जिन्हें सिर्फ़ तीन साल के लिए सदस्यता दी जाती है। 524 विदेशी नागरिक और अप्रवासी भारतीय भी आईआईसी के सदस्य हैं। 116 आजीवन सदस्य हैं। देश-विदेश के 9 व्यक्तियों को मानद सदस्यता दी गई है।

इस के अलावा संस्थागत सदस्यता भी प्रदान की गई है। 168 राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं, अनुसंधान केंद्र और बड़े ग़ैर-सरकारी संस्थान आईआईसी के संस्थागत सदस्य हैं। 161 अन्य काॅर्पोरेट और सांस्कृतिक निकाय भी सदस्य हैं। देश के वे 33 प्रमुख विश्वविद्यालय भी सदस्य हैं, जो शुरू से ही आईआईसी से जुड़े हुए हैं। 25 सहयोगी विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के पास भी संस्थागत सदस्यता है। भारत से बाहर के 7 चुनिंदा विदेशी संस्थान और संगठन भी सदस्य हैं।

इतना सब-कुछ हो तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आज आईआईसी अपने उस पावन लक्ष्य को सचमुच पूरा कर पा रहा है, जिसे ले कर उस की स्थापना की गई थी? आज आआईसी की ज़मीन की कीमत 30 अरब रुपए है। क़रीब चार हज़ार एसोसिएट सदस्यों में से कइयों को सदस्यता देने पर तरह-तरह के सवाल हैं और क़रीब डेढ़ हज़ार अल्पकालिक सदस्यों में से तो ज़्यादातर की प्रोफ़ाइल गहरे कुहासे से लिपटी हुई है। सदस्यता देने की चयन प्रक्रिया को ले कर पिछले वर्षों में गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। अल्पकालिक सदस्य बनने के लिए दसियों हज़ार सशुल्क आवेदन पत्र जारी कर देने और उन में सौ-सवा-सौ का ही चयन होने को ले कर भी हर बार होहल्ला होता है।

आईआईसी के इतिहास में सदस्यता को ले कर अब तक का सब से बड़ा हंगामा अब से दो दशक पहले 2006 में हुआ था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार केंद्र में थी। लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे। उन की पार्टी यूपीए का बेहद अहम घटक थी। लालू ने आईआईसी की सदस्यता के लिए आवेदन किया। बहुआयामी दिग्गज हस्ती डॉ। कर्ण सिंह सदस्यता प्रदान करने वाली समिति के सदस्य थे। वे आईआईसी के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उन्होंने लालू को सदस्यता देने की पुरज़ोर अनुशंसा की। मगर लालू को इस आधार पर सदस्यता नहीं दी गई कि भारत अंतरराष्ट्रीय केंद्र विशिष्ट बुद्धिजीवियों, लेखकों, राजनयिकों और प्रशासनिक सेवाओं में ख़ास अनुभव रखने वालों के लिए है। इस निर्णय के विरोध में कर्ण सिंह ने सदस्यता समिति से इस्तीफ़ा दे दिया था।

एक मज़े की बात। आईआईसी के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी में 7 मुख्य सदस्य होते हैं। इन मे से 5 की नियुक्ति ज़िंदगी भर के लिए होती है। वे तभी हटते हैं, जब ख़ुद इस्तीफ़ा दे दें या उन का निधन हो जाए। पद खाली होने पर बाकी बचे ट्रस्टी आपसी सहमति से किसी को नया लाइफ़ ट्रस्टी नियुक्त कर देते हैं। ट्रस्ट के बाकी दो सदस्यों का चुनाव मताधिकार प्राप्त सदस्य करते हैं। उन का कार्यकाल दो साल के लिए होता है। इस वंशवादी परंपरा को ले कर इसलिए काफी कुनमुनाहट बनी रहती है कि आजीवन सदस्यों का बहुमत हमेशा बना रहता है और सारे फ़ैसले तो बहुमत से ही होते हैं।

बैंकों में अपने एक अरब रुपए से ज़्यादा के फिक्स्ड डिपॉजिट वाले आईआईसी का संचालन दिल्ली जिमखाना और दिल्ली गोल्फ क्लब की तरह भले ही गहरे विवादों का विषय अभी नहीं है, मगर उसे समय रहते अपनी समूची संचालन प्रणाली को चुस्त और पारदर्शी बनाने की ज़रूरत तो नज़र आने लगी है। बाकी राम भली करें!

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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