बेचारे हिन्दू दोहरी चोट झेल रहे हैं — संघ-परिवार का विश्वासघात और ब्लैकमेलिंग। क्या इस से आगे कोई फर्क पड़ेगा? नहीं, राजा बाबू ने सब प्रबंध कर लिया है। कहीं कोई छिद्र नहीं छोड़ा। चाहे संवैधानिक संस्थाओं, रेफरियों पर धब्बा लगता रहे। लिहाजा चुनावी फुटबॉल का नेशनल कप वही जीतते रहेंगे। बाकी इंडिया बस वाचता रहेगा! यह सब समाज को खोखला करते जाने की कीमत पर। बस कप हाथ में रहे, चाहे वास्तविक खेल केवल कागजी हो जाए।
एक अर्थ में यह संघ-परिवार का ही तर्क है। तेईस साल पहले, 2003 में इसे ‘टीना’ (TINA) कहा गया था — देयर इज नो अल्टरनेटिव — यानी, भाजपा का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए, ऐ देशवासियो, भाजपा को समर्थन दो! क्योंकि और किसे दोगे? कांग्रेस नेता को तो बोलना भी नहीं आता, कागज देख-देख पढ़ती है। बल्कि, जब तक यह बेचारी कांग्रेस की नेता है — तब तक भाजपा को चिन्ता की भी जरूरत नहीं! कौन ‘इंडिया शाइनिंग’ कर देने वाली भाजपा के बदले उस अटपटी कांग्रेस नेता को समर्थन देगा!
उक्त दलील 2004 के आरंभ तक इतनी दुहराई जाती रही थी, कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उस वर्ष चुनाव से पहले कहा “चुनाव में क्या होना है; कोई कांप्टीशन ही नहीं है!”
तब से भाजपा नेता काफी बदल गये हैं। कुछ मामलों में अधिक होशियार, कुछ मामलों में और माशाअल्लाह। अगला चुनाव जीतने वाली सब तकनीकी कमियाँ इन्होंने दूर कर ली हैं, जिन पर किसी का ध्यान भी नहीं गया था। जिस में मुख्य यह कि मैच जीतने का सब से सुरक्षित तरीका है कि सामने कोई टीम ही न हो। यानी, सामने टीम न बनने दो! प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों में किसी को लुभा कर, किसी को डरा कर, किसी को फँसा कर, उस टीम से दूर रखो जो चुनौती दे सकती हो। अपनी टीम में भी कैप्टन बनने योग्य खिलाड़ियों को बाहर कर दो। बस, घुमा-फिरा कर वह वातावरण बनाना: जिसे ‘टीना’ कह लीजिए — कि भई और है कौन जिसे समर्थन दोगे!
दूसरी ओर, माशाअल्लाह यह कि दस वर्ष पहले संघ-भाजपाइयों द्वारा जो ऊँची-ऊँची उपलब्धि की बात कही जाती थी, अब उन में किसी का नाम तक नहीं लिया जाता। भ्रष्टाचार-मुक्ति, स्वदेशी आर्थिकी, दुनिया में प्रभाव, चीन को झुकाना, और — एक आकस्मिक नया लक्ष्य: ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ और ‘माँ-बेटे को जेल पहुँचाना’ — यह सब अब भक्त भी नहीं दुहराते।
पूरे देश ने देखा कि चीन कहाँ है, और अपने राम क्या हैं। बगल बंगलादेश में हिन्दुओं का कत्ल, अपमान, मंदिर-ध्वंस होता रहा है — और अपने राजा के मुँह से एक शब्द तक नहीं निकला। जबकि कांग्रेस राज में बंगलादेश के हिन्दुओं के लिए संघ-परिवार यहाँ सरकार से दर्जन भर माँगे करता था। उस में संयुक्त राष्ट्र में मुद्दा उठाना भी था!
यह उदाहरण है कि सारी बातें हवाबाजी थी। इसीलिए उन के कार्यकर्ता भी अब चुप हैं। सब जान चुके कि इन तिलों में तेल नहीं। कुछ विषयों में स्थिति पहले से बदतर हुई है। शिक्षा क्षेत्र इस का खुला उदाहरण है। विशिष्ट संस्थानों की स्वायत्तता भी छिन गई है। विद्या, विद्यार्थी, अध्यापक, स्नातक, सर्टिफिकेट या अवार्ड की गुणवत्ता का जिम्मेदार कोई नहीं है। महत्वपूर्ण अकादमियों में भी विद्वानों के स्थान पर मुंशी बिठा दिये गये हैं। ताकि अपनी टीम की जयकार करने, जुमले दोहराने वालों की संख्या बढ़े। बस। शिक्षा का जो हो, कुर्सी अपने हाथ रहे। यह फाउल खेलने जैसा है। पर उस से क्या, कैसे भी केवल चुनावी कप जीतते रहना है!
यह दूरघातक स्थिति है, जो अनेक संघ-भाजपाई भी मानते हैं। पर कहते हैं: क्या करें? यह मानसिक बदहाली इतनी व्यापक है कि किसी नीति, घोषणा, चुप्पी, बेढब स्थिति, आदि की आलोचना पर केवल यही कहते हैं: ‘भाजपा के हारने से आप को क्या मिलेगा?’ चाहे अगले चुनाव में चार साल बाकी हो — पर उन के पास चुनाव छोड़ कोई विचार नहीं रह गया है। बारहों महीने उन्हें यही चिन्ता है। सो, अकेला लेखक भी यदि आलोचना करे तो वह चुनाव में हराने के लिए कर रहा है! अन्य कारण हो नहीं सकता।
किसी को नीति सुधार या नेतृत्व परिवर्तन जैसी कोई बात नहीं सूझती कि वह भी विचारणीय हो सकती है। जबकि वह लोकतंत्र में सब से सहज विचार है। ब्रिटेन में 2016 से 2022 के छः वर्षों में एक ही सत्ताधारी दल के चार प्रधानमंत्रियों ने स्वेच्छा से पद छोड़ दिया, सिर्फ यह देखकर कि उन की कोई नीति विफल रही या उन की लोकप्रियता कम हो गई। उन्हें पद छोड़ने की विवशता न थी! किन्तु उन्होंने अपने दल के अन्य नेता के लिए स्वयं स्थान छोड़ दिया। यह सच्ची समानता, साथीपन की भावना है। दलीय और राष्ट्रीय हित का सामंजस्य भी।
भारत में वह अकल्पनीय है! यहाँ शासक दूसरों को अपने से नीचा समझता है। आजीवन पद पर रहना अपना प्रथम अधिकार मानता है। चाहे देश का कुछ भी मत या हाल हो। यह दलीय ढाँचा भी मात्र दिखावा होने का संकेत है। मुख्य बात केवल जैसे-तैसे गद्दी पर रहने, या गद्दी लेने की है। देश की चिन्ता कहीं पीछे या बिलकुल नहीं।
एक अर्थ में भयावह हाल है कि नेताओं के पास अपने किसी काम, निकम्मेपन, मनमानी, संसाधनों की बर्बादी, नीतिगत पलटी मारने, और चुप्पी के लिए दिखावटी दलील भी न हो! जिस का जगजाहिर सबूत वर्तमान शासकों द्वारा मीडिया का सामना न करना है। न अपने दल में किसी मतभेद स्वर का। ऐसे दलीय सहकर्मी भी किनारे कर दिये गये हैं।
इस असाधारण दुर्बलता को छिपाने के लिए वे अनर्गल भाषणों का रेला देते रहते हैं, जहाँ कोई प्रश्नकर्ता न हो। केवल एकतरफा घटाटोप शब्दवर्षा। ताकि छिप जाए कि उन के पास अपने चित्र-विचित्र कर्मों-अकर्मों के बचाव में कहने को कुछ नहीं। सो, जुमले, तमाशे, दूसरों को अपशब्द, और दिवंगत नेताओं को कोसने से लोगों को उलझाए रख कर अपने को जमाने का उपाय किया गया है।
ऐसी प्रवृत्ति की निरंतरता राष्ट्रीय खालीपन है। जिसे भाजपा-भक्त ‘टीना’ में बदल लेते हैं: कि विकल्प क्या है! उन के बौद्धिक भी आलोचनाओं का उत्तर मनगढ़ंत दलीलों से देते हैं। जब ऐसी दलीलें कट जाती हैं तो अंत में उन का ब्रह्मास्त्र है, विशेषतः हिन्दू आलोचक को — ‘भाजपा के हारने से क्या मिलेगा?’
यह एक तरह की ब्लैकमेलिंग है, कि भाजपा के हारते ही वामपंथी, इस्लामी लोग सत्ता में जुड़ेंगे! ऐसे ब्लैकमेलर समर्थकों को परवाह नहीं कि पिछले दस, बीस, तीस सालों में भाजपा की किसी सत्ता ने एक भी ऐसी हिन्दू विरोधी, वामपंथी, या इस्लाम-परस्त नीति को खत्म नहीं किया। उन में ऐसी नीतियाँ भी हैं जिसे मामूली संसदीय प्रस्ताव पास कर हटाया जा सकता है। जैसे, ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून में हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव, जो गैर-हिन्दुओं को विशेष सुविधाएं देकर किया गया है। यही भेदभाव मंदिरों के संचालन पर राजकीय कब्जे से भी जारी है, जिस से मस्जिदें, चर्च मुक्त हैं। यह हिन्दुओं पर परोक्ष जजिया है जो भाजपा-राज में और बढ़ा। गैर-हिन्दुओं के लिए विशेष कोचिंग, अनुदान, संस्थान, आदि देकर।
जबकि इसी भेदभाव की निन्दा कर संघ-परिवार ने अपनी जमीन फैलाई थी। कितना बड़ा विश्वासघात कि सत्ता पा कर उन के शासकों ने वैसी किसी नीति को नहीं छुआ! बदले में झुनझुने, तमाशे, और नयी-नयी हाँक कर हिन्दू समर्थकों को बरगलाते रहे हैं। इतने विश्वास से कि लगे ही नहीं कि चुनाव जीतने के सिवा उन्हें कोई विशेष काम है। इसीलिए भाजपा शासकों के सभी भाषण पार्टी-भाषण होते हैं, राष्ट्रीय नहीं। फलत: उन के अनुयायी भी किसी न किसी को बुरा भला कहते रहते हैं। यही उन का ‘विमर्श’ है।
अर्थात् वे मतिशून्य से हो चुके हैं। पार्टीबंदी की सनक ने उन से देश, समाज, और नीति का बोध छीन लिया है। वे अन्य दलों से घृणा करते हैं, मानो देश में उन का स्थान न हो! करोड़ो नागरिक गैर-भाजपा दलों को वोट देते हैं। इसे पक्के संघ-समर्थक बुराई समझते हैं। मानो, भाजपा नेता कुछ भी करें, सत्ता में इन्हीं को रहना चाहिए। यह ‘राष्ट्रवाद’ नहीं, स्वार्थवाद है।
ऐसी मानसिकता में किसी नीति की बात निरर्थक हो जाती है। इसीलिए संघ-परिवार के वैचारिक सहयोगियों की स्थिति बेकार फर्नीचर जैसी है, जिन की अब उपयोगिता नहीं। नीतिगत मुद्दे, नैतिक दावे, आदि पुराने कपड़ों की तरह छोड़े जा चुके हैं। उन्हें जुमलों और नारों ने विस्थापित कर दिया है। छल-बलपूर्वक केवल एक मुद्दा जमा दिया गया है — सत्ता में कौन रहे? बाकी सभी बातें अप्रासंगिक बना दी गई हैं।
भाजपा के हटने पर इस्लामियों, वामपंथियों का हौआ दिखाया जाता है। जो वास्तविक भी है। किसी अन्य दल की सत्ता में उन्हें निश्चय ही स्थान मिलेगा, और वे अपने मुद्दों के प्रति विश्वासघात नहीं करते! इस अर्थ में, हिन्दू चेतना वाले वोटरों के लिए सचमुच आगे कुँआ, पीछे खाई है।
सो, बेचारे हिन्दू दोहरी चोट झेल रहे हैं — संघ-परिवार का विश्वासघात और ब्लैकमेलिंग। क्या इस से आगे कोई फर्क पड़ेगा? नहीं, राजा बाबू ने सब प्रबंध कर लिया है। कहीं कोई छिद्र नहीं छोड़ा। चाहे संवैधानिक संस्थाओं, रेफरियों पर धब्बा लगता रहे। लिहाजा चुनावी फुटबॉल का नेशनल कप वही जीतते रहेंगे। बाकी इंडिया बस वाचता रहेगा!
यह सब होशियारी जरूर है, किन्तु समाज को खोखला करते जाने की कीमत पर। बस कप हाथ में रहे, चाहे वास्तविक खेल केवल कागजी हो जाए।
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