संघ परिवार:  मुस्लिम वोट-लालसा का शिकार

यह छिपा हुआ सच है कि संघ परिवार के नेता मुस्लिम वोट-बैंक की लालसा के लंबे समय से शिकार हैं। पर चूँकि वे स्वयं और उन के शत्रु, दोनों उन्हें हिन्दुत्ववादी कहते हैं, इसलिए यह छिपा रहता है।

संघ परिवार:  इस्लाम व मुस्लिमों पर विचार

संघ प्रवक्ताओं के अनुसार, मुख्य समस्या व्यवहारिक है। जिहाद का इतिहास भी कोई मुद्दा नहीं है। इसलिए, मुसलमानों को यह संदेश दें कि उन्हें बाबर और औरंगजेब की विरासत से बचना चाहिए, और राष्ट्रवादी विरासत में आना चाहिए। यही समाधान है। इस्लामी मतवाद कोई समस्या है ही नहीं।

संघ परिवार: यह कम्युनिस्ट मानसिकता नहीं तो क्या?

संघ परिवार Sangh Parivar : सभी विशेषताएं कम्युनिस्ट वैचारिकता में रही हैं। यह न हिन्दू चरित्र है, न यूरोपीय लोकतांत्रिक। अतः संघ-परिवार अपने ही विचारहीन दुष्चक्र में फँसा है। उस के विवेकशील नेताओं को यह परखना चाहिए। वरना सदैव ‘व्यवहारिकता’ के लोभ में वे सर्वस्व गँवा सकते हैं। जो रूसी कम्युनिस्टों का हुआ।  यह भी पढ़ें: संघ परिवार: संगठन या सराय? संघ-परिवार Sangh Parivar में ‘संघ-आयु’ मुहावरा चलता है। कि कोई कितने सालों से संघ में है? ऐसी भावना के विचित्र रूप भी दिखते हैं। पर बहुतेरे भले स्वयंसेवकों के लिए संघ ही सर्वस्व है। वे केवल ‘संघ’ पर सुखी-दुःखी होते हैं। देश, समाज के गंभीरतम विषयों पर भी उदासीन। इन विषयों में बड़े योगदान या हानि करने वाली कई ‘बाहरी’ हस्तियों के नाम भी अधिकांश स्वयंसेवक नहीं जानते। मानो देश या संघ का भवितव्य भी उस से स्वतंत्र है। 1. इस तरह, संगठन-पार्टी को मूल समझना कॉमरेड लेनिन का विचार था। उन्हीं से दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में पहुँचा। जबकि पश्चिमी लोकतंत्रों में पार्टी समाज के एक मामूली अंग जैसी सीमित है। पार्टी नेताओं से बहुत अधिक महत्व उद्योग, साहित्य, कला, आदि के लोगों का है। वहाँ राजनीतिक दलों के लोग भी विविध सेवाओं के कर्मचारियों जैसे ही काम… Continue reading संघ परिवार: यह कम्युनिस्ट मानसिकता नहीं तो क्या?

संघ परिवार:  संगठन या सराय?

तो यह संगठन किस का है, जिसे हिन्दू समाज पर पड़ती चोटों से तिलमिलाहट नहीं होती? उत्तर है – केवल अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं का, बस अपना हितचिंतक। तुलना करें:  चर्च, इस्लामी हितों को छूते ही देश में छोटे-बड़े क्रिश्चियन/मुस्लिम नेता फौरन, सड़क से संसद, हर जगह चीखते-चिल्लाते सिर पटकते हैं। बेपरवाह कि उन के पास क्या संगठन, कितने सांसद, विधायक हैं या नहीं हैं। वे सीधे अपने को झोंकते हैं। संघ परिवार का सारा जोर ‘संगठन’ पर है। शाखा, प्रकल्प, सम्मेलन, संस्थान, भवन, आदि। किन्तु इन के कामों में कोई एकता या संगति शायद ही होती है। एक उदाहरण उन के नेताओं में परस्पर अविश्वास-ईर्ष्या-द्वेष भी है। मानो वे किसी सराय में हों। जहाँ अलग-अलग लोग अपने-अपने अच्छे, बुरे, अनर्गल काम करते रहें। संघ को ‘परिवार’ कहना भी वही है। आखिर मोहनदास, देवदास, हरिलाल, तीन तरह के चरित्र एक ही परिवार के थे। इसे भी पढ़ें : संघ-परिवार: बड़ी देह, छोटी बुद्धि फिर, संघ ‘हिन्दू’ संगठन होने से इंकार करता है। अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हुए मुसलमानों का भी नेता होने का मंसूबा पालता है। जो गाँधीजी ने किया था और हिन्दुओं को अपनी जेब में समझा था, कि ये कहाँ जाएंगे! इस प्रकार, हिन्दू समाज बिलकुल नेतृत्व-हीन है। इसीलिए हर… Continue reading संघ परिवार: संगठन या सराय?

संघ-परिवार: बड़ी देह, छोटी बुद्धि

संघ के सदाशयी लोगों को समझना होगा कि हिन्दू समाज और सच्ची चेतना मूल शक्ति है। कोई संघ/दल नहीं। चेतना ही संगठन का उपयोग करती है। इस का उलटा असंभव है। घोड़े को गाड़ी के पीछे लगाने से गंतव्य तक पहुँचना असंभव है। यह भी पढ़ें: संघ-परिवार: एकता का झूठा दंभ बंगाल की घटनाओं ने फिर दिखाया कि बड़ी कुर्सी पर बैठ जाना बल का पर्याय नहीं होता। राष्ट्रीय या राजनीतिक, दोनों सदंर्भों में बल का पैमाना भिन्न होता है। जिस में संघ-परिवार सदैव दुर्बल रहा है। तुलना में वामपंथी अधिक आत्मविश्वासी रहे हैं। संघ-भाजपा कुर्सीधारी भी उन से बचते हैं। फिर भी यदि यहाँ इन की दुर्गति नहीं हुई, तो कारण अभी भी बचा पारंपरिक हिन्दू समाज है। वह बीच में अवरोध बन कर संघ-भाजपा कुर्सीधारियों को बचाता है। पर कब तक? जिस तरह संघ-परिवार ने हिन्दू समाज को भ्रमित, विश्वासघात भी किया, तथा केवल अपनी परवाह की, जबकि सभी हिन्दू-विरोधी शत्रु निरंतर चोट कर रहे हैं; उस से यह समाज स्वयं क्षीण हो रहा है। सही दृष्टि के बिना कुर्सी से कुछ नहीं होता।  जैसे, हथियार चलाना न जानने वाले को हथियार देना व्यर्थ है! उस के भरोसे रक्षा की आस करने वाला मारा जाता है। अभी बंगाल… Continue reading संघ-परिवार: बड़ी देह, छोटी बुद्धि

संघ परिवार और राम स्वरूप

कहावत है कि लेखक के देहांत बाद भी उस की पुस्तक पढ़ी जाए, तभी उसे मूल्यवान समझना चाहिए। राम स्वरूप व सीताराम गोयल को गए एक पीढ़ी हो चुकी। पर उन की लगभग दो दर्जन पुस्तकें आज भी यथावत् महत्वपूर्ण हैं। कुछ तो अपने विषय की अकेली हैं। सोशल मीडिया पर हिन्दू विमर्श में राम स्वरूप और सीताराम गोयल के नाम प्रायः उभरते रहते हैं। वे दोनों ही स्वामी दयानन्द, बंकिमचन्द्र, विवेकानन्द और श्रीअरविन्द की परंपरा से जुड़ते हैं। जिन्होंने अपने युग में सनातन धर्मी या हिन्दू चिंतन और कर्तव्य का निरूपण किया। स्वयं करके भी दिखाया। वही भूमिका स्वतंत्र भारत में राम स्वरूप (1920-1998) और सीताराम गोयल (1921-2003) ने सब से अधिक निभाई। यह भी पढ़ें: संघ-परिवार का उतरता रंग इसीलिए, आज देश-विदेश के लगभग सभी विवेकशील हिन्दू उन्हें याद करते रहते हैं। ये प्रायः अलग-अलग, अदद लोग हैं। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले। किन्तु भारत में हिन्दू धर्म-समाज पर हो रही चोटों और बढ़ते खतरों की समझ जिसे भी है, वह देर-सवेर राम स्वरूप और सीताराम गोयल तक पहुँच जाता है। क्योंकि इस्लामी एवं चर्च साम्राज्यवाद के क्रिया-कलाप, इतिहास विकृत करने वाला मार्क्सवादी दुष्प्रचार, और सेक्यूलरवाद की आड़ में हो रहे हिन्दू-विरोधी कामों, विचारों का ऐसा मौलिक,… Continue reading संघ परिवार और राम स्वरूप

संघ-परिवार का उतरता रंग

इन दिनों संघ-परिवार पर हैरत बढ़ गई है। विशेषकर, शाहीनबाग पर सड़क कब्जा, जामिया-मिलिया से लेकर कई जगहों पर दिल्ली पुलिस पर हमले, लाल किला पर देश-विरोधी उपद्रव, और अब बंगाल में भाजपा समर्थकों का चुन-चुन कर मारा जाना, उन से लाखों रूपए की ‘जजिया’ वसूली, कुछ इलाकों को हिन्दुओं से खाली करा लेने, आदि पर संघ-भाजपा की निष्क्रियता ने सब को चकित कर दिया है। हालाँकि, यह सब पहली बार नहीं हो रहा। हिन्दू समाज की अनदेखी, बढ़-चढ़कर मुस्लिम-तुष्टीकरण, और चर्च-तुष्टिकरण के लिए वाजपेई सरकार की भी खिंचाई हुई थी। हज सबसिडी की रकम स्वतः बढ़ाने, और ‘दो करोड़ उर्दू शिक्षकों’ को नौकरी देने, आदि बयानों के बाद वाजपेई को ‘हाजपेई’ कहा गया था। परन्तु इस बार स्वयं रा.स्व.संघ के लोग भी सत्ता भोग रहे हैं। प्रधानमंत्री वाजपेई ने इन्हें सत्ता से दूर ही नहीं रखा, बल्कि उन की पूरी अनदेखी की थी। स्वयं संघ-प्रमुख कुप्प सुदर्शन ने शेखर गुप्ता के साथ टीवी इंटरव्यू में वाजपेई-अडवाणी की कड़ी आलोचना की थी। उस का पूरा पाठ इंटरनेट पर उपलब्ध है, जिसे पढ़ना चाहिए। दूसरा फर्क कि स्थिति और गंभीर हो चुकी है। पर संघ-भाजपा नेतृत्व नीरो की तरह वंशी बजाते हुए सब को उपदेश दे रहे हैं। मानो उपदेश देने… Continue reading संघ-परिवार का उतरता रंग

संघ पीपीई किट और अन्य सुरक्षा उपकरण बांटने में जुटी

संघ परिवार देश भर में जरूरतमंदों तक भोजन और राहत सामग्री पहुंचा रही है। इसके साथ ही अब संघ ने देश की किल्लत वाले अस्पतालों में पीपीई किट, मॉस्क और सैनिटाइजर भेजना भी शुरू कर दिया है।

तथ्यों पर आस्था की जीत : ओवैसी

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि अयोध्या मामले में उच्च्चतम न्यायालय के फैसले से यह साफ हो गया है कि इसमें तथ्यों पर आस्था की जीत हुई है।

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