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निर्भीक लज्जाहीनता की भट्टी से निकले तपस्वी

इस दौर के सियासतदां निर्भीक लज्जाहीनता की भट्टी से तप कर निकले हैं। उन्हें शाश्वत ढीठता की घुट्टियां पिला-पिला कर पाला-पोसा गया है। उन के मार्गदर्शक चूं-चूं का मुरब्बा नहीं हैं।… ये लोग मर्यादाओं से हट कर ही चलेंगे। इसलिए वे अपना कर्तव्यपालन कर रहे हैं। उन की गुरु-दक्षिणा के गर्व से फूल कर गुरुजन की छाती छप्पन से एक सौ बारह इंच की हो रही है। सो, आप बुक्का फाड़ कर रोते रहिए। आप जितना रोएंगे, हमारे सत्तासीन उतना ही हंसेंगे।

वैसे तो भारत की राजनीति में कोतवालों के चोरों से डांट खाने के सघन दृश्य चैबीस साल पहले ही खुल कर दिखाई देने शुरू हो गए थे, मगर पिछले बारह बरस ने हमारे देश की सियासत में ढीठता का जैसा गाढ़ा कीचड़ घोला है, उसे अब कोई चाह कर भी शायद ही कभी साफ कर पाएगा। अपनों के सौ ख़ून माफ़ करने का इतना उद्दंड और बेहया दौर तक़रीबन ढाई हज़ार साल पुरानी हमारी प्रजातांत्रिक परंपरा में पहले कभी नहीं दिखा गया। दुर्दांत सामंतशाहियों में भी लोकलाज का न्यूनतम पालन तो किया ही जाता था। भारत में राजकाज सामूहिक निर्णय लेने की अवधारणा पर ही हमेशा आधारित रहा। ऋग्वेद और अथर्ववेद तक में सभा और समिति जैसी संस्थाओं का ज़िक्र है, जो शासन व्यवस्था की प्रारंभिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का रूप थीं।

महाजनपद काल में भी शासन के फ़ैसले जनसभाओं की राय पर आधारित हुआ करते थे। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भारत में 16 महाजनपद थे और उन में से ज़्यादातर राजतंत्र नहीं थे, गणराज्य थे। वैशाली, लिच्छवी, मौर्य और शाक्य जैसे गणराज्यों के जनतांत्रिक अंकुर ही हमारा बीजमंत्र रहे हैं। सिर्फ़ औरंगज़ेब, अलाउद्दीन खिलजी, तैमूर लंग और अंग्रेज़ों के शासनकाल में ही ऐसी मिसालें देखने को मिलीं कि सुल्तान का कहा ही क़ानून होता था, राजकाज की नीतियां बनाने और टैक्स वग़ैरह तय करने में जनता की भागीदारी एकदम शून्य हुआ करती थी, नागरिकों को समानता प्राप्त नहीं थी और धार्मिक और सामाजिक भेदभाव शासकीय नीतियों का हिस्सा थे।

इन सभी शासन व्यवस्थाओं का मूल आधार भय, सैन्य शक्ति यानी पुलिस-राज और एकाधिकारवादी पूर्ण नियंत्रण हुआ करता था। वैयक्तिक स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और निर्वाचन प्रणाली में हुक़्मरानों की रत्ती भर भी आस्था नहीं थी। तरह-तरह के कर लगा कर जनता की कमाई की आख़िरी बूंद तक को निचोड़ लेने की प्रवृत्ति राजकोष के विस्तार का मूलाधार थी। मुझे तो नहीं लगता, लेकिन अगर आप को आज के राजसत्ता-क्षितिज और खिलजी-तैमूर दौर में साम्य सरीखा कुछ लगता हो तो आप जानें और आप का काम जाने।

पिछले एक-डेढ़ दशक से हमारा समाज लगातार आर्तनादी होता जा रहा है। हर बात पर रोना ही उस का काम रह गया है। हाय-हाय नोटबंदी क्यों कर दी? हाय-हाय कोरोना काल में इतनी बदइंतज़ामी क्यों हुई? हाय-हाय धारा 370 क्यों हटा दी? हाय-हाय पुलवामा और पहलगाम कैसे हो गए? हाय-हाय मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण क्यों कर रहे हो? हाय-हाय निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्सीमन क्यों हो रहा है? हाय-हाय ‘एक देश-एक चुनाव’ की क्या ज़रूरत है? हाय-हाय ईरान पर ख़ामोश क्यों रहे? हाय-हाय पैट्रोल में एथेनाॅल क्यों मिला रहे हो? हाय-हाय भारत-पाक युद्ध रुकवाने का एक सौ बीस बार श्रेय लेने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने घुटने क्यों टेक दिए? मुंहतोड़ जवाब क्यों नहीं दिया? घिघियाते क्यों रहे? हाय-हाय प्रधानमंत्री जी के विदेश दौरों पर खर्च हुए अरबों रुपए का हमें फ़ायदा क्या मिला? हाय-हाय प्रधानमंत्री संवाददाता सम्मेलन क्यों नहीं करते हैं। हाय-हाय प्रधानमंत्री मैलोनी के लिए मैलोडी ले कर क्यों चले गए? हाय-हाय देश की सरकारी संपत्ति एक चेहेते धन्नासेठ को क्यों दी जा रही है? हाय-हाय इम्तहान के पर्चे लीक कैसे हो गए? हाय-हाय रामलला का दान कोई कैसे खा गया? हाय-हाय एक मुख्यमंत्री और उस के नाते-रिश्तेदारों ने इतनी ज़मीनें कैसे खरीद लीं? हाय-हाय आप ने ऐसा कैसे कह दिया कि पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है? हर वक़्त बस हाय-हाय हाय-हाय।

बात-बात पर रोने वाले देशवासियों के देश का कोई प्रधानमंत्री करे भी तो क्या करे? चैबीस घंटे में चैबीस सौ बार अपनों से अपने को यशस्वी घोषित करा-करा कर भी आख़िर वह कैसे यश का भागी बने? भले ही निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर हमारे नरेंद्र भाई मोदी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी ज़्यादा समय शासन कर लिया है, मगर ऐसे रोतले मुल्क़ को वे भी विश्वगुरु बनाएं तो बनाएं कैसे? एक तो वैसे ही नेहरू इतना सत्यानाश कर गए हैं कि उन के खोदे गड्ढे भर-भर के नरेंद्र भाई हांफ रहे हैं, ऊपर से देश के 63.44 फ़ीसदी लोगों के भीतर कहीं-न-कहीं ऐसा छोटा-बड़ा नेहरू मौजूद है कि ज़रा-सा कुछ हुआ नहीं कि इतनी ज़ोर-ज़ोर से विलाप शुरू कर देता है कि नरेंद्र भाई का ध्यान भंग हो जाता है। संविधान हत्या दिवस तक मनाना शुरू कर दिया, इतिहास के सारे पन्ने अपनी कूंची से रंग डाले, मतदान के ज़रिए जन-प्रतिनिधि चुनवा कर नहीं ला पाए तो पले-पलाए निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरों की गोद उजाड़ कर खसोट लाए – दो तिहाई बहुमत हस्तगत करने के लिए क्या-क्या नहीं कर रहे हैं, लेकिन लोग हैं कि फिर भी उन्हें जनतंत्र का पहरुआ मानने को तैयार नहीं हैं।

बड़ा अजीब देश है। यह तो चाहता है कि अगर किसी केंद्रीय मंत्री पर स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले का आरोप लगे तो वह इस्तीफ़ा दे दे, अगर किसी की पत्नी पर क्रिकेट टीम खरीदी के मामले में आरोप लगें तो वह ख़ुद मंत्रिमंडल से विदा ले ले, अगर किसी के भांजे पर रिश्वत लेने के आरोप लगें तो उसे मंत्रिमंडल से निकाल दिया जाए, अगर किसी पर कोयला आवंटन घोटाले की जांच रपट में हस्तक्षेप करने का आरोप लगे तो उसे मंत्री पद से हटा दिया जाए। किसी के बेटे पर तेल-वाउचर लेने के आरोप हों तो पिता को सरकार से विदा कर दिया जाए, किसी मुख्यमंत्री पर हाउसिंग घोटाला करने के आरोप हों तो उसे सियासी सूली पर लटका दिया जाए और यह सब आरोप लगते ही हो जाए, जांच-वांच बाद में होती रहे। मगर यह नया भारत है। यह क़ानून और नियमों से चलता है। यह ‘न खाने, न खाने देने’ के लिए संकल्पित है। इसलिए रामलला के दान में अरबों की हेराफेरी से ले कर अपने मुख्यमंत्री के ‘धरतीधर’ होने तक के मामलों में हबड़-तबड़ कार्रवाई करने के बजाय धैर्य से काम लेने की राह पर चलता है।

यह ऐसे छुईमुइयों का दौर नहीं है, जो ज़रा-से छींटों से मुरझा जाएं। इस दौर के सियासतदां निर्भीक लज्जाहीनता की भट्टी से तप कर निकले हैं। उन्हें शाश्वत ढीठता की घुट्टियां पिला-पिला कर पाला-पोसा गया है। उन के मार्गदर्शक चूं-चूं का मुरब्बा नहीं हैं। वे वो लोग हैं, जो देश की छाती पर चढ़ कर खुलेआम प्रधानमंत्री के नाम पर, देश के राजचिह्न का इस्तेमाल करते हुए, एक ऐसे कोष की स्थापना करने का जौहर दिखाते हैं, जिस के बारे में किसी को कोई जानकारी देना उन के लिए ज़रूरी नहीं है, जिस के बारे में कोई भी किसी भी नियम के तहत कोई जानकारी हासिल नहीं कर सकता है, जिस के मामले में सर्वोच्च अदालत भी कोई दखल नहीं दे सकती है। ऐसे पराक्रमी गुरुकुल में पठन-पाठन के बाद देश भर में विचर रहे पट्ठे अपने गुरुजन की लीक से हट कर चलेंगे तो क्या अपने पूर्वजों का नाम नहीं लजाएंगे? इसलिए वे अपना कर्तव्यपालन कर रहे हैं। उन की गुरु-दक्षिणा के गर्व से फूल कर गुरुजन की छाती छप्पन से एक सौ बारह इंच की हो रही है। सो, आप बुक्का फाड़ कर रोते रहिए। आप जितना रोएंगे, हमारे सत्तासीन उतना ही हंसेंगे।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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