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सत्ता की साज़िशें: ‘रक्तांचल 3’

आज के दौर में एक दिलचस्प बात और देखने को मिलती है। हम अक्सर कहते हैं कि दर्शक हमेशा कुछ नया चाहता है। लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। दर्शक नई कहानी चाहता है, लेकिन पूरी तरह नई दुनिया नहीं। उसे परिचित किरदारों से दोबारा मिलना अच्छा लगता है। उसे वही शहर, वही माहौल, वही संघर्ष फिर से देखने में अपनापन महसूस होता है।

सिने -सोहबत

ओटीटी की दुनिया में आज हर शुक्रवार एक नई वेब सीरीज़ दस्तक देती है। किसी में हिंसा ज़्यादा होती है, किसी में रहस्य, किसी में रोमांस और किसी में चौंकाने वाले मोड़। लेकिन इतनी भीड़ के बीच कुछ सीरीज़ ऐसी होती हैं, जो सिर्फ़ अपनी कहानी नहीं, बल्कि अपनी दुनिया की वजह से याद रह जाती हैं। रक्तांचल ऐसी ही फ्रेंचाइज़ी है।

तीसरे सीज़न तक पहुंचते-पहुंचते किसी भी सीरीज़ के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि क्या दर्शक अब भी उसी दुनिया में लौटना चाहेगा? क्या वही किरदार, वही गलियां, वही सत्ता का खेल उसे फिर से आकर्षित करेंगे? ‘रक्तांचल 3’ का सबसे बड़ा उत्तर यही है कि हां, अगर कहानी ईमानदारी से कही जाए तो दर्शक परिचित दुनिया में लौटना पसंद करता है। यही इस सीज़न की पहली जीत है।

राजनीतिक ड्रामा हमेशा भारतीय दर्शकों की पसंद का हिस्सा रहा है। वजह साफ़ है। हमारे समाज में राजनीति सिर्फ़ चुनाव तक सीमित नहीं है। वह परिवारों में है, रिश्तों में है, गांव की चौपाल में है, कॉलेज के चुनाव में है और छोटे शहरों की गलियों में भी है। सत्ता का संघर्ष हमारे सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है। इसलिए जब इसे संवेदनशीलता और विश्वसनीयता के साथ पर्दे पर उतारा जाता है, तो दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।

अगर हिंदी सिनेमा में इस शैली को लोकप्रिय बनाने वालों की बात हो तो प्रकाश झा का नाम सबसे ऊपर आता है। ‘दामुल’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’ और हाल के वर्षों में ‘आश्रम’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने बार-बार यह साबित किया कि राजनीति केवल नेताओं की कहानी नहीं होती, बल्कि आम आदमी की ज़िंदगी पर उसका असर भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

‘रक्तांचल 3’ उसी परंपरा का विस्तार लगता है। यह प्रकाश झा की फिल्मों या सीरीज़ की नकल नहीं करता, बल्कि उसी सामाजिक यथार्थ की मिट्टी से अपनी कहानी गढ़ता है। छोटे शहरों की राजनीति, बाहुबल, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता की बदलती चालें, यह सब यहां किसी सजावट की तरह नहीं, बल्कि कहानी की आत्मा की तरह मौजूद हैं।

आज के दौर में एक दिलचस्प बात और देखने को मिलती है। हम अक्सर कहते हैं कि दर्शक हमेशा कुछ नया चाहता है। लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। दर्शक नई कहानी चाहता है, लेकिन पूरी तरह नई दुनिया नहीं। उसे परिचित किरदारों से दोबारा मिलना अच्छा लगता है। उसे वही शहर, वही माहौल, वही संघर्ष फिर से देखने में अपनापन महसूस होता है।

यही वजह है कि दुनिया भर में फ्रेंचाइज़ी और मल्टी-सीज़न शो लगातार सफल हो रहे हैं। चाहे वह हॉलीवुड हो या भारतीय ओटीटी, दर्शक उन किरदारों के साथ समय बिताना चाहता है जिनसे उसका रिश्ता बन चुका हो। ‘रक्तांचल 3’ इसी मनोविज्ञान को समझती है। यह अपनी दुनिया को बदलने की जल्दबाज़ी नहीं करती। वह उसी दुनिया में नई परिस्थितियां पैदा करती है और यहीं से उसका आकर्षण जन्म लेता है।

सीरीज़ की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं।

क्रांति प्रकाश झा अब विजय सिंह का चेहरा बन चुके हैं। तीन सीज़न बाद उनके अभिनय में एक सहज परिपक्वता दिखाई देती है। वे संवादों से कम और अपनी आंखों से ज़्यादा अभिनय करते हैं। विजय सिंह सिर्फ़ गुस्से या बदले का प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति बन जाता है जो सत्ता, सम्मान और अस्तित्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। क्रांति प्रकाश झा ने इस किरदार को जिस आत्मविश्वास के साथ निभाया है, वह इस सीज़न की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

अगर इस सीज़न का सबसे सुखद आश्चर्य कोई है तो वह हैं राजेश कुमार।

टीवी पर वर्षों तक सहज, सरल और पारिवारिक किरदार निभाने वाले राजेश कुमार यहां एक महत्वाकांक्षी, धैर्यवान और बेहद चालाक राजनेता के रूप में दिखाई देते हैं। उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अपने किरदार को ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय नहीं बनाते। उनके चेहरे की हल्की मुस्कान, संवाद बोलने का संयम और सत्ता की भूख को व्यक्त करने का उनका तरीका बेहद प्रभावशाली है। यह उनके करियर की सबसे यादगार प्रस्तुतियों में गिनी जा सकती है।

निकितिन धीर एक बार फिर अपने किरदार में मजबूती लेकर आते हैं। उनका व्यक्तित्व कहानी में लगातार तनाव बनाए रखता है। वहीं माही गिल, करण पटेल, विक्रम कोच्छर, चित्रंजन त्रिपाठी, प्रमोद पाठक, सौंदर्या शर्मा, रन्जिनी चक्रवर्ती और बाकी कलाकार भी अपने-अपने हिस्से की कहानी पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। ‘रक्तांचल 3’ उन दुर्लभ सीरीज़ में है जहां शायद ही कोई किरदार केवल स्क्रीन भरने के लिए मौजूद लगता हो।

अक्सर अच्छी सीरीज़ का श्रेय केवल कलाकारों को मिल जाता है, जबकि असली लड़ाई पर्दे के पीछे लड़ी जाती है। निर्देशक ऋतम श्रीवास्तव ने पूरी सीरीज़ में पूर्वांचल की मिट्टी, उसकी भाषा, उसके सामाजिक तनाव और उसकी राजनीतिक जटिलताओं को बड़े संतुलन के साथ प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहानी को अनावश्यक स्टाइल या चमक-दमक का शिकार नहीं बनने दिया। कैमरा वहीं रुकता है जहां कहानी रुकना चाहती है। यही निर्देशन की सबसे बड़ी सफलता है।

लेखक सर्वेश उपाध्याय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि तीन सीज़न बाद भी वे इस दुनिया को थका हुआ महसूस नहीं होने देते। सत्ता, बदला, रिश्ते और महत्वाकांक्षा जैसे परिचित विषयों के बावजूद कहानी अपनी पकड़ बनाए रखती है। हां, कुछ सहायक किरदारों और कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों को थोड़ा और विस्तार मिलता तो यह सीज़न और भी प्रभावशाली बन सकता था, लेकिन यह कमी पूरी यात्रा को कमजोर नहीं करती।

निर्माता राई शशांक, महिमा गुप्ता और पीयूष दिनेश गुप्ता इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ‘रक्तांचल 3’ को केवल एक और गैंगस्टर ड्रामा बनने नहीं दिया। तीन सीज़न तक किसी फ्रेंचाइज़ी की पहचान बनाए रखना आसान काम नहीं होता।

आज ओटीटी पर कई सीरीज़ यह मान बैठी हैं कि गालियां, खून-खराबा और लगातार हिंसा ही वास्तविकता का दूसरा नाम है। ‘रक्तांचल 3’ में भी हिंसा है, लेकिन यह हिंसा कहानी का उद्देश्य नहीं, उसका परिणाम है। असली दिलचस्पी सत्ता के खेल में है। कौन किसके साथ खड़ा है, कौन कब विश्वासघात करेगा और किस कीमत पर सत्ता हासिल होगी। यही सवाल दर्शक को अंत तक बाँधे रखते हैं।

सीरीज़ की सिनेमैटोग्राफी भी उल्लेखनीय है। छोटे शहरों का धूल भरा वातावरण, राजनीतिक बैठकों का तनाव, सन्नाटे से भरी गलियां और स्थानीय जीवन की बनावट कहानी को विश्वसनीय बनाती है। बैकग्राउंड स्कोर भी ज़रूरत से ज़्यादा शोर नहीं मचाता, बल्कि दृश्यों के प्रभाव को और गहरा करता है।

क्या ‘रक्तांचल 3’ पूरी तरह परफ़ेक्ट है?

नहीं।

कुछ जगहों पर कहानी और अधिक गहरी हो सकती थी। कुछ राजनीतिक संघर्ष अपेक्षाकृत जल्दी सुलझते दिखाई देते हैं। कुछ सहायक किरदारों को और समय मिलता तो उनके भावनात्मक आयाम और बेहतर सामने आते। लेकिन ये शिकायतें उस समय छोटी लगने लगती हैं जब पूरी सीरीज़ लगातार आपको अपने साथ जोड़े रखती है।

दरअसल, ‘रक्तांचल 3’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह अपने दर्शक का सम्मान करती है। यह उसे हर पांच मिनट में चौंकाने की कोशिश नहीं करती। यह उसके धैर्य पर भरोसा करती है। और शायद यही कारण है कि यह सीरीज़ देखने के बाद याद भी रहती है।

अमेज़न एमएक्स प्लेयर ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई शो दर्शकों तक पहुंचाए हैं जो छोटे शहरों की कहानियों को मुख्यधारा में लेकर आए हैं। ‘रक्तांचल 3’ उस प्रयास को और मजबूत करती है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत की सबसे दिलचस्प कहानियां अक्सर महानगरों से नहीं, बल्कि उन कस्बों और शहरों से आती हैं जहां सत्ता व्यक्तिगत भी होती है और सामाजिक भी।

‘रक्तांचल 3’ सिर्फ़ एक राजनीतिक ड्रामा नहीं, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि परिचित दुनिया भी नए अनुभव दे सकती है। क्रांति प्रकाश झा का परिपक्व अभिनय, राजेश कुमार का चौंकाने वाला रूपांतरण, पूरी स्टार कास्ट की ईमानदार मौजूदगी, निर्देशक का संतुलित विज़न और लेखक की पकड़ मिलकर इस सीज़न को यादगार बनाते हैं।

अगर आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं, जिनमें राजनीति सिर्फ़ भाषण नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं और सत्ता की कीमत के रूप में सामने आती है, तो ‘रक्तांचल 3’ आपकी वॉचलिस्ट में सबसे ऊपर होनी चाहिए।

और शायद यही इस सीरीज़ की सबसे बड़ी जीत है। यह हमें यह एहसास कराती है कि कहानी चाहे कितनी भी पुरानी मिट्टी से निकली हो, अगर उसे ईमानदारी से कहा जाए तो वह हर बार नई लगती है।

देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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