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देश की सुध ले कांग्रेस?

कांग्रेस को अपनी जिद और तुच्छ राजनीति छोड़ कर देश और समाज के व्यापक हित में सोचना चाहिए। अगर लोकसभा व विधानसभाओं में सीटें बढ़ती हैं और महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिलता है तो इससे लोकतंत्र मजबूत होगा। कांग्रेस सरकार का साथ देती है तब भी और नहीं देती है तब भी यह बदलाव होना है।

आमतौर पर संसद के किसी भी सत्र में पहले हफ्ते विपक्षी पार्टियां शोर शराबा करती हैं और विवाद के तमाम मुद्दे उठा कर सरकार से जवाब मांगती है। उनके शोर शराबे की वजह से संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही बाधित होती है। लेकिन दूसरे हफ्ते से स्थितियां सामान्य हो जाती हैं और विधायी कामकाज शुरू हो जाता है। हाल के दिनों में पहली बार यह देखने को मिला है कि मानसून सत्र का तीसरा हफ्ता समाप्त हो गया है और अभी तक विपक्ष का हंगामा चल रहा है। लगातार तीसरे हफ्ते संसद के दोनों सदनों में कामकाज सुचारू नहीं हो सका। बड़ी जद्दोजहद के बाद पेपर लीक के मसले पर लोकसभा में 16 घंटे और राज्यसभा में छह घंटे की चर्चा हुई। इस चर्चा के अलावा कोई भी सार्थक चर्चा ससंद में नहीं हो सकी है। यहां तक कि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ ब्लॉक ने सरकार की ओर से लाए गए विधेयकों पर चर्चा के लिए समय निकालने की भी जरुरत नहीं समझी।

संसद के मानसून सत्र में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाने का विधेयक पास हुआ। जन्म और मृत्यु के पंजीकरण से जुड़ा विधेयक पास हुआ। कराधान से जुड़ा विधेयक भी पास किया गया। वंदे मातरम् को राष्ट्रगान की तरह सम्मान देने और उसका अपमान करने पर सजा का प्रावधान करने वाला विधेयक पास हुआ लेकिन विपक्ष ने किसी भी विधेयक पर चर्चा की जरुरत नहीं समझी। वैसे तो कांग्रेस पार्टी सरकार से सदन चलाने और चर्चा कराने की मांग करती है लेकिन यहां सरकार विधेयक पेश कर रही है और कांग्रेस से चर्चा में हिस्सा लेने की अपील कर रही है लेकिन कांग्रेस संसद से गायब हो जा रही है। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के सांसद हर दिन सुबह नए तरह के पोस्टर और बैनर लेकर संसद पहुंच रहे हैं और संसद परिसर में खड़े होकर प्रदर्शन करने लग रहे हैं। वे तीन मिनट का समय सदन के अंदर दे रहे हैं औऱ तीन तीन घंटे बाहर खड़े होकर प्रदर्शन कर रहे हैं ताकि मीडिया में उनकी खबर बने, उनकी रील बने और सोशल मीडिया में उसका प्रचार हो।

ध्यान रहे संसद को ‘डेलिवरेटिव चैम्बर’ यानी विचार विमर्श का सदन कहा जाता है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को ऐसा लग रहा है कि जनहित या देशहित से जुड़े किसी मुद्दे पर विचार विमर्श नहीं करना है। उनको सिर्फ राजनीति करनी है। कांग्रेस ने संसद को भी राजनीति का प्लेटफॉर्म बना दिया है। कांग्रेस का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह संसद में आकर 20 जुलाई को जंतर मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई के बारे में जवाब दें और सरकार अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चर्चा कराए। सवाल है कि जब पेपर लीक बिल पर लोकसभा में 16 घंटे तक चर्चा हुई और राहुल गांधी ने भी 50 मिनट तक भाषण दिया तो क्या उसमें जंतर मंतर के मसले पर बात नहीं हुई? उनकी पार्टी के सभी नेताओं ने उसी के बारे में ज्यादा भाषण दिया। किसी ने बिल के प्रावधानों पर कुछ कहने की जरुरत नहीं समझी। सरकार की ओर से भी उनकी बातों का जवाब दे दिया गया।

उसके बाद भी इसी मुद्दे पर अड़े रहने का मकसद ही यह है कि किसी तरह से संसद को बाधित किया जाए। यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि जंतर मंतर पर पुलिस की कार्रवाई और चढ़ावा चोरी दोनों का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। चढ़ावा चोरी की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दूसरी एसआईटी का गठन हुआ है। विपक्ष को इसकी रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए और संसद सत्र में कामकाज होने देना चाहिए।

अब सवाल है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने क्यों गतिरोध बनाए रखा है? इसका बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस को लग रहा है कि सरकार नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का बिल ला सकती है और साथ ही परिसीमन का बिल भी लाया जा सकता है। इसलिए कांग्रेस पहले से गतिरोध बनाए रखना चाहती है। उसको लग रहा है कि अगर शांति बनी और विधायी कामकाज सुचारू रूप से होने लगे तो फिर नारी शक्ति वंदन कानून और परिसीमन विधेयक पर भी चर्चा हो जाएगी और अब सरकार ने इतनी संख्या का इंतजाम कर लिया है कि बिल पास भी हो जाएगा।

कांग्रेस को पता है कि अगर परिसीमन के जरिए सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है और महिलाओं को एक तिहाई सीटों पर आरक्षण मिलता है तो उसके लिए अगले चुनाव की राह बहुत मुश्किल हो जाएगी। कांग्रेस की एक समस्या एफसीआरए बिल को लेकर भी है, जिसे पास कराने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। इस बिल के जरिए गैर सरकारी संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियमित किया जाना है। सबको पता है कि कैसे विदेशी चंदे का दुरुपयोग होता है और उससे भारत में देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। सरकार इसे रोकना चाहती है। तभी दुनिया भर में इसे लेकर बेचैनी है। एक अमेरिकी सांसद ने भी इसके विऱोध में बयान दिया, जिस पर भारत ने दो टूक अंदाज में कहा कि यह देश का आंतरिक मामला है। असल में दुनिया के अनेक संगठन और संस्थाएं इसका विरोध कर रही हैं और देश के बाहर बैठी ताकतों को खुश करने के लिए कांग्रेस भी इस बिल का विरोध कर रही है। कांग्रेस को चाहिए कि वह चर्चा में शामिल हो है और इसमें संशोधन सुझाए। वह इसे संसदीय समिति को भेजने की मांग भी कर सकती है। लेकिन उसने सीधे इसे रोकने और विफल करने का ऐलान किया हुआ है।

जहां तक नारी शक्ति वंदन कानून और परिसीमन का सवाल है कि इस बारे में संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से दो बार बात की है। उन्होंने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी बात की है और कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से ही मिल कर समर्थन की अपील की है। सरकार ने अप्रैल में संसद का विशेष सत्र बुला कर इस बिल को पास कराने का प्रयास किया था लेकिन संयुक्त विपक्ष ने इसे विफल कर दिया। उसके बाद सरकार ने एक साथ दो प्रयास शुरू किए। पहला प्रयास दो तिहाई बहुमत जुटाने का था और दूसरा विपक्ष की पार्टियों को इन दोनों विधेयकों के लिए तैयार करने का था।

पहले प्रयास में सरकार काफी हद तक सफल हो गई है। पश्चिम बंगाल में मिली जीत और उसके बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के प्रयासों से भाजपा को 20 लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसद मिले हैं। तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर 20 सांसद नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए हैं और यह पार्टी एनडीए का समर्थन कर रही है। उधर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिव सेना के छह विधायक एकनाथ शिंदे की शिव सेना में शामिल हो गए हैं। ध्यान रहे पिछले विशेष सत्र में सरकार के समर्थन में 298 वोट पड़े थे। अब वह संख्या 324 हो गई है।

दूसरे प्रयास में भी सरकार को सफलता मिलती दिख रही है। तमिलनाडु में चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस और डीएमके का संधि विच्छेद हो गया है और डीएमके कुछ शर्तों के साथ सरकार का समर्थन करने को तैयार है। उत्तर भारत की पार्टियों खास कर समाजवादी पार्टी आदि के लिए भी महिला आरक्षण व परिसीमन का विरोध करना राजनीतिक रूप से नुकसान वाला हो सकता है। अगर उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें 80 से बढ़ कर 120 होती हैं तो इससे किसको समस्या हो सकती है? डीएमके और अन्य विपक्षी पार्टियों के रुख को देखते हुए कांग्रेस के लिए भी अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करने की मजबूरी हो गई है। तभी संभावना है कि इस मसले पर आम राय बने। कांग्रेस को अपनी जिद और तुच्छ राजनीति छोड़ कर देश और समाज के व्यापक हित में सोचना चाहिए। अगर लोकसभा व विधानसभाओं में सीटें बढ़ती हैं और महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिलता है तो इससे लोकतंत्र मजबूत होगा। कांग्रेस सरकार का साथ देती है तब भी और नहीं देती है तब भी यह बदलाव होना है। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हें।)

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