nayaindia Lok Sabha election ‘मोशा’- झोले से झांकता ग़लतियों का ज़ख़ीरा
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‘मोशा’- झोले से झांकता ग़लतियों का ज़ख़ीरा

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आधुनिक चाणक्य समझने की झौंक में मोशा-क्लब से यह महा-भूल हो गई कि उस ने पिछली बार जीते अपने कुल 124 सांसदों को बड़े बेआबरू हो कर बाहर जाने पर मजबूर किया। पिछली लोकसभा में भाजपा के पारंपरिक दिग्गजों का यह 41 फ़ीसदी हिस्सा क्या इन चुनावों में पहले सरीखे उछाह से काम कर रहा होगा? जिन के टिकट काटे गए हैं, उन्हें 2019 के चुनाव में पौने तीन करोड़ वोट मिले थे। तो देश भर में नरेंद्र भाई के खि़लाफ़ पसरी उकताहट के बीच से झांकते इस क्षोभ पर भी ग़ौर कीजिए।

400 पार के अपने अति-आत्मविश्वास में, अपने थोथे-तयक़्क़ुन में, ‘मोशा’-जोड़ी ने पिछले तीन-चार महीनों में ग़लतियों-पर-गलतियों का ऐसा अंबार लगा डाला कि ख़ुद-तो-ख़ुद समूची भारतीय जनता पार्टी को 2024 के चुनाव में मुसीबत की खोह के हवाले कर दिया है। इसीलिए चार सौ और तीन सौ सत्तर के ज़ुमले का ज़िक्र चुनाव प्रचार के शुरुआती एकाध हफ़्ते के बाद ही साबरमती में तिरोहित हो गया। अब तो चर्चाओं का मुद्दआ यह बन गया है कि भाजपा को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 272 सीटों का बहुमत मिल रहा है या नहीं। 

ऐसा इसलिए हुआ कि नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह ने बिना ज़्यादा सोच-विचार किए चार सौ पारका नारा उछाल दिया। अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल चने के झाड़ पर चढ़ा देने के उपक्रम में नरेंद्र भाई ने कह दिया कि देश भर के हर मतदान केंद्र पर 370 अतिरिक्त वोट इस बार लाने हैं और बस फिर भाजपा अकेले अपने बूते पर 370 सीटें हासिल कर लेगी। फ़ौरी तौर पर इस का बड़ा असर हुआ और चूंकि नरेंद्र भाई ने कहा था तो भाजपा के बड़े-बड़े विद्वतजन भी उछल-उछल कर यही आलाप लगाने लगे। 

मगर जब इस असलियत पर ध्यान दिलाया गया कि देश में 12 लाख मतदान केंद्र हैं और उन में से हर एक पर 370 अतिरिक्त वोट का मतलब होता है कुल 45 करोड़ के आसपास वोट तो सारा बुलबुला धम्म से नीचे बैठ गया। मूर्ख-से-मूर्ख की भी समझ में आ गया कि 2019 में भाजपा को कुल 23 करोड़ वोट मिले थे तो क्या 2024 में तेईस और पैतालीस यानी 68 करोड़ वोट मिल जाएंगे? इतने तो कुल मतदाता भी मतदान केंद्रों तक नहीं पंहुचेंगे। सो, भाजपा के चुनावी मंचों से चार सौ पारकी चिंघाड़ बंद हो गई और जब ऐसा हुआ तो ज़मीनी कार्यकर्ता पसोपेश में पड़ गए। 

घोड़े पर सवार मोशाके अति-उत्साह ने भाजपा के टिकट वितरण में भी ऐसी-ऐसी ग़लतियां करा दीं कि पूछिए मत। नरेंद्र भाई और अमित भाई भूल ही गए कि 2024 कोई 2019 नहीं है और इन पांच साल में गंगा से ले कर कावेरी तक में बहुत पानी बह चुका है। मगर अपनी हुमक में जुगल-जोड़ी ने पिछली बार जीते 303 सांसदों में से 112 के टिकट बेरहमी से काट दिए। 2019 में भाजपा ने 303 सीटें, प्रति-सीट औसतन 2 लाख 30 हज़ार वोटों के अंतर से, जीती थीं। यह कोई मामूली अंतर नहीं है। ऐसे में जमे-जमाए सांसदों में से 37 फ़ीसदी को पूरी तरह बाहर का दरवाज़ा दिखा देना अब तलवार की धार पर चलना साबित हो रहा है। 

21 मौजूदा सांसदों को तो पहले ही अपने-अपने प्रदेशों में जा कर विधानसभा का चुनाव लड़ने को भेज दिया गया था। वे सब मन मार कर अपनी हैसियत से छोटा चुनाव लड़ने गए। उन में 12 विधायक बन पाए, 9 हार कर घर बैठ गए। जो हार गए, उन के मन का हाल तो पूछिए ही मत। जो जीत भी गए, वे भी दिल्ली के राजपथ से अपने मुहल्ले की गलियों में पहुंच कर कौन-से ख़ुश हैं?

2019 में जीते सांसदों में से सिर्फ़ 167 को ही भाजपा इस बार उन के पुराने निर्वाचन क्षेत्रों से लड़ा रही है। 5 मौजूदा सांसदों के चुनाव क्षेत्र बदल दिए हैं। पुराने सांसदों में से तीन की सीटें सहयोगी दलों को दे दी हैं। न दूसरे चुनाव क्षेत्रों में भेजे गए सांसदों का वहां मन लग रहा है और न अपनी सीटें सहयोगी दलों के पास चले जाने का मलाल कोई आसानी से मिटा पा रहा है। 

अब टिकट बंटवारे के कुछ और मसलों पर ध्यान दीजिए। 2019 में 50 हज़ार वोट से कम से जीतने वाले उम्मीदवारों में से 48 प्रतिशत को भाजपा ने इस बार टिकट नहीं दिए हैं। 1 से 2 लाख वोट से जीतने वाले उम्मीदवारों में से 39 प्रतिशत के टिकट काटे गए हैं। और-तो-और, 5 लाख से ज़्यादा वोट से जीतने वाले सांसदों में से भी 47 प्रतिशत को इस बार उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। हरियाणा में करनाल की सीट भाजपा ने पिछली बार देश में दूसरे क्रम पर 6 लाख 56 हज़ार वोट के सब से बड़े अंतर से जीती थी। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर को प्रत्याशी बनाने के लिए वहां के सांसद तक का टिकट काट दिया गया। 

मज़े की बात यह है कि जिन सांसदों की जीत का औसत अंतर ज़्यादा था, उन के तो टिकट काट दिए गए और जिन की जीत का औसत फ़र्क कम था, उन्हें उम्मीदवार बना दिया गया। जिन 112 सांसदों को टिकट नहीं दिए, उनकी जीत का औसत अंतर 2019 में 2 लाख 35 हज़ार 111 वोट का था। जिन 167 मौजूदा सांसदों को टिकट दिए गए हैं, उन की जीत का औसत अंतर 2 लाख 23 हज़ार 686 वोट था। उम्मीदवार बनाए गए सांसदों को, उम्मीदवार नहीं बनाए गए सांसदों के मुकाबले, हर निर्वाचन क्षेत्र में औसतन साढ़े ग्यारह हज़ार वोट कम मिले थे। 

पिछली बार भाजपा से जीते 40 सांसदों की जीत का अंतर 50 हज़ार तक था। उनमें से 19 को उसी निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिए, एक का चुनाव क्षेत्र बदल दिया, 19 के टिकट काट दिए, एक सीट सहयोगी दल को दे दी। 50 हज़ार से एक लाख वोट के अंतर से जीतने वाले 37 सांसद थे। उन में से 23 को उसी क्षेत्र से टिकट दिया, 2 के क्षेत्र बदल दिए, 11 के टिकट काट दिए, एक को विधानसभा चुनाव लड़ने भेज दिया। 1 से 2 लाख वोट से जीतने वाले 62 सांसद थे। उन में से 38 को उसी क्षे़त्र से लड़ा रहे हैं, 20 के टिकट काट दिए, 3 को पहले ही विधानसभा चुनाव लड़ने भेज दिया था।  2 से 3 लाख से जीतने वाले 59 सांसद थे। उन में से 36 को उसी क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है, 21 के टिकट काट दिए, एक को विधानसभा चुनाव लड़ने भेज दिया, 1 सीट सहयोगी दल को दे दी।

3 से 4 लाख से जीतने वाले 61 सांसद थे। उन में से 30 उसी निर्वाचन क्षेत्र से लड़ रहे हैं, 23 के टिकट काट दिए, 1 का क्षेत्र बदल दिया, 4 को विधानसभा लड़ने भेज दिया, 1 सहयोगी दल को दे दी। 4 से 5 लाख से जीतने वाले 29 सांसद थे। 16 अपने पुराने चुनाव क्षेत्रों से ही लड़ रहे हैं, 11 के टिकट काट दिए, 1 को विधानसभा लड़ने भेज दिया। 5 लाख से ज़्यादा वोट से 15 सांसद जीते थे। उन में से 5 उसी जगह से लड़ रहे हैं, एक का क्षेत्र बदल दिया, 7 के टिकट काट दिए, 2 को विधानसभा लड़ने भेजा। 

तो, अपने को आधुनिक चाणक्य समझने की झौंक में मोशा-क्लब से यह महा-भूल हो गई कि उस ने पिछली बार जीते अपने कुल 124 सांसदों को बड़े बेआबरू हो कर बाहर जाने पर मजबूर किया। पिछली लोकसभा में भाजपा के पारंपरिक दिग्गजों का यह 41 फ़ीसदी हिस्सा क्या इन चुनावों में पहले सरीखे उछाह से काम कर रहा होगा? जिन के टिकट काटे गए हैं, उन्हें 2019 के चुनाव में पौने तीन करोड़ वोट मिले थे। तो देश भर में नरेंद्र भाई के खि़लाफ़ पसरी उकताहट के बीच से झांकते इस क्षोभ पर भी ग़ौर कीजिए।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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