• “यूं ही साथ-साथ चलते”

    भोपाल। जीवन में मैं से हम हो जाने का अपना आनंद होता है और कौन दंपत्ति जीवन का यह आनंद नहीं चाहता लेकिन यह भी सच्चाई है कि मैं से हम होने की राह इतनी आसान नहीं होती। डॉ. सच्चिदानंद जोशी लिखित और अभिनीत नाटक 'यूं ही साथ-साथ चलते’ में एक प्रौढ़ दंपत्ति के मैं से हम होने का उलझन भरा लेकिन बेहद रोचक सफर से दर्षक रुबरू होता है। प्रेमी प्रेमिका से दंपत्ति बन गये पति पत्नी यानी सच्चिदानंद जोषी और मालविका जोषी ने पति पत्नी के संबंधों के प्रेम, नोकझोंक, उलाहना और विबषता को इतनी सहजता से प्रस्तुत...

  • संवाद और संवाद अदायगी का सम्मोहन

    भोपाल। मंच पर रोशनी होती है और नाटक की नायिका प्रवेश लेती है। प्रवेश लेते ही वह दर्शकों से एकालाप करने लगती है। लगभग डे़ढ़ घंटे तक न रोशनी बंद होती है और न नायिका का एक्जिट होता है। एक ही कास्ट्यूम में वह अपनी कहानी धाराप्रवाह सुनाती रहती है। 'गुडम्बा’ नामक इस एक पात्रीय नाटक में नायिका लुबना सलीम ने अभिनय का हर अध्याय को बेहद कुशलता के साथ प्रस्तुत कर दिया। salim arif gudamba मध्यमवर्गीय परिवार की 18 साल की लड़की से 42 साल की उम्र में सास बनने के बाद तक के जीवन के हर पहलू को...

  • अभिनय इसी का नाम है

    भोपाल। नाटक खत्म होते ही दर्शकाें के तालियों की गड़गड़हट थमने का नाम नहीं ले रही थी। पूरा अडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। इस नाटक से दर्शकाें को जितनी उम्मीदें रहीं होंगी उससे कहीं बहुत-बहुत ज्यादा उन्हें मिला। यह मौका था विवेचना रंगमंडल जबलपुर के तीसवें राष्ट्रीय नाट्य समारोह ”रंग परसाई“, का जहंा ”जीना इसी का नाम है“ नाटक का मंचन हुआ। दर्शकाें के लिये इस नाटक का आकर्षण इसलिये भी अधिक था क्योंकि इस दो पात्रों वाले नाटक में भूमिकायें निभा रहे थे टी.वी. और फिल्मों के जाने माने कलाकार राजेन्द्र गुप्ता और हिमानी शिवपुरी। ”ओल्ड वल्र्ड“ एक रूसी भाषा...

  • नफरत को मोहब्बत में बदलता नाटक

    भोपाल। “अक्सर खबरों में पढ़ता, सुनता रहता हूँ कि आप लोग पाकिस्तान से आतंकवादियों को सौंपने की मांग करते हैं। बदले में पाकिस्तान भी इसी तरह की मांगे आपके समक्ष रखते आया है। मेरी मोहब्बत शाइस्ता फहीम खान पाकिस्तान में रह गई है। आप आतंकवादी मांगते हैं और वे नहीं भेजते। मेरी बात पर विचार करते हुये क्या एक बार आप उनसे एक मोहब्बत की अपील नहीं कर सकते। शायद इसके जबाव में ऐसी ही मोहब्बत वे भी मांग बैठे। फिर संभव है मोहब्बतों का ये सिलसिला दूर तक चल निकले।” यह है उस पत्र के अंश है जो नाटक...

  • यायावरी रंगमंच का सितारा

    भोपाल। स्कूल के दालान में चारों तरफ सैकड़ों स्कूली बच्चे बैठे हैं और बीचों बीच एक साधारण कुर्सी रखी हुई है। दैनंदिन पहनने वाली साधारण वेशभूषा में एक नौजवान रंगकर्मी बीचों बीच वाले स्थान में प्रवेश लेता है और विद्यार्थियों से अपना संवाद शुरू करता है, कहानी सुनाने के अंदाज में। यह कहानी हाशिये पर पड़े परिवार के एक बच्चे की है जो स्कूल में पढ़ता भी है और मजदूरी करने को भी विवश है। अभाव ग्रस्त जीवन जी रहे स्कूली बच्चे की कहानी में उसके माँ-बाप भी हैं, शिक्षक हैं, सहपाठी हैं और पूरा समाज है लेकिन मंच पर...

  • एक्शन, लाइट, डायरेक्शन…

    भोपाल। किसी भी रंग निदेशक के लिये वह दिन बेहद गर्व और रोमांच का दिन होता है जब किसी नाट्य समारोह में उसके गुरू के नाटक का भी मंचन हो और उसी दिन उसी समारोह में उसके खुद के निर्देशन में तैयार नाटक का मंचन हो। ऐसा ही रोमांच का दिन पटना के नौजवान और प्रयोगधर्मी रंगनिदेशक विज्येन्द्र टांक के लिये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित भारत रंग महोत्सव के दौरान आया। इस दिन उसके निदेशन में तैयार नाटक ’गुंडा’ का मंचन एलटीजी आडिटोरियम हो रहा था तो इसी दिन उनके गुरू संजय उपाध्याय के निदेशन में तैयार नाटक ’आनंद...

  • ‘अंधा युग’ पेशेवर नाटक की आहट

    भोपाल। भोपाल के रंगमंच में बरसों बाद या कहूं पहली बार किसी निजी नाट्य संस्था द्वारा पेशेवर अंदाज में नाटक की प्रस्तुति की गई। यह था धर्मवीर भारती रचित नाटक ’अंधा युग’ जिसे हम थियेटर द्वारा बालेन्द्र सिंह के निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। बालेन्द्र पिछले तीन दशक से अधिक समय से रंगमंच में सक्रिय हैं और अब तक लगभग एक दर्जन नाटक निर्देशित व अभिनीत कर चुके हैं। बालू के नाम से लोकप्रिय बालेन्द्र सिंह लीक से हटकर काम करने वाले रंगकर्मी है। एकल पात्रीय नाटक ’पापकार्न’ उनके इसी धुन को दिखाता है विख्यात निर्देशक हबीब तनवीर के साथ...

  • हबीब तनवीर की याद में

    भोपाल। विश्व के महान रंग निर्देशक, अभिनेता, नाटककार हबीब तनवीर साहब की जन्म शताब्दी के अवसर पर इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय के रंगमंच विभाग द्वारा व्याख्यान का आयोजन किया गया। रंगमंच विभाग के प्रमुख एवं अनुभवी रंग निदेशक डाॅ. योगेन्द्र चैबे की अगुवाई में हबीब साहब के निधन 2009 के बाद से अब तक लगातार उनकी जन्म तिथि पर ऐसा आयोजन होता रहा है जिसमें देश के नाम गिरानी रंगकर्मियों व विशेषज्ञों की भागीदारी रही है। इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है जिसका परिसर अपनी अलग पहचान रखता है। विश्वविद्यालय के...

  • ‘किलकारी’ की रंगमंचीय गूंज

    भोपाल। कुछ साल पहले चर्चित फिल्म ’सुपर-30’ का निर्माण हुआ था। इस फिल्म में कलाकारों के चयन के लिये प्रसिद्ध कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा पटना आये हुए थे। उन्होंने फिल्म के लिये जिन 30 बच्चों का चयन किया उसमें 16 बच्चे वे थे जो किलकारी पटना में रंगमंच का प्रशिक्षण ले रहे थे। बड़े गर्व और खुशी के साथ किलकारी के रंग प्रशिक्षक रवि मुकुल बताते हैं कि किलकारी में रंग प्रशिक्षण ले रहे बच्चे थियेटर में तो सक्रियता से काम कर ही रहे हैं, साथ ही रियलिटी शो और फिल्मों में भी उनको काम करने का मौका मिल रहा...

  • एक जुनूनी रंगकर्मी का रंग आंदोलन

    भोपाल । मुम्बई का पृथ्वी थियेटर नाट्य मंचन के लिये एक जाना पहचाना प्रतिष्ठित स्थान लंबे समय से बना हुआ है। इसकी प्रतिष्ठा के पीछे बड़ा कारण यह रहा है कि मुम्बई में हिन्दी रंगमंच को स्थापित करने में पृथ्वी थियेटर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश के नामचीन रंग निर्देशकों की यह जगह पहली पसंद रही है जहां वे अपने नाटकों का मंचन करते रहे हैं। यहां होने वाले नाटकों के दर्षकों में भी रंगमंच और सिनेमा के बड़े नाम शामिल रहे हैं। अब जिस पैमाने पर मुम्बई में हिन्दी में नाटक तैयार हो रहे हैं, उनके मंचन के...

  • दो दशक बाद फिर बज्जू भाई का ‘अंधा युग’

    भोपाल। नाटक शुरू होते ही नेपथ्य में आवाज गूंजती है, सूत्रधार के नैरेशन की। यह जानी पहचानी आवाज है प्रो. रामगोपाल बजाज की जिसका जादू दर्शकों को बांध लेता है। भारतीय रंगमंच के शीर्ष निदेशक रामगोपाल बजाज के निदेशन में कोई नाटक देखना दुर्लभ अनुभव होता है। काफी समय से उन्होंने कोई नाटक संभवतः तैयार नहीं किया है। हाल ही में भारत भवन में आयोजित नाट्य समारोह में उनके निर्देशन में तैयार नाटक 'अंधा युग’ देखने को मिला। इस समारोह में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रेपटरी कंपनी के तीन नाटकों का मंचन किया गया लेकिन बज्जू भाई प्रो. बजाज की...

  • थियेटर की महक है “कटहल” में

    भोपाल। थियेटर व फिल्मों का जितना करीबी रिष्ता इन दिनों देखने को मिलता है, वैसा पहले शायद नहीं रहा। थियेटर से फिल्मों व टी.वी. सीरियल में गये कलाकारों ने फिल्मों को एक नया कलेवर व मुहावरा दिया है। अनेक रंगकर्मी फिल्मों में भी बेहतरीन काम कर रहे है और थियेटर में भी अपनी सक्रियता बनाये हुए हैं। शबाना आजमी, स्व. फारूख शेख, नसीरूद्दीन शाह, राजेन्द्र गुप्ता, हिमानी षिवपुरी यषपाल शर्मा जैसे कई प्रसिद्ध रंगकर्मियों ने जहां फिल्मों में अपने को से नये आयाम गढ़े हैं तो उसी के समांनातर थियेटर को भी लगातार समृद्ध करते रहे हैं। ये रंगकर्मी न...

  • दमन का कॉमिक प्रतिकार है ‘बागी अलबेले’

    भोपाल। मैं किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचता हूँ जिसे हंसी ही नहीं आती और जो कभी हंसा ही नहीं। क्या वह नाटक ’बागी अलबेले’ देखते हुए भी ऐसा ही रह सकता है। नहीं, ऐसे व्यक्ति को भी हंसने के लिये मजबूर कर देगा इस नाटक का आल्हादित करने वाला हास्य। देश में कुछ रंग निदेशक ऐसे हैं जिनके नाटकों का प्रदर्शन प्रायः महानगरों तक सीमित रहता है लेकिन वे अपने आप में अद्वितीय होते हैं। इन नाटकों को देखकर आपकी न केवल रंगमंच की समझ समृद्ध होती है वरन् एक नये जीवन अनुभव से भी गुजरते हैं। ऐसे...

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