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नफरत को मोहब्बत में बदलता नाटक

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भोपाल। “अक्सर खबरों में पढ़ता, सुनता रहता हूँ कि आप लोग पाकिस्तान से आतंकवादियों को सौंपने की मांग करते हैं। बदले में पाकिस्तान भी इसी तरह की मांगे आपके समक्ष रखते आया है। मेरी मोहब्बत शाइस्ता फहीम खान पाकिस्तान में रह गई है। आप आतंकवादी मांगते हैं और वे नहीं भेजते। मेरी बात पर विचार करते हुये क्या एक बार आप उनसे एक मोहब्बत की अपील नहीं कर सकते। शायद इसके जबाव में ऐसी ही मोहब्बत वे भी मांग बैठे। फिर संभव है मोहब्बतों का ये सिलसिला दूर तक चल निकले।” यह है उस पत्र के अंश है जो नाटक का हीरो एक भारतीय हिन्दू युवक अपनी मोहब्बत पाकिस्तानी मुस्लिम युवती को पाने के लिये देश के गृहमंत्री को लिखता है।

हिन्दू मुस्लिम तथा और हिन्दूस्तान-पाकिस्तान के बीच गहराती नफरत के माहौल में मोहब्बत की अपील करता यह नाटक है ”बेहद नफरत के दिनों में“ जिसकी प्रस्तुति अभिनव रंगमंडल उज्जैन के 38वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में की गई। प्रसिद्ध लेखक मुशर्रफ आलम जौकी की कहानी का नाट्य रूपांतरण कल्पनाशील रंग निर्देशक दौलत वैद ने किया और उन्हीं के निर्देशन में झकझोर देने वाला यह नाटक मंचित हुआ। आज के दौर में हिन्दू-मुस्लिम नफरत पर पूरी बेबाकी के साथ नाटक करना दौलत जैसे निर्देशक की वैचारिक दृढ़ता को दिखाता है।

समकालीन घटनाओं और प्रसंगों पर सामान्यतः नाटक न लिखे जाते और न खेले जाते हैं। ऐसे में यह नाटक बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है जो समाज में गहराती नफरत को पूरी संजीदगी के साथ उजागर करता है और एक मोहब्बत भरा पैगाम भी समाधान के रूप में प्रस्तुत करता है। नाटक में हिन्दू मुस्लिम नफरत के माहौल में सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक भारतीय हिन्दू युवक राजेन्द्र राठौर और एक पाकिस्तानी मुस्लिम युवती शाइस्ता फहीम खान टकराते हैं। दोनों के बीच संवाद नफरती शिकवा शिकायतों से शुरू होकर मोहब्बत में तब्दील हो जाता है और दोनों सोशल मीडिया पर ही शादी रचा लेते हैं। भारत आने पर लड़की के माँ-बाप को यह पता चलने पर कि लड़का हिन्दू है, दोनों को अलग कर दिया जाता है और लड़की को लेकर पाकिस्तान लौट जाते हैं। उसी मोहब्बत को पाने के लिये नाटक का नायक राजेन्द्र राठौर गृहमंत्री को खत लिखकर पाकिस्तान से आतंकबादियों की जगह उसकी मोहब्बत को लौटाने की अपील करता है। नाटक में प्रस्तुत नफरत को मोहब्बत से जीतने की यह दास्तां ताजा हालात को एक सुकुन भरा मकाम देता दिखता है।

इस बेहद संवेदनशील कथानक को अपने नाटक में पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत करने का साहसिक काम निदेशक दौलत वैद ने किया है। एनएसडी से प्रशिक्षित दौलत ने दर्जनों नाटक निर्देशित किये हैं जिनका मंचन देश विदेश में होता रहा है। देश के नामचीन निदेशकों के साथ काम करते हुए उन्होंने हिन्दी नाटकों में प्रयोगशीलता के साथ सामाजिक सरोकार की अपनी दृष्टि विकसित की है। इस नाटक में वे इतने फोकस्ड हैं कि नाटक अपने कथानक से कहीं भी भटकता नहीं है। अलबत्ता नाटक के कुछ कॉमिक दृश्य दर्शकों को हंसाते भी हैं लेकिन कथानक की गंभीरता को कम नहीं करते। नाटक के मुख्य पात्र आदित्य और सारिका के पास अपने-अपने कम्प्यूटर टेवल पर बैठकर संवाद बोलने के अलावा अभिनय की गंुजाइश नहीं थी और अपनी संवाद अदायगी में ही दोनों कलाकारों ने ऐसा कमाल दिखाया कि अभिनय की सारी कसर पूरी कर दी। अन्य कलाकारों ने भी अपने जीवंत अभिनय से दर्षकों को प्रभावित किया। मंच पर सेट, ब्लाकिंग, संगीत, प्रकाश सभी बेहद संतुलित और कथानक को प्रभावी बनाने में सहायक रहे।

हिन्दी रंगमंच की दिक्कत यह है कि वह एक तरफ साठ के दशक के कथानकों से ही बंधा है तो दूसरी ओर विदेशी नाटकों के अनुवाद के मोह से नहीं उबर पा रहा है। नाटकों के प्रति दर्शकों की अरूचि का एक बड़ा कारण यह भी है। हालांकि इस स्थिति से उबरने की कोशिशें भी हो रही है। कुछ नाटककार समकालीन विषयों पर नये-नये नाटक लिख रहे हैं तो कुछ युवा निदेशक नये-नये कथानकों पर नाटक भी कर रहे हैं। दौलत वैद का यह नाटक इसी कोशिश की एक मजबूत बड़ी है। दौलत ने यह नाटक 2010 में तैयार किया था। तब आतंकवादी गतिविधियाँ आक्रमक हो रही थी। अब जब इस नाटक को नये सिरे से उन्होंने तैयार किया तो इसमें सारे कलाकार नये लिये गये। नाटक का कथानक तब भी प्रासंगिक था और आज के दौर में भी प्रासंगिक है। आतंक और नफरत को मोहब्बत में बदलने की सोच बेहद रचनात्मक और सकारात्मक लगती है और यही संदेश पूरी नाटकीयता के साथ यह नाटक देता है।

यह नाटक ऐसा है कि केवल रंगकर्मी के रूप में इसे नहीं खेला जा सकता। इसके लिये जरूरी है कलाकारों की समझ और कनविक्षन। अभिनय और निदेशक दोनों में वह कनविक्षन साफ नजर आया। नफरत फैलने-फैलाने को लेकर नाटक के कुछ प्रसंगों की प्रस्तुति सांकेतिक रूप में रखना, मुझे लगा कि अधिक प्रभावशाली हो सकता था। दर्शक संकेतों और प्रतीकों की बेहतर समझ रखता है। नाटक की खूबी प्रतिरोध और प्रतिकार न होकर भावनात्मक समाधान लेकर आता है जो दर्शकों के दिल को छू जाने वाला है। इस नाटक को देखते हुए कंपनी थियेटर के अतुल कुमार द्वारा निदेशित नाटक ’बागी अलबेले’ का स्मरण हो आया जो कामेडी के जरिये व्यवस्था का प्रतिरोध करता है जिसमें प्रतीकों और संकतों का बखूबी इस्तेमाल किया गया है।

दौलत वैद का यह नाटक आज के समय में बेहद प्रासंगिक नाटक है जिसका प्रदर्शन अधिक से अधिक होना चाहिए। इसके लिये जरूरी है नाटक का पेशेवर होना। इस नाटक में रिपीट वेल्यू भी है और शुरू से ही दर्शकों को बांधे रखने की खूबी भी जो किसी भी पेशेवर थियेटर के लिये जरूरी होता है। हिन्दी रंगमंच में सामाजिक सरोकार को लेकर अच्छे नाटक इन दिनों खेले जा रहे हैं लेकिन उनका प्रदर्शन नाट्य समारोहों तक ही सीमित है। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि ऐसे नाटकों को पेशेवर तरीके से अधिक से अधिक दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाये और पार्टटाइम एक्टर्स को फुलटाइमर बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाये। दौलत वैद का यह मानना मुझे अच्छा लगा कि नाटक में अभिनय के अलावा भी लाइटिंग, सेट डिजाइनिंग, एकरिंग सहित बैकस्टेज के काम से रंगकर्मी अपना भविष्य मजबूत बना सकता है। स्टेज मैनेजमेंट के क्षेत्र में काफी डिमांड है। उनका यह विश्वास बेहद आश्वस्ति प्रदान करने वाला है कि आज यदि कोई रंगमंच. से जुड़ा हुआ है तो रंगमंच उसे भूखा नहीं रहने देगा। यहां यह बताना मैं जरूरी समझता हूँ कि दौलत वैद रंग निदेशक के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लाइट डिजाइनर भी हैं।

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