nayaindia PM Modi Dhyan Yatra ‘ध्यान’ की पंचवर्षीय योजना का उपसंहार
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‘ध्यान’ की पंचवर्षीय योजना का उपसंहार

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‘ध्यान’ अगर ‘ध्यान’ है तो उसे मतदान के अंतिम चरण की पूर्व संध्या से शुरू कर मतदान ख़त्म होने पर ख़त्म करना ही क्यों ज़रूरी है? ध्यान अगर ‘ध्यान’ पर है और चुनाव पर नहीं तो फिर तो ‘ध्यान’ कभी भी, कहीं भी, किया जा सकता है। उस के लिए विवेकानंद शिला की ही क्यों ज़रूरत है, उस के जीवंत प्रसारण की क्यों ज़रूरत है, उसे मंचीय स्वरूप देने की क्यों ज़रूरत है? पांच बरस पहले केदारनाथ की गुफ़ा में बैठ कर भी अपने ‘ध्यान’ का जीवंत प्रसारण नरेंद्र भाई ने कराया था। .. नरेंद्र भाई के ‘ध्यान’ की यह पंचवर्षीय योजना आप को गुदगुदाती है या नहीं, मैं नहीं जानता, मगर मैं तो इस से ऐसा पुलकित हूं कि ख़ुद भी ध्यान-तरंगों पर सवार हो गया हूं। 

 ‘ध्यान’ लगा कि नहीं, मालूम नहीं। विवेकानंद शिला पर ध्यान-मुद्रा में बैठे अपने प्रधानमंत्री को देख कर देशवासी कितने गदगद हुए, कितने नहीं, यह भी नहीं मालूम। हां, नरेंद्र भाई मोदी के मुरीदों को ज़रूर उन के ‘ध्यान’ से अपनी भुजाएं फड़काने का मौक़ा मिल गया। बाकी सब के मन में तो यही सवाल रहा कि ‘ध्यान’ अगर ‘ध्यान’ है तो उसे मतदान के अंतिम चरण की पूर्व संध्या से शुरू कर मतदान ख़त्म होने पर ख़त्म करना ही क्यों ज़रूरी है? ध्यान अगर ‘ध्यान’ पर है और चुनाव पर नहीं तो फिर तो ‘ध्यान’ कभी भी, कहीं भी, किया जा सकता है। उस के लिए विवेकानंद शिला की ही क्यों ज़रूरत है, उस के जीवंत प्रसारण की क्यों ज़रूरत है, उसे मंचीय स्वरूप देने की क्यों ज़रूरत है? 

फिर जो नरेंद्र भाई ने किया, वह कौन-सा ‘ध्यान’ था? दृष्टा ध्यान था, श्रवण ध्यान था, प्राणायाम ध्यान था या भृकुटि ध्यान था? प्रधानमंत्री ज्योतिर्ध्यान कर रहे थे या कुंडलिनी ध्यान? वे अपने मन की चेतना को किस विशेष अवस्था में लाने के लिए ध्यान कर रहे थे? क्या वे करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता और क्षमा के गुणों को विकसित करने के लिए ध्यान कर रहे थे? पांच बरस पहले केदारनाथ की गुफ़ा में बैठ कर भी अपने ‘ध्यान’ का जीवंत प्रसारण नरेंद्र भाई ने कराया था। तो उस ‘ध्यान’ के बाद भी उन के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा में इन गुणों के विकास में कोई कमी रह गई है क्या कि दोबारा ‘ध्यान’ करना पड़ा? नरेंद्र भाई के ‘ध्यान’ की यह पंचवर्षीय योजना आप को गुदगुदाती है या नहीं, मैं नहीं जानता, मगर मैं तो इस से ऐसा पुलकित हूं कि ख़ुद भी ध्यान-तरंगों पर सवार हो गया हूं। 

क्या आप को लगता है कि ‘ध्यान’ के दौरान नरेंद्र भाई ने मुल्क़ के उन बुनियादी मसलों और सवालों पर ध्यान दिया होगा, जो दस बरस से हर गली-मुहल्ले में, हर खेत-खलिहान में खदक रहे हैं? अगर दिया होगा तो ‘ध्यान’ सचमुच सार्थक है, सकारात्मक नतीजे देने वाला साबित होगा और गुलाबी मौसम फ़ाइलों से बाहर निकल कर हमारे-आप के गालों पर उतर आएगा। लेकिन मेरे मन का यह संशय दूर होने का नाम ही नहीं ले रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री जी के ध्यान से जो बात एक दशक से उतरी हुई है, वह विवेकानंद शिला पर बैठ कर उन के ध्यान में तपाक से कैसे आ गई होगी? मूलभूत मुद्दों पर ध्यान देने का उन का स्वाभाव होता तो देश दस साल में इस हाल में आ जाता क्या? 

मैं यह घिसा-पिटा राग नहीं अलापना चाहता कि अपने दो कार्यकालों में नरेंद्र भाई ने एक भी संवाददाता सम्मेलन नहीं किया; कि उन्होंने विपक्ष को विपक्ष नहीं समझा; कि उन्होंने पराए-तो-पराए अपनी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असहमत तबके को भी ठेंगे पर रखा; और उन्होंने ‘मस्तराम मस्ती में, आग लगे बस्ती में’ के बीज-मंत्र का अनुपालन किया। जब मैं इस खटराग से दूर रहना चाहता हूं तो फिर यह प्रश्न पूछने का तो कोई हक़ मुझे है ही नहीं कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने 2024 के चुनाव प्रचार के 72 दिनों में जो 272 सवाल प्रधानमंत्री जी से पूछे, उन में से एक का भी जवाब उन्होंने क्यों नहीं दिया? जवाब उन के पास थे नहीं या जवाब देना उन्हें अपनी हेठी लगा? 

प्रसंगवश आप को यह बताए बिना मुझ से रहा नहीं जा रहा है कि कांग्रेस के ये 272 सवाल देश के हर राज्य और हर ज़िले में केंद्र सरकार की नाकामयाबियों का सजिल्द दस्तावेज़ हैं। कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश के बारे में 7 सवाल पूछे, अरुणाचल प्रदेश के बारे में 1 सवाल किया, असम को ले कर 3 सवाल उछाले और बिहार पर 21 सवाल पूछे। नरेंद्र भाई ने एक का भी उत्तर नहीं दिया। छत्तीसगढ़ से संबंधित 8, दिल्ली से संबंधित 11, गोवा से संबंधित 3 और गुजरात से संबंधित 6 सवालों के भी नरेंद्र भाई के पास शायद कोई जवाब नहीं थे। 

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री जी से हरियाणा को ले कर 6, हिमाचल प्रदेश के बारे में 4, जम्मू-कश्मीर पर 4 और झारखंड से संबंधित 14 प्रश्न किए। एक का भी कोई उत्तर देना प्रधानमंत्री जी ने ज़रूरी नहीं समझा। कर्नाटक के बारे में पूछे गए 13, केरल से जुड़े 4, लद्दाख के 4 और मणिपुर के बारे में पूछे गए 3 सवालों की भी नरेंद्र भाई ने सरेआम अनदेखी कर दी। 

मध्यप्रदेश के 16 मसलों पर कांग्रेस ने सवाल किए और महाराष्ट्र के 30 मसलों पर। नरेंद्र भाई के कानों पर जब इन से कोई जूं नहीं रेंगी तो भला मेघालय, मिज़ोरम और नगालैंड के बारे में पूछे गए एक-एक सवाल को वे क्यों कर तवज़्जो देते? ओडिशा के बारे में पूछे गए 8, पंजाब के 7, राजस्थान के 9 और सिक्किम को ले कर पूछे गए 3 प्रश्नों को भी उन्होंने इसी अंदाज़ में दरकिनार कर दिया। तमिलनाडु से जुड़े 7, तेलंगाना के 9, त्रिपुरा के 3, उत्तराखंड के 5 और उत्तर प्रदेश के 39  और पश्चिम बंगाल से संबंधित 20 सवालों को भी नरेंद्र भाई ने उठा कर ताक पर रख दिया। 

सो, काहे का तो विपक्ष और उस में भी काहे की कांग्रेस। नरेंद्र भाई जानते हैं कि सियासत में बट्ठर किस तरह बने रहा जाता है। ऐसे अगर एक-एक सवाल का जवाब देते फिरें तो फिर चल गई हुकूमत। राज-काज चलाना है तो सब से पहला काम सवालों से दूरी बनाने का ही करना होता है। प्रश्नों से गलबहियां करेंगे तो उनके उत्तर खोजने होंगे। उत्तर खोजेंगे तो कई परतें उघड़ेंगी। परतें उघडेंगी तो हल्ला मचेगा। हल्ला मचेगा तो माहौल खराब होगा। माहौल खराब होगा तो सिंहासन हिलेगा। तो ऐसे काम की शुरुआत ही क्यों करना, जिस में सिंहासन हिलने-उखड़ने का अंदेशा मौजूद हो! 

तो नरेंद्र भाई ने अपनी तरफ़ से चाक-चौबंद हो कर दस साल गुज़ारे। मगर जब आप सवालों के समय पर जवाब नहीं देते हैं, बहरे बन कर उन्हें किनारे करते जाते हैं तो सवाल भी कोई गूंगे तो होते नहीं हैं। वे किनारे पड़े-पड़े एक-एक कर इकट्ठे होते जाते हैं। वे एक-दूसरे का हाथ थामे बरसों चुपचाप पड़े रहते हैं। आप की भेजी गर्मी-सर्दी-बरसात झेलते रहते हैं। फिर एकाएक एक सुबह वे प्रश्न-श्रंखला बन आप के सामने पवर्ताकार खड़े हो जाते हैं। आप की रायसीना पहाड़ी उस पर्वत के सामने बौनी हो जाती है। आप की हुकूमत का टीला सवालों की कंचनजंघा के सामने दरकने लगता है। 2024 के जून का पहला सप्ताह कुछ इसी तरह के दृश्यों से रू-ब-रू होता दीख रहा है। 

272 तो छोड़िए, सल्तनत तो कई बार एक सवाल से भी ढह जाती है। कांग्रेस के 272 सवालों को भी छोडिए, देशवासियों के मन में दो हज़ार बहत्तर, बीस हज़ार बहत्तर और बीस लाख बहत्तर सवाल घुमड़ रहे होंगे। ये सवाल जब पत्थरों से टकरा कर बिना जवाब लौट आते हैं तो क्या कोने में बैठ कर अकेले रोते रहते होंगे? मुझे नहीं लगता कि प्रश्न रो-रो कर ख़ामोश हो जाने के लिए जन्म लेते हैं। उन के आंसू कभी बेकार नहीं जाते। देखें, इस बार क्या होता है!

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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