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दुनिया में अलग ही चिंताए

दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर बहुत कुछ हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि एआई का जो खतरा दूर भविष्य में बताया जा रहा था वह अभी आ गया है। सारे दिग्गज इसे लेकर चिंतिंत हैं और इस क्षेत्र के तीन सबसे बड़े लोगों सैम ऑल्टमैन, डारियो आमोदेई और इलॉन मस्क ने इसके विकास की रफ्तार कम करने की जरुरत बताई है। सबको लग रहा है कि बहुत जल्दी यह इंसान के नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। पिछले दिनों एआई ने जो किया उससे लोगों की चिंता और बढ़ी है। एआई ने अपने को इंसान बता कर अपने लिए नियमों में छूट मांगी, जिस काम से रोका गया वह काम किया और उसे छिपाने के लिए लेयर क्रिएट किए, दूसरे एआई एजेंट्स को मैसेज करके संपर्क किया, इन घटनाओं ने दुनिया के टेक दिग्गजों को न हैरान कर दिया है। उनको इस बात का खतरा दिख रहा है कि एआई आने वाले समय में इंसान के नियंत्रण से मुक्त हो जाएगा और मनमाने फैसले करने लगेगा। वह अपने को खुद से इम्प्रूव करने की क्षमता विकसित करने की दहलीज पर खड़ा है। इसके उभरते स्वरूप से घबरा कर कई दिग्गजों ने एआई की बड़ी कंपनियों से इस्तीफा दिया है।

इसके बावजूद अमेरिका और चीन में एआई को लेकर नए रिसर्च हो रहे हैं। उनका इस्तेमाल करके दुनिया की पुरानी समस्याओं को सुलझाने के प्रयास हो रहे हैं। उससे उत्पादकता बढ़ाने और लोगों का जीवन स्तर बेहतर करने के उपाय भी हो रहे हैं। पिछले दिनों खबर आई कि एआई ने गणित के दशकों पुरानी एक समस्या को सुलझा दिया या किसी बड़े सर्च इंजन का ऐसा बग पकड़ लिया, जिसे कोई इंसान नहीं पकड़ पाया था। एंथ्रोपिक का माइथोस दुनिया के किसी भी कंप्यूटर या उपकरण को हैक करने की क्षमता वाला है।

एक तरफ एआई बनाने वाले अमेरिका के वैज्ञानिक और कारोबारी हैं, जो इसके सकारात्मक इस्तेमाल से मानवता को बदलने और खुद पैसा कमाने में लगे हैं तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया और दूसरे इस्लामिक देशों को आतंकवादी हैं, जो एआई की मदद से परमाणु बम बनाने से लेकर रासायनिक हथियार तक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ समय पहले यह बात सामने आई थी कि एआई के टॉप म़ॉड्यूल का इस्तेमाल करके पश्चिम एशिया में किसी जगह एक समूह ने रासायनिक हथियार बनाने का प्रयास किया।

सोचें, यह एआई बनाने वाले का दुःस्वप्न है। वे अपने यहां केमिकल वेपन के एक्सपर्ट भरती कर रहे हैं ताकि एआई को इसे बनाने या किसी भी प्वाइंट पर इसका इस्तेमाल करने से रोका जा सके। इतना ही नहीं दुनिया की बड़ी एआई कंपनियां अपने मॉड्यूल को दर्शनशास्त्र और नैतिकता के पाठ पढ़वा रहे हैं। हालांकि उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि मशीन सीखेगी वही जो वह देख रही है। उसका आचरण वैसा ही होगा, जैसा आचरण करते हुए वह इंसानों को देख रही है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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