दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के बाद छात्रों ने झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी राज्य चयन आयोग यानी जेएसएससी की परीक्षा में पेपर लीक और धांधली के खिलाफ आंदोलन किया। इस आंदोलन से पहले परीक्षा की दर्जनों गड़बड़ियां पकड़ी गई थीं। उसके बाद आंदोलन हुआ। अभी तक इस आंदोलन का कुल जमा हासिल यह है कि सरकार बैकफुट पर नहीं है। उलटे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी सहयोगी पार्टियों ने अपने पक्ष में माहौल बना दिया। सरकार में शामिल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चिट्ठी लिखी। उसके बाद हेमंत सोरेन ने छात्रों की सारी मांगें मानने का ऐलान किया। जश्न मनाते हुए छात्र आंदोलन से उठ गए और उसके बाद हाई कोर्ट ने परीक्षा रद्द करने के सरकार के फैसले पर रोक लगा दी। यानी चित भी सरकार और पट भी सरकार की।
भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास आंदोलन कर रहे छात्रों से मिलने पहुंचे थे। भाजपा के कुछ नेताओं ने अनशन शुरू करने का ऐलान किया था। 10 अगस्त को विधानसभा मार्च के समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू भी सक्रिय दिख रहे थे। भारतीय जनता युवा मोर्चा के लोग भी कई जगह दिखे। लेकिन इस आंदोलन से सरकार की छवि को प्रभावित नहीं कर सके। इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा या कांग्रेस के वोट आधार पर कोई असर हुआ नहीं दिख रहा है। उलटे भाजपा नेताओं के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने से आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर हुई।
सोचें, दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करा दिया। पूरा आंदोलन ही शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए हुआ था। लेकिन झारखंड में इस्तीफे की बात ही नहीं उठी। ध्यान रहे राज्य में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद शिक्षा मंत्री हैं और कार्मिक विभाग भी उनके पास ही है, जिसके तहत जेपीएससी और परीक्षा कराने वाले दूसरे आयोग आते हैं। लेकिन किसी ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं की और न उसका दबाव बनाया। सोचें, यह कितना बड़ा मामला है कि जेपीएससी के चेयरमैन, जो अभी ठीक एक साल पहले राज्य के मुख्य सचिव भी थे उनका इस्तीफा हुआ और वे गिरफ्तार हुए। जेपीएससी के तीन सदस्यों के इस्तीफे हुए और पूरा आयोग भंग हो गया। लेकिन एक बार भी आंच मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बहुत होशियारी से सहयोगी पार्टियों को साथ बनाए रखा और आंदोलन के अंदर कई गुट बनवा दिए। इसलिए भी यह आंदोलन बहुत असरदार नहीं हुआ क्योंकि अलग अलग पार्टियों और नेताओं के समर्थन वाले समूह आंदोलन कर रहे थे। छात्रों के कई गुट सरकार से वार्ता कर रहे थे। इससे भी सरकार के लिए मोलभाव करना आसान रहा। सरकार को पता था कि रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से यानी पीछे जाकर परीक्षाएं रद्द करेंगे तो अदालत उस पर रोक लगा देगी और इससे सफल व असफल अभ्यर्थियों के अलग अलग गुट बनेंगे। इसलिए हेमंत सोरेन की सरकार ने आंदोलन को चलने दिया और जब पिछली परीक्षाओं को रद्द करने का माहौल बन गया तो परीक्षाएं रद्द करके वाहवाही करा ली। बाद में हाई कोर्ट ने पहले की परीक्षाएं रद्द करने के फैसले पर रोक लगा दी। पहले की परीक्षा रद्द होने से जो सफल अभ्यर्थी बेरोजगार हो रहे थे वे सरकार से ज्यादा भाजपा से सवाल पूछ रहे हैं कि उसने पहले की परीक्षाएं रद्द करने की मांग क्यों उठवाई।
कुल मिला कर एक विपक्षी राज्य में छात्रों का आंदोलन हुआ और भाजपा उसका भी कोई लाभ नहीं उठा सकी।
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि झारखंड में भाजपा संगठन में कोई दम ही नहीं बचा है। सब कुछ सरकार, केंद्रीय एजेंसियों और न्यायपालिका के जरिए होना है। झारखंड भाजपा के नेता अब भी इस उम्मीद में हैं कि अदालत सीबीआई जांच की इजाजत दे देगी तो उसमें जेएमएम के नेता और अधिकारी फंसेंगे। लेकिन सवाल है कि उससे होगा क्या? हेमंत सोरेन को जेल भेज कर भी देख लिया। वे जेल गए तो उनकी सीटें उलटी और बढ़ गईं। इसलिए सीबीआई जांच से भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ नहीं होगा। भाजपा के नेता आंदोलन करके राजनीतिक लड़ाई लड़ने की बजाय केंद्रीय एजेंसियों की जांच के सहारे हेमंत सोरेन को गिराने की उम्मीद लगाए हुए हैं। इस बीच उन्होंने खान व खनिज के प्रबंधन के लिए लाए गए केंद्र के नए कानून के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर दी है। कानूनी और राजनीतिक दोनों तरह की लड़ाई कांग्रेस और जेएमएम लड़ेंगे। ऐसा न हो कि सरकार को यह कानून भी वापस लेना पड़े।
