Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

विदेश में लुढ़कता रुपया पर भारत में महंगा!

सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने रेपो दर 5.25 से बढ़ा कर 5.50 प्रतिशत कर दी। मतलब भारतीयों के लिए ब्याज दर बढ़ाई। जबकि कल, गुरुवार को प्रति डॉलर, रुपया 96.78 पर था। मेरा मानना है साल के आखिर तक यह रेट सौ पार होगी। अंतर देखें, विडंबना समझें कि जिस रुपए को भारतीय नागरिक कर्ज़ लेकर इस्तेमाल करता है, वह महंगा हो रहा है। जबकि उसी रुपए की अंतरराष्ट्रीय ख़रीद-शक्ति लगातार घटती हुई है। बतौर उदाहरण समझें किसी परिवार ने 50 लाख रुपए का घर कर्ज़ 20 वर्ष के लिए लिया है। यदि ब्याज 8.5 से बढ़ कर 8.75 प्रतिशत हो जाए और शेष अवधि 20 वर्ष हो, तो मासिक किस्त लगभग 43,391 रुपए से बढ़ कर 44,186 रुपए होगी। यानी लगभग 795 रुपए हर महीने बढ़ेगी।

ठीक दूसरी तरफ उसी परिवार का बच्चा यदि विदेश में पढ़ रहा हो तो डॉलर के महंगे होने से उसकी पढ़ाई और रहन-सहन का खर्च भी बढ़ेगा। मतलब एक ही परिवार पर घरेलू ब्याज और विदेशी मुद्रा, दोनों का दोतरफा दबाव।

ऐसी इकोनॉमी का एक और सत्य कि एक तरफ़ सरकार विकास, निवेश और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की हवाबाजी कर रही है। वहीं रिज़र्व बैंक को रुपए को सहारा देने के लिए घरेलू ब्याज दर बढ़ानी पड़ रही है। इतना ही नहीं भागती विदेशी पूंजी से विदेशी मुद्रा कोष में घटते डॉलर या तेल आयात में डॉलर की आवश्यकता के तकाजे में भारत सरकार (रिज़र्व बैंक) ने प्रवासी भारतीयों से अधिक आकर्षक ब्याज दरों के साथ डॉलर का कलेक्शन किया है।

हां, यह फैसला इसी 2026 का है। इससे पहले ऐसा आपातकालीन निर्णय 1991 के भुगतान संकट में हुआ था। उसके बाद 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद तथा 2013 में रुपए पर दबाव बढ़ने की सूरत में एफसीएनआर (बी) जमा योजना के कदम से उठा था। जबकि आज सरकार का यह घर-घर पहुंचा नैरेटिव है कि भारत विकसित हो रहा है। दौड़ रहा है। सबको पछाड़ दिया केवल अमेरिका व चीन को पछाड़ना बाकी है, जिन्हें मोदीजी 2047 में पछाड़ देंगे।

गौर करें तथ्यों पर। आठ जून 2026 को रिज़र्व बैंक ने विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष एफसीएनआर (बी) स्वैप सुविधा शुरू की। कैसे एनआरआई भारतीयों को ललचाया? भारतीय बैंकों को प्रवासी भारतीयों से तीन से पांच वर्ष की विदेशी करेंसी, डॉलर जमा आकर्षित करने की स्कीम दी गई। ब्याज की सामान्य सीमा में छूट, ज्यादा ब्याज देने और रिज़र्व बैंक ने संबंधित विदेशी करेंसी जोखिम की हेजिंग लागत उठाने की व्यवस्था करके।

नतीजतन कुछ बैंकों ने तो डॉलर जमा कराने के लिए जमा दरें लगभग छह से सात प्रतिशत तक की। सरकार ने 24 अगस्त को घोषणा की कि लगभग ग्यारह सप्ताह में 73 अरब डॉलर भारतीय बैंकों ने जुटाए। इनमें 65.4 अरब डॉलर एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट एकत्र हुई। मतलब भारत का विदेशी मुद्रा कोष भरा। हिसाब से इससे भारत का रुपया मजबूत होना चाहिए। जब भारत के पास करेंसी रिजर्व है तब रुपया क्यों लुढ़के? विदेशी निवेशकों का भी भरोसा बनना या लौटना चाहिए था।

लेकिन विदेशियों ने याकि दुनिया ने भारत के शेयर बाजार (इकोनॉमी) को जस का तस भारी जोखिम का ठिकाना माने रखा। उनका पैसा निकालना थमा ही नहीं। परिणाम क्या है? कोई 133 अरब डॉलर के बड़े विदेशी मुद्रा जमा जुटाने के बाद भी रुपया अक्टूबर में 97 प्रति डॉलर के करीब है?

जाहिर है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत पर भरोसा लौट नहीं रहा। सरकार, रिज़र्व बैंक कितना ही दम लगा लें अपने आयात बिल, महंगा तेल, वैश्विक ब्याज दरें, दुनिया की दूसरी इकोनॉमी (भले वे भारत जैसे फुलाए विकास आंकड़े न दें) के ठोस विकास का जवाब नहीं दे सकते। भारत और भारतीय कंपनियों की कमाई को साल-डेढ़ साल से वैश्विक निवेशक तौलते-तौलते उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जिससे खोखलापन जगजाहिर है। तभी दुनिया के नंबर एक खरबपति (जिसकी बात, उत्पादकता, सनक का हर शब्द दुनिया सुनती है) इलॉन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कल भारत से पूछा, ‘क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत आए, ताकि उनका एकछत्र राज बना रहे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं…’। मस्क ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है।

Exit mobile version