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हिंदू बेघर है, मात्र भीड़ है!

New Delhi, Dec 06 (ANI): Passengers wait at Terminal 1 of the Indira Gandhi International Airport as IndiGo’s flight disruptions continue nationwide, in New Delhi on Saturday. (ANI Photo)

मोदी सरकार ने गजब सवाल पैदा किया है? कौन है भारत का नागरिक? क्या नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत भारत के नागरिक हैं? इनके पास अपने को भारत का नागरिक प्रमाणित करने के क्या प्रमाण हैं? सोचें, हिंदुओं की इस जमात पर। इन्होंने संसद, विधानसभाओं, संस्थाओं में पहले तो वंदे मातरम् का गान अनिवार्य बनाया और फिर अब बता रहे हैं कि किसी के भी पास नागरिक होने का पक्का दस्तावेज नहीं है। मुझे गलतफहमी थी कि मेरे पास पासपोर्ट है तो यह अनिवार्यतः मेरे भारत का नागरिक होने का पक्का, ठोस दस्तावेज है। आखिर पासपोर्ट में पुलिस जांच-पड़ताल के बाद नागरिक होने की पुष्टि में जन्मस्थान, तारीख, परिवार, वंश लिखे हुए होते हैं। दुनिया के एयरपोर्टों में इसे ही भारत के नागरिक होने का दस्तावेज मानते हैं।

अब मोदी सरकार ने बताया है कि पासपोर्ट भी नागरिकता का सबूत नहीं है। सोचें, 15 अगस्त 1947 के बाद की स्वतंत्र भारत की भीड़ पर। लोग राशन कार्ड बनाने की कतार में खड़े हुए थे। पैन कार्ड बनाया था। इनकम टैक्स दिया। पासपोर्ट बनवाया। वोटर लिस्ट में नाम लिखवाया। आधार कार्ड बनवाया लेकिन कोई नागरिकता का अंतिम प्रामाणिक दस्तावेज नहीं।

पिछले बारह वर्षों के संघ राष्ट्रवाद का अनुभव सुनें। हर हिंदू के दिमाग में पैठाया गया कि यह मातृभूमि है। भारत माता है। इसलिए वंदे मातरम् बोलो। भारत की मिट्टी पर गर्व करो। यही तुम्हारा सनातन घर है। लेकिन अब हर हिंदू के आगे यह सत्य है कि वह बिना वैध प्रमाण के भारत में रह रहा है। उसके पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे माना जाए कि वह भारत का नागरिक है। यदि पासपोर्ट नहीं, आधार कार्ड नहीं, वोटर कार्ड भी अंतिम प्रमाण नहीं, तो आखिर भारत में जन्म लिए व्यक्ति की नागरिकता का निर्विवाद दस्तावेज़ कौन सा है? इसी भूमि में जिस व्यक्ति का जन्म हुआ, जिसकी पीढ़ियां यहीं पैदा हुईं, जिसने इसी देश में टैक्स दिया, वोट दिया, सेना में भर्ती हुआ, अदालतों में मुकदमे लड़े, सरकारें चुनीं, वह अपने ही देश में किस कागज से सिद्ध करे कि यह उसका घर है?

दशकों से संघ परिवार और भाजपा ने हिंदू समाज को बताया है कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, माता है। राष्ट्रभक्ति केवल संवैधानिक निष्ठा नहीं, सांस्कृतिक आस्था है। वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, सांस्कृतिक (राष्ट्रीय) चेतना है। यदि ऐसा है, तो वही राष्ट्र अपनी संतानों को संतान होने का प्रमाण क्यों नहीं देता? बार-बार प्रमाण क्यों मांगता है? क्या मातृभूमि अपने ही बेटे से कहेगी कि पहले अपनी पहचान साबित करो कि तुम मेरे ही बेटे हो? जाहिर है मसला मात्र प्रशासनिक, नौकरशाही का नहीं है बल्कि सभ्यता-संस्कृति का है।

हम हिंदू भारत की मिट्टी से सभ्यतागत पहचान लिए हुए हैं। इस रियलिटी में राष्ट्र, स्टेट, राज्य का अर्थ जीरो है? सोचें, मनुष्य पहले पैदा हुआ या राज्य? धर्म-सभ्यता पहले है या 1950 में बना भारत गणराज्य पहले? भारत, भारत नेशन ने समाज नहीं बनाया। तब राष्ट्र कौन होता है जो अपने को नागरिकता का मालिक मान कर कह रहा है कि इस मिट्टी में रहने की अधिकारिता के नागरिक पुष्टि प्रमाण के लोग रह रहे हैं। वंदे मातरम् का संबंध आखिर किससे है, भूमि से, राज्य से या नागरिक से या अफसरों से चल रहे गृह मंत्रालय से?

सोचें, भारत अपने ही लोगों को भीड़, लावारिस भेड़-बकरी करार दे रहा है। उसे जन्मभूमि में जन्मे लोगों के लिए वह प्रामाणिक दस्तावेज चाहिए जो किसी के भी पास नहीं है!

मेरा मानना है कि इस बेतुकी बहस से भारत में नागरिकता के मालिक गृहमंत्री अमित शाह अब मंत्रालय में नागरिकता कार्ड बनवाने का नया तामझाम बनवाएंगे। कौन नागरिक है, कौन नहीं कि बहस पैदा कर हिंदू बनाम मुस्लिम राजनीति का वह नया राजनीतिक धंधा बनाएंगे जिससे अगले दस-बीस साल और भगवा राजनीति खिली रहे। आगे की 160 करोड़ लोगों की भीड़ भय, भूख, भक्ति के नए-नए कीर्तनों में फंसे। भारत 21वीं सदी में पूरी तरह कॉकरोच अवस्था में दुनिया का आश्रित, परजीवी मुल्क बना रहे।

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