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आर्थिकी के खोखे का सकंट काउंटडाउन!

ट्रंप

अमेरिका-ईरान की जंग का आज साठवां दिन है। मैंने पहले दिन ही ‘कितने सप्ताह, कितने महीने चलेगी लड़ाई’ का सिनेरियो बताया था। उसके दो महिने बाद शुक्रवार सुबह ईरान के नए अयातुल्लाह का बयान था कि हमसे अमेरिका की ‘शर्मनाक हार’ हुई है। वहीं ट्रंप ने आगे के सैनिक ऑपरेशन के विकल्पों पर विचार किया तो होर्मुज़ खाड़ी की नाकेबंदी जारी रखने की घोषणा भी की। ट्रंप ने ईरान की संवर्धित यूरेनियम व मिसाइल उत्पादन क्षमता को मिटाने का उद्देश्य बताया। सो, तय है ट्रंप और ईरान अड़े रहेंगे। यूक्रेन-रूस के गतिरोध जैसी लंबी स्थिति। आज खबर थी कि पाकिस्तान ने ईरान के लिए दस सड़क रास्ते खोले हैं। (सोचें, चीन-रूस के कार्गो जो सकेंगे तो पाकिस्तान को ईरान से चुपचाप ईंधन सप्लाई भी संभव)। जाहिर है अमेरिका, ईरान, चीन और खाड़ी के देशों के बतौर पंच पाकिस्तान अपने हितों का ताना-बाना बुनता हुआ है।

यें सच्चाईंयां भारत की आर्थिकी के कड़के होने का नया काउंटडाउन है। भारत ने साठ दिन इस उम्मीद में गुजारे कि जल्दी सब ठीक हो जाएगा। सरकार ने झूठ, जुगाड़, गैस-पेट्रोल-डीजल के रिजर्व की सप्लाई में भ्रम बनाया कि भारत में सब ठीक है। यों वैश्विक बाजार में सस्ते क्रूड के बावजूद 12 वर्षों से 140 करोड़ लोगों को लगातार महंगा तेल बेचने का मोदी सरकार ने वैश्विक रिकॉर्ड बना रखा है। पर मोदी सरकार ने जो पैसा कमाया उनसे तेल भंडारण की इमारते या कि घोषित क्षमताएं भी नहीं बनाई लेकिन दिल्ली में पत्थरों की नई इमारते, संसद भवन, सचिवालय बिल्डिगें, प्रधानमंत्री निवास का किला जरूर बना डाला। ऐसे ही शेयर बाजार को उछाले रखने के लिए बचत स्वाहा और वास्तविक पूंजीगत निवेश भगवान भरोसे।

आर्थिक आंकड़ों के गोलमाल में सामान्य दिखती हुई है। सो, ट्रंप को छींक आती है या वैश्विक संस्थाएं बोलती हैं तो उसी अनुसार शेयर बाजार, आर्थिक आंकड़ेबाजी, जुमलेबाजी की हेडलाइंस बनती हैं! मतलब न्यूयॉर्क में शेयर मार्केट ऊंचा खुला तो भारत का बाजार भी उछलेगा!

जबकि हकीकत है कि न अपने सेंसेक्स-निफ्टी की कंपनियों की सेहत, उत्पादकता में अमेरिकी नास्डैक या डॉउ जोन्स जैसी ठोस बुलंदी है और न शंघाई-टोक्यो के बाजारों जैसी उत्पादकता, वित्तीय हैसियत का कोई तत्व-सत्व है। पिछले 12 वर्षों में भारत का पूंजी बाजार पूरी तरह सटोरियों से, सटोरियों के लिए तुरत-फुरत मुनाफे-नुकसान के खातिर का है। वह उतना ही खोखला व आश्रित खोखा है, जैसी भारत की आर्थिकी है!

अमेरिकी शेयर बाजार इस सप्ताह बुलंदी पर थे। खाड़ी जंग के बावजूद अमेरिकी शेयर उछलते हुए हैं क्योंकि नई अमेरिकी एआई कंपनियों से लेकर एपल कंपनी के मुनाफे, प्रोजेक्शन, पूंजीगत निवेश के आंकड़े रिकॉर्ड तोड़ हैं। लेकिन अमेरिकी शेयर बाजार की तेजी के हवाले भारत के सटोरिए भी बाजार में हवा बनाते रहते है कि देखो खाड़ी की जंग का असर नहीं है!

पर भारत का रुपया, विदेश व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार सब खाड़ी जंग के असर को जतलाते हुए हैं। अब चुनाव खत्म है और दो महिने बाद आर्थिकी के सरकार को फैसले लेने होंगे। आखिर आगे नवंबर से चुनावों का नया सिलसिला शुरू होगा। मतलब मई के इस महीने से अक्टूबर का ही समय आर्थिकी के कड़े निर्णयों का है। यह कहते हुए लोगों की जेब काटनी है, महंगाई का आदी बनाना है कि मोदीजी मजबूर हैं। देशवासियों महंगाई को अपनाओ, मोदी को बढ़ाओ! दाल-रोटी खाओ, मोदी के गुण गाओ!

यों दाल-रोटी की नियति गुलामी काल से है। पर इस बार दाल भी महंगी होगी। दशकों बाद किसानी संकट होगा। इस साल की फसल में किसान को खाड़ी की सप्लाई रुकने से खाद, उर्वरक, कीटनाशक सभी का टोटा होना तय है।

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