ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर वैसे तो पूरी दुनिया पर पड़ा है लेकिन भारत सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इसका कारण यह है कि भारत अपनी ईंधन जरुरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। पहले भी 2019 में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान पर पाबंदी लगाई तो भारत ने उसे छोड़ कर रूस से तेल खरीदना शुरू किया। अब रूस के ऊपर भी पाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। उधर ईरान और अमेरिका में युद्ध छिड़ जाने से होर्मुज की खाड़ी बंद हो गई और पश्चिम एशिया के दूसरे देशों से होने वाली आपूर्ति भी प्रभावित हुई। भारत अभी रूस से तेल खरीद कर और अमेरिका से एलएनजी व एलपीजी खरीद कर काम चला रहा है। वेनेजुएला का तेल भी सबसे ज्यादा भारत पहुंच रहा है। दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले भारत का आयात ज्यादा है। रूस से भी आयात ऑल टाइम हाई पर है। असल में भारत अपनी जरुरत का 90 फीसदी ईंधन आयात कर रहा है।
सोचें, प्रधानमंत्री बनने के करीब दो साल के बाद सात फरवरी 2016 को ओडिशा के पारादीप में इंडियन ऑयल की एक रिफाइनरी का उद्घाटन करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत ईंधन की जरुरतों के लिए आयात पर निर्भरता कम करेगा। उन्होंने वही पर लक्ष्य तय किया था कि भारत जब अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा तब ईंधन आयात में 10 फीसदी की कमी हो जानी चाहिए। इसके मुताबिक 2022 तक भारत को अपने आयात में 10 फीसदी की कटौती करनी थी। आज स्थिति यह है कि भारत के आयात में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है। पहले भारत अपनी जरुरत का 80 फीसदी आयात करता था और 20 फीसदी के करीब स्वंय उत्पादित करता था। आज अपनी जरुरत का 90 फीसदी आयात करता है। भारत ने न तो उत्पादन की क्षमता बढ़ाई है और न स्टोरेज की क्षमता में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। ध्यान रहे चीन के पास 10 महीने से एक साल तक की जरुरत का कच्चा तेल जमा है, जबकि भारत की स्टोरेज क्षमता 45 दिन की है।
दुनिया के बड़े देशों के बात करें तो उनमें से किसी के यहां ईंधन या उर्वरक का संकट वैसा नहीं है, जैसा भारत में है। चीन भी अपनी जरुरत का ज्यादातर ईंधन आयात करता है लेकिन उसने एक तो भारत की तरह सरेंडर नहीं किया और दूसरे उसके पास स्टोरेज की क्षमता बहुत बड़ी है। ध्यान रहे अमेरिका ने ईरान पर पाबंदी लगाई तो भारत ने पूरी निष्ठा से उस पाबंदी का पालन किया और तेल खरीदना बंद कर दिया लेकिन चीन तेल खरीदता रहा। अमेरिकी पाबंदी के बावजूद उसका 90 फीसदी तेल चीन ने खरीदा। चीन बहुत सस्ता तेल रूस से भी खरीदता रहा। इन दोनों देशों से सस्ता कच्चा तेल खरीद कर उसने स्टोर किया। उसके पास 10 महीने से लेकर एक साल तक की स्टोरेज क्षमता है। चीन की तरह ही रूस के सामने भी कोई समस्या नहीं है और वह भूराजनीतिक स्थितियों से अप्रभावित है। उधर अमेरिका पहले से दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश था और अब तो उसने वेनेजुएला के तीन सौ अरब बैरल तेल के रिजर्व पर भी कब्जा कर लिया है।
