एक एक करके इस देश की हर संस्था की साख खत्म होती जा रही है और संस्थाओं के ऊपर से लोगों का भरोसा समाप्त है, और इसका नया आयाम कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की ओर से जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन शुरू हुआ घटनाक्रम भी है। ध्यान रहे देश दो चीजों पर भरोसे से चलता है। पहली चीज है इलेक्शन और दूसरी चीज है एग्जामिनेशन। इन दोनों पर भरोसे का संकट है। एक के बाद एक चुनाव जीतने की जिद में भाजपा ने ऐसे काम किए, जिनसे लोगों का भरोसा घटा। यह सिर्फ विपक्षी पार्टियों का मामला नहीं है। आम लोगों के मन में भी यह धारणा बैठ गई है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यह धारणा बनवाने में भाजपा का इकोसिस्टम भी समान रूप से जिम्मेदार है। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा भी इस धारणा को मजबूत करता है। भाजपा इकोसिस्टम के लोग अमित शाह की लार्जर दैन लाइफ छवि बनाने के लिए ऐसा प्रचार करते हैं कि वे जहां हाथ डाल देंगे वहां कामयाबी मिलेगी।
रील्स और वीडियो बना कर प्रचारित कराया जाता है कि वे जहां चाहेंगे वहां चुनाव जिता देंगे। पश्चिम बंगाल की जीत के बाद यह प्रचार तेज हुआ है। लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीट पर आ गई थी। लेकिन उसके बाद महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा और दिल्ली व बिहार में जैसे वह जीती है उससे भी लोगों के मन मे यह धारणा बैठी कि कुछ भी हो जाए भाजपा जीतेगी। इससे चुनाव आयोग के साथ साथ चुनाव की विश्वसनीयता प्रभावित हुई। भाजपा के लोग मजाक में ही सही लेकिन इस धारणा का प्रचार करते हैं कि वोट किसी को दीजिए, वह जाएगा भाजपा के खाते में और चुनाव कोई जीते सरकार भाजपा बनाएगी। इन बातों से समूची चुनाव प्रक्रिया संदेह के घेरे में आई है।
जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान जिस तरह से मीडिया के एक समूह ने प्रदर्शनकारियों को विलेन बना कर सरकार का एजेंडा चलाया उसने मीडिया की विश्वसनीयता को और कम किया। इससे पहले दूसरे प्रदर्शनों में भी ऐसा ही होता था परंतु किसान हों या शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी वे ‘जेन जी’ की तरह मुखर या सामने से प्रतिवाद करने वाले नहीं थे। लेकिन युवाओं ने प्रतिवाद किया और यह देखने को मिला कि उन्होंने मुख्यधारा की मीडिया को लगभग समूचे आंदोलन से बाहर रखा। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव बनाया या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ही आंदोलन की जगह बना दिया। कई मीडियाकर्मियों के साथ जंतर मंतर पर जो हुआ वह भरोसे की कमी का ही संकेत है।
प्रदर्शन समाप्त करने के लिए दो केंद्रीय मंत्रियों ने सीजेपी के प्रदर्शनकारियों से वार्ता की और उनकी सारी मांगें मान लीं लेकिन उसके बाद भी छात्रों और युवाओं पर कार्रवाई नहीं रूकी और अब सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश के बहाने छात्रों की श्रेणियां बना कर उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। प्रदर्शनकारियों में आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग अलग छांटे जा रहे हैं। नाबालिग और बालिग छात्रों की अलग श्रेणी बन रही है। ऐसे में छात्र या युवा किस पर भरोसा करेंगे?
उनका भरोसा न तो राजनीतिक नेतृत्व पर है और न अदालत पर। पुलिस या किसी और सुरक्षा एजेंसी पर उनका भरोसा नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व के कहने पर उनके साथ जैसा बरताव हुआ वह बहुत खराब था। बाद में उलटे पुलिस वालों के परिजनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस करा कर उनको विक्टिम और छात्रों को उपद्रवी साबित करने का प्रयास हुआ। सो, चाहे सरकार हो, सत्तारूढ़ दल हो, मीडिया हो, पुलिस या सुरक्षा बल हों या अदालत हो, छात्रों और युवाओं की नजर में किसी की साख नहीं बची। फिल्मों की साख पहले से नहीं थी लेकिन इन दिनों प्रोपेगेंडा फिल्मों का ऐसा दौर आया है कि उनके जरिए भी भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज का मजाक बनाया जा रहा है। उनकी भी साख दांव पर लगाई जा रही है। तब बचने या बचाने के लिए बचेगा क्या?
