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प्रदूषण, झूठ, नाउम्मीदी ही अब भारत नियति!

Aizawl, Sep 13 (ANI): Prime Minister Narendra Modi virtually flagged off the Bairabi-Sairang New Rail line, in Aizawl on Saturday. (DPR PMO/ANI Photo)

मणिपुर को लेकर एक ताज़ा रिपोर्ट ‘द इकोनॉमिस्ट’ में पढ़ी। इसका यह वाक्य मुझे ठिठका गया कि मणिपुर की अशांति को अलग और अधिक भयावह बनाने वाली बात उसके बाद का सन्नाटा (नाउम्मीदी, निराशा) है। यह अहम, पते की बात है। ध्यान रहे, मई 2023 में कुकी और मैतेई समुदायों में हिंसा हुई। तब से प्रदेश की आबादी दो अलग-अलग क्षेत्रों में बंटी हुई है। पचास हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। कुकी अलग और मैतेई अलग। तीन वर्ष से केंद्र सरकार इसे सहज, स्वाभाविक मान स्थितप्रज्ञ है। जबकि पहले भारत के सीमांत इलाकों में हिंसा होती थी, तब समय के साथ बनी थकान संवाद में बदलती थी, राजनीति से समझौता होता था। जबकि मई 2023 के बाद क्या है? सुरक्षा बलों ने भिड़ंत को रोका, पर मेल-मिलाप नहीं रचा। सो, मणिपुर में बंदूकें खामोश होने के बाद जो चुप्पी छाई, वह पहले के शोर से ज़्यादा बेचैन करने वाली है। यह वह चुप्पी, नाउम्मीदी है, जिसमें भय, शिकायत, घृणा सब पैठते हुए हैं। मतलब साझा नागरिक भविष्य, साथ-साथ रहने का विचार धीरे-धीरे ओझल होता जाता है।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के सत्ता के चश्मे ने बतौर एक राजनीतिक दल भाजपा और उसके नेताओं, मंत्रियों, से लेकर आरएसएस व भक्तों को स्थायी तौर पर ऐसा अंधा बनाया है कि उनकी आंखों के आगे सब कुछ हरा-भरा है। लोग प्रदूषण में जिएं या जहरीला पानी पिएं या डोनाल्ड ट्रंप हर दिन भारत को बेइज्जत करें या देश की अर्थिकी में गुलामी हो, मगर संघ परिवार के मोहन भागवत से लेकर मणिपुर में एन बीरेन सिंह तक सबको हरा-भरा अमृतकाल लगता है।

इस सप्ताह डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व को बताया कि भारत का प्रधानमंत्री उन्हें ‘सर, सर’ बोलकर उन्हें खुश रखते हैं, या उनके प्रशासन की भारत पर पांच सौ प्रतिशत टैरिफ की बात—ये सब 140 करोड़ लोगों के देश का अपमान हैं। पर मोदी सरकार की रीति-नीति क्या है? चुप्पी धारे रखो! कुछ न करो। समय गुजरने दो। मणिपुर में कुकी बनाम मैतेई से पहले अवसर बूझ भाजपा ने राजनीति की। सरकार बनाई और संघ परिवार ने तालियां बजाईं! अब करीब तीन साल से लोग अलग-अलग बंट गए हैं, तो उसकी चिंता नहीं। राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है और अब एक साल होने जा रहे हैं।ष ऐसे ही प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से पहले अवसर समझा। ‘अबकी बार ट्रंप’ के नारे लगाए। पर फिर अवसरवाद दिखाया, तो ट्रंप ऐसे बिदके कि भारत को विश्व राजनीति से बिदका दिया है। विदेश नीति नाउम्मीदी में वैसे ही सांस ले रही है, जैसे मणिपुर के लोग रह रहे हैं। वैसी ही स्थितियां हर क्षेत्र में हैं। दिल्ली या महानगरों के प्रदूषण पर गौर करें। सरकार ने जता दिया है कि उसके बस में कुछ नहीं है। अर्थिकी में भारत केवल बाजार बना है। भारत के 80-100 करोड़ नागरिक खैरात, सब्सिडी से जीवन जी रहे हैं, तो यह सब भी सत्ता के चश्मे में संघ परिवार के लिए हरे-भरे विकसित भारत का अमृतकाल है।

तभी विदेश नीति, सेना-सामरिक-भूराजनीति, अर्थिकी, शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध के तमाम बदहाल पहलुओं में नाउम्मीदी सर्वत्र है। हिंदू केवल अपनी सरकार होने के हरे चश्मे से आज में जी रहे हैं। सत्ता मंदिर में सुबह-शाम भगवानजी के दर्शन कर लिए, चुनाव जीत लिया, सत्ता का प्रसाद पा लिया—तो आज अमृतकाल, कल की क्या चिंता। यही सौ साल पुराने हिंदू राजनीति के आइडिया, सौ साल के आरएसएस संगठन का प्रारब्ध है। सत्ता आई-गई, तो उसके चश्मे को पहने रखो और ज़ेड सुरक्षा के साथ हरा-भरा भारत देखो। देश की सेहत, दशा-दिशा, भविष्य जाए भाड़ में।

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