जिस समय मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू हुई या जिस समय अयोध्या का आंदोलन चला और साधु, संतों पर गोलियां चलीं उस समय सोशल मीडिया नहीं था, निजी टेलीविजन चैनल नहीं थे और अखबारों की पहुंच भी सीमित थी। इसलिए जिनको लड़ना पड़ा, सड़क पर उतर कर लड़ना पड़ा। आज मीडिया और सोशल मीडिया के जमाने में वही लड़ाई नैरेटिव के स्तर पो रही है। अगर इस फैक्टर को विश्लेषण में शामिल करें तो कह सकते हैं कि यूजीसी के नए नियमों और प्रयागराज के कुंभ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए बरताव पर वैसी ही या उससे ज्यादा प्रतिक्रिया हुई है, जैसी नब्बे के दशक में मंडल और कमंडल को लेकर हुई थी। उस समय प्रतिक्रिया सड़क पर दिख रही थी, जबकि अभी हर घर के ड्राइंगरूम में दिखी है। हर स्मार्टफोन और टेलीविजन सेट इस लड़ाई का अखाड़ा बना।
इन दोनों मुद्दों को लेकर वास्तविक यानी सड़क पर उतर कर भी लड़ाई हुई लेकिन ज्यादा बड़ी लडाई आभासी यानी वर्चुअल थी। उसको देखें तो कई बातें दिखती हैं। कई लोगों का मानना है कि यह सिर्फ संयोग है कि शंकराचार्य की घटना और यूजीसी के नियम एक ही समय में आए। वे इसको भी संयोग मान रहे हैं कि माघ मेले में शंकराचार्य पालकी लेकर गए, जिस पर टकराव हो गया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी आदत के मुताबिक अड़ गए, जिससे विवाद आगे बढ़ गया। ऐसे ही यूजीसी के नियम भी संयोग हैं। जान बूझकर जारी नहीं किए गए। यूजीसी के नियम पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और शंकराचार्य को मना कर पूर्णिमा के दिन स्नान के लिए माघ मेले में लाने की खबर से इन घटनाओं को संयोग मानने वाले संतुष्ट हुए हैं।
एक दूसरी धारणा इनको प्रयोग मानने की है। माना जा रहा है कि ब्राह्मणवादी हिंदुत्व को कमजोर करने और बहुजन आधारित हिंदुत्व को मजबूत करने के प्रयोग के तौर पर ये दोनों काम हुए हैं। हिंदुत्व का चेहरा तो नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ है ही। अब इन्होंने कुछ ऐसा किया है, जिससे इधर उधर भाग रही पिछड़े, दलित और आदिवासियों को इनके चेहरे के ईर्द गिर्द गोलबंद किया जाए। अगडों को निशाना बना कर यह काम किया गया है। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा मान रही है कि अगड़ी जातियों के लोग मजबूरी में उसको वोट करेंगे इसलिए उनकी ज्यादा परवाह करने की जरुरत नहीं है। ध्यान रहे शंकराचार्य का पद ही ऐसा है, जो वेदपाठी, संस्कृत जानने वाले ब्राह्मण के लिए होता है।
शंकराचार्य ही शंकराचार्य नियुक्त करते हैं। बाकी कथावाचक कोई भी बन सकता है और महामंडलेश्वर का क्या है वह तो हिंदी सिनेमा की एक अभिनेत्री भी बन गई थी, जिसको अब हटाए जाने की खबर है। तभी चारों शंकराचार्यों के अलावा जितने भी कथावाचक, महामंडलेश्वर, योग गुरू, मठ, साधु, संत, मठ व धाम बनाने वाले लोग हैं उनमें से ज्यादातर ने शंकराचार्य वाले मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया। वे शंकराचार्य को ही दोषी ठहराते रहे। रामदेव से लेकर रामभद्राचार्य तक ज्यादातर ने शंकराचार्य की ही गलती निकाली। इसका कारण यह है कि शंकराचार्यों को सत्ता के संरक्षण की जरुरत नहीं होती है, जबकि बाकी सब को सत्ता के संरक्षण में फलना फूलना होता है। वे हिंदुओं को धर्म या अध्यात्म की ओर नहीं ले जाते हैं, बल्कि भक्त बना कर भाजपा के समर्थन की ओर ले जाते हैं।
