यों, दक्षिण एशियाई मनुष्य एक सा डीएनए लिए हुए है। इसलिए कोई भी बात भारत और पाकिस्तान में समान आफरा बनाती है। विश्व गुरू, विश्व नेता, महाशक्ति करने लगते है। बावजूद इसके हिंदू बनाम मुसलमान का फर्क है। हिंदू का ईमान धर्म से नहीं, भय, भूख (लोभ-लालच भी) व भक्ति केंद्रित अधिक है, वही मुसलमान धर्म (जुनून, तलवार) के ईमान में सांस लेता है। यह सत्य 1947 से भारत बनाम पाकिस्तान के फर्क से भी जाहिर है। जैसे पश्चिम बंगाल को जीतने के लिए नरेंद्र मोदी-संघ ने पूरी केंद्र सरकार को जैसे दांव पर लगाया है, वह भय और भूख से ही है। होना कुछ नहीं लेकिन हवाबाजी भरपूर। 1946 को याद करें। एक तरफ कोलकाता तो दूसरे छोर पर लाहौर में संघ के स्वयंसेवकों ने अखंड भारत व हिंदुओं की रक्षा में खूब लाठी भांजी थी। पर लोगों ने देखा, मुसलमान तलवार लेकर सड़क पर डायरेक्ट एक्शन के लिए निकलता था, बुद्धिहीन लाठी तुरंत भय से घरों में दुबक जाती थी।
वैसी ही राजनीति आज भी है। केवल और केवल भय दिखाकर, भक्त बनाकर अपनी भूख में छलकपट से चुनाव भर जीतना। सोचें, मोदी सरकार ने बारह वर्षों में पांच सौ घुसपैठिए भी बाहर नहीं निकाले, लेकिन उन्हीं का भय दिखाकर पूरे देश की सत्ता चाहिए। ताकि देशव्यापी धंधा बने। इसलिए ठीक चुनाव से पहले बार-बार यह तुरुप कि यदि हमें जिताया नहीं, मुसलमान से बचोगे नहीं। और अकेले मोदी हैं जो रक्षक हैं, परम परमेश्वर हैं, भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करें!
लाठी और भक्त बुद्धि इससे अधिक नहीं सोच सकती है! तभी बारह वर्षों की लाठी का आज कुल परिणाम क्या? दुनिया मोदी के भारत को कैसे मापे हुए है? बारह साल पहले डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की कथित कमजोर सरकार के विश्व सम्मान के आगे पाकिस्तान की हैसियत लगभग जीरो थी। उसे आतंकी, दिवालिया, मवाली देश मान ओबामा, ट्रंप, रूस, इस्लामी देश दूरी बनाए हुए थे। वही पाकिस्तान आज गंभीर वैश्विक पंचायत का चौधरी है। आज पूरी दुनिया की निगाह इस्लामाबाद पर है!
भला पाकिस्तान का रोल कैसे, क्यों बना? प्रधानमंत्री मोदी और ऑपरेशन सिंदूर के कारण! ठूंठ भक्त न मानें, पर सोचें, साल पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर क्या थे? पर ऑपरेशन सिंदूर के बाद इनका ग्राफ बढ़ा। पाकिस्तान का आईएमएफ कर्ज लेना आसान हुआ। मुनीर ने फील्ड मार्शल का तमगा पाया। ट्रंप ने घर बुलाकर मुनीर को लंच खिलाया। सऊदी अरब ने पाकिस्तान की सैनिक ताकत को मान्यता दे उसके साथ सैन्य संधि की। राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति पुतिन दोनों के यहां पाकिस्तान की अहमियत तेजी से बढ़ी।
मतलब भारत किसी का सगा नहीं, जबकि पाकिस्तान सभी का सगा और सखा!
पता नहीं कि पहले मुनीर ने ट्रंप को फोन किया या ट्रंप ने मुनीर को। पर समय का कमाल देखें कि दस महीने पहले ट्रंप भारत और पाकिस्तान में सीजफायर कराते हुए थे। वही आज खाड़ी संकट में सीजफायर प्रधानमंत्री शरीफ-जनरल मुनीर के कारण हुआ। ट्रंप ने अपनी पोस्ट में दोनों का नाम लिख उन्हें श्रेय दिया। पाकिस्तान जो खुद अफगानिस्तान से लड़ता हुआ है और थोड़े दिन पहले ईरान से भी लड़ता हुआ (ईरान ने कई मिसाइल पाकिस्तान पर दागी) था, वह इसलिए खिलाड़ी बना क्योंकि सभी महाशक्तियां उस पर भरोसा करती हैं! चीन ने पाकिस्तान की मध्यस्थता को हवा दी तो पुतिन ने भी दी (दोनों ईरान की परोक्ष सैनिक मदद करते हुए हैं)। पाकिस्तान से सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र, मलेशिया सभी इस्लामी देश भी कूटनीति करते हुए हैं। इनमें होर्मुज़ खाड़ी में अपने तेल जहाजों की आवाजाही की साझा व्यवस्था बनी है। एक और सत्य। ट्रंप ने कहा लेबनान पर इजराइली हमले सीजफायर का हिस्सा नहीं। लेकिन पाकिस्तान ने प्रतिवाद किया कि लेबनान में भी लड़ाई रुकनी थी। इतना ही नहीं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इजराइल को कैंसर बता कर इस्लामी मनोभाव में वाहवाही बनाई है। जाहिर है पाकिस्तान सभी इस्लामी देशों की नेतागिरी साधता हुआ है तो ट्रंप-वांस से केमिस्ट्री भी पकाए हुए।
इस सबके बीच में जान लें कि चीन हो या रूस या अमेरिका, सभी अपने-अपने ढंग से पाकिस्तान की पीठ ठोंकते हुए भारत को जतला रहे हैं कि उन सबका चहेता पाकिस्तान है! मोदी, मोदी सरकार और भारत का भला क्या मतलब! भक्तगण कहेंगे हमारे मोदी जी के नेतन्याहू मित्र हैं। तब सवाल है, क्या प्रधानमंत्री मोदी मित्र नेतन्याहू को फोन कर कहेंगे कि, भारत हिंद महासागर-खाड़ी क्षेत्र की सबसे बड़ी नौसेना वाला देश, जबकि पाकिस्तान कुछ नहीं, फिर भी होर्मुज़ खाड़ी का चौधरी बन रहा है। उसे रोको मित्र। हमें खाड़ी की चौकदारी का ठेका दिलाओ!
