जब से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार केंद्र में बनी है तब से उत्तर और दक्षिण का विभाजन किसी न किसी रूप में बढता जा रहा है। कभी भाषा के आधार पर तो कभी वित्तीय आवंटन के आधार पर तो कभी सनातन के नाम पर और अब परिसीमन के नाम पर। सोचें, दक्षिण भारत के राज्यों ने भी परिसीमन को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने भी सितंबर 2023 में लाए गए नारी शक्ति वंदन कानून का समर्थन किया था। तब दक्षिण के चार बड़े राज्यों में चार अलग अलग पार्टियों की सरकार थी। तमिलनाडु में डीएमके, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति और केरल में कम्युनिस्ट पार्टी। इनमें से तीन क्षेत्रीय पार्टियां थीं, जो अस्मिता, भाषा, संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर ज्यादा सजग रहती हैं। इन तीनों पार्टियों ने सरकार के विधेयक का समर्थन किया था।
नारी शक्ति वंदन कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि अगली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन होगा और उसके बाद 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू होगा। इसके बावजूद सभी प्रादेशिक पार्टियों ने इसका समर्थन किया। उस समय जो विरोध हुआ या सवाल उठे तो सरकार की ओर साफ कर दिया गया कि प्रो राटा बेसिस पर सीटें बढ़ाई जाएंगी। यानी हर राज्य में समान अनुपात में सीटें बढ़ेंगी। जैसे अगर उत्तर प्रदेश में 50 फीसदी सीटें बढ़ाई जाती हैं और उसे 120 किया जाता है तो तमिलनाडु में भी 50 फीसदी सीटें बढ़ा कर उसे 60 कर दिया जाएगा। यानी जिस राज्य का जो राजनीतिक प्रतिनिधित्व है वह बना रहेगा।
इसके बाद भी दक्षिण भारत के राज्यों ने आबादी बढ़ाने का अभियान शुरू कराया। सभी राज्यों ने तीन बच्चे करने के लिए प्रोत्साहन की योजना शुरू की। उन्होंने कहा कि दक्षिण के राज्यों ने आबादी पर नियंत्रण किया है इसका उन्हें नुकसान नहीं होना चाहिए। यह सब चल ही रहा था कि अचानक केंद्र सरकार ने नारी शक्ति वंदन कानून को प्री पॉन्ड करने का फैसला किया। इसे संसद के बजट सत्र में ही लाकर संशोधित करने का फैसला किया। राज्यों में चल रहे चुनाव के बीच तीन दिन का सत्र बुलाया गया और इसे पेश कर दिया गया।
सरकार ने नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किए बगैर 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन का काम आगे बढ़ा दिया। प्रो राटा बेसिस के साथ साथ यह भी कहा जाने लगा कि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ेंगी। हालांकि संसद में सरकार की ओर से कहा गया कि समान अनुपात में ही सीटें बढ़ेंगी लेकिन चूंकि मीडिया में ऐसी खबरें आ गईं कि उत्तर प्रदेश में सीटें 80 से बढ़ कर 140 होंगी और केरल में 20 से बढ़ कर 21 सीट होगी। यानी यूपी में 60 सीटें बढ़ेंगी और केरल में एक सीट बढ़ेगी। मीडिया में आई ऐसी खबरों से दक्षिण भारत के राज्यों में चिंता और अविश्वास दोनों बढ़े।
अगर समान अनुपात में भी सीटें बढ़ती हैं तो उत्तर और दक्षिण के राज्यों के प्रतिनिधित्व में पहले से ज्यादा फर्क आ जाएगा। कांग्रेस के जयराम रमेश ने इसे एक उदाहरण से समझाया कि अगर 50 फीसदी सीटें बढ़ती हैं तो यूपी में 80 की जगह 120 और केरल में 20 की जगह 30 सीट होगी। अभी यूपी और केरल के बीच 60 सीट का अंतर है, जो परिसीमन के बाद 90 सीट का हो जाएगा। ऐसा हर राज्य के साथ होगा। तमिलनाडु और यूपी के बीच अभी 41 सीट का अंतर है और प्रो राटा बेसिस पर होने वाले परिसीमन के बाद भी दोनों का अंतर 60 या 61 सीट का हो जाएगा।
ध्यान रहे भाषा, संस्कृति आदि को लेकर पहले से उत्तर और दक्षिण का विभाजन है, जिसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नाम पर और बढ़ाया जा रहा है। पिछले कुछ समय से दक्षिण भारत के राज्य अपना अलग समूह बनाने के प्रयास कर रहे हैं। इस तरह की घटनाओं से उनमें दक्षिण का अलग संघ बनाने की भावना मजबूत होगी। दक्षिण की पार्टियों ने इस मसले पर स्टैंड ले लिया है। वे काले कपड़े पहन कर विरोध जता रहे हैं और तमिलनाडु में तो खुद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बिल की कॉपी जलाई। ऐसे में खतरा यह है कि जनगणना के बाद भी परिसीमन होगा तो विरोध जारी रहेगा। अभी तो सरकार सिर्फ नैरेटिव बनाने के लिए बिल में संशोधन ले आई थी लेकिन उसने नारी शक्ति वंदन कानून को अधिसूचित कर दिया है और 2029 के चुनाव में उसे लागू करने की पूरी कोशिश होगी।
